पुस्तक समीक्षा

बंगाल विभाजन की अनकही त्रासदी

भारत के विभाजन का इतिहास केवल राजनीतिक सीमाओं के निर्माण का इतिहास नहीं, बल्कि रक्तपात, विस्थापन, दंगों, बलात्कार, हत्याओं और जान-माल की अपार क्षति की त्रासद गाथा

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पाञ्चजन्य साहित्य डेस्क

भारत के विभाजन का इतिहास केवल राजनीतिक सीमाओं के निर्माण का इतिहास नहीं, बल्कि रक्तपात, विस्थापन, दंगों, बलात्कार, हत्याओं और जान-माल की अपार क्षति की त्रासद गाथा भी है। विभाजन पर लिखे अधिकांश साहित्य में पंजाब और उत्तर-पश्चिम भारत की हिंसा को अपेक्षाकृत अधिक स्थान मिला है, जबकि बंगाल और विशेषकर पूर्वी बंगाल के हिंदुओं पर हुए अत्याचारों की चर्चा अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है। साची जी. दस्तिदार की पुस्तक ‘बंगाल्स हिंदू होलोकास्ट : दी पार्टीशन आफ इंडिया एंड इट्स आफ्टमैथ’ इसी उपेक्षित पक्ष को सामने लाने का प्रयास करती है।

लेखक ने लगभग 25 वर्ष के क्षेत्रीय अध्ययन, दस्तावेजों, संदर्भ ग्रंथों, सरकारी अभिलेखों और प्रत्यक्ष स्थलों के अध्ययन के आधार पर बंगाल में हुई सांप्रदायिक हिंसा और विस्थापन को दर्ज किया है। पुस्तक के 455 पृष्ठ में से 264 पृष्ठ मुख्य पाठ हैं, जबकि शेष भाग में विस्तृत संदर्भ, ग्रंथ-सूची और परिशिष्ट शामिल हैं। लेखक का विशेष उद्देश्य घटनाओं को केवल वर्णित करना नहीं, बल्कि उनके प्रमाण प्रस्तुत करना भी है। इस दृष्टि से पुस्तक शोधपरक दस्तावेज के रूप में महत्वपूर्ण बन जाती है।

पुस्तक में 1946 के कलकत्ता दंगों, नोआखली की हिंसा, चटगांव तथा पूर्वी बंगाल के विभिन्न क्षेत्रों में हिंदुओं पर हुए हमलों और 1947 के विभाजन के बाद जारी सांप्रदायिक हिंसा का विस्तार से उल्लेख किया गया है। लेखक 1964 के हजरतबल प्रकरण के बाद पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में हुई हिंसा तथा हिंदुओं के बड़े पैमाने पर पलायन को भी इस व्यापक ऐतिहासिक क्रम से जोड़ते हैं।

बता दें कि 27 दिसंबर, 1963 को श्रीनगर की हजरतबल दरगाह से पैगंबर मोहम्मद के पवित्र अवशेष गायब हो गए थे। इसके बाद कश्मीर घाटी में मुसलमानों ने हिंसक प्रदर्शन किया। 4 जनवरी, 1964 को अवशेष के सुरक्षित मिलने से घाटी में तनाव कम हुआ, पर पूर्वी पाकिस्तान में भयंकर दंगे हुए। दंगाइयों ने हिंदुओं को चुन—चुन कर मारा, उनकी सपंत्ति को लूटा, आगजनी की। पुस्तक में 1971 में पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना द्वारा किए गए अत्याचारों और हिंदुओं के विरुद्ध हुई हिंसा को भी विस्तार से दिया गया है। उस समय तो कई स्थानों पर हिंदुओं को जिंदा आग में फेंक दिया गया था।

दस्तिदार का एक महत्वपूर्ण तर्क यह है कि बंगाल की त्रासदी को केवल 1947 तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। उनके अनुसार, विभाजन के बाद पूर्वी बंगाल से हिंदू शरणार्थियों के पश्चिम बंगाल आने से राज्य के सामाजिक, आर्थिक और जनसांख्यिकीय ढांचे पर गहरा प्रभाव पड़ा। जूट उत्पादन पूर्वी बंगाल में और जूट मिलों का बड़ा हिस्सा कलकत्ता में होने के कारण विभाजन ने बंगाल की अर्थव्यवस्था को भी गंभीर रूप से प्रभावित किया। ऐसे अनेक प्रसंगों से पुस्तक की पठनीयता बढ़ जाती है।

पुस्तक में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की भूमिका पर भी चर्चा की गई है। लेखक उन्हें हिंदू-विरोधी सांप्रदायिक हिंसा के विरुद्ध संघर्ष करने वाले प्रमुख नेताओं में देखते हैं। इसी संदर्भ में ए.के. फजलुल हक के साथ उनके राजनीतिक सहयोग तथा बंगाल की तत्कालीन राजनीति का उल्लेख किया गया है। लेखक विभाजन-पूर्व बंगाल की मुस्लिम लीग सरकार और सांप्रदायिक राजनीति की भूमिका की भी आलोचनात्मक समीक्षा करते हैं।

पुस्तक का एक विचारोत्तेजक पक्ष यह है कि लेखक केवल हिंसा के लिए राजनीतिक शक्तियों को जिम्मेदार नहीं ठहराते, बल्कि पीड़ित समुदाय की प्रतिक्रिया और सामूहिक स्मृति पर भी प्रश्न उठाते हैं। वे पूछते हैं कि इतनी बड़ी मानवीय त्रासदियों के बावजूद इन घटनाओं की स्मृति सार्वजनिक जीवन और इतिहास-लेखन में इतनी सीमित क्यों रही। उनके अनुसार, भाग्यवाद, इतिहास-बोध का अभाव और सामुदायिक एकजुटता की कमी इसके कुछ कारण हो सकते हैं। फिर भी, बंगाल के विभाजन, विस्थापन और सांप्रदायिक हिंसा के उस पक्ष को सामने लाने के कारण, जो लंबे समय तक अपेक्षाकृत कम चर्चा में रहा, यह पुस्तक महत्वपूर्ण है।

इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसका दस्तावेजी संकलन है। यह पाठक को केवल अतीत की भयावहता से परिचित नहीं कराती, बल्कि यह प्रश्न भी उठाती है कि इतिहास में किन त्रासदियों को याद रखा जाता है और किन्हें धीरे-धीरे भुला दिया जाता है। इसी कारण यह पुस्तक बंगाल के विभाजन और उसके दीर्घकालिक सामाजिक प्रभावों को समझने के लिए एक उपयोगी और आलोचनात्मक अध्ययन के रूप में देखी जा सकती है।

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