
किसी व्यक्ति को जानने के लिए उसके साथ बिताए कुछ पल ही कई बार पर्याप्त होते हैं। नाना पाटेकर को मैंने केवल एक अभिनेता के रूप में नहीं जाना, बल्कि 1985-86 में हुई हमारी पहली मुलाकात से ही उनके भीतर छिपे एक सहज, संवेदनशील और फक्कड़ इंसान को महसूस किया। उस मुलाकात ने हमारे बीच आत्मीय रिश्ता जोड़ा, जो समय के साथ गहरा होता गया। आज उनके असामयिक निधन का समाचार सुनकर मेरा मन व्यथित है। ऐसा लग रहा है जैसे जीवन का एक आत्मीय अध्याय अचानक बंद हो गया हो।
मेरे राजनीतिक जीवन के शुरुआती दौर में, जब मैं गुजराती कॉलेज में छात्र राजनीति से जुड़ा था, कॉलेज के चुनाव के बाद एक सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया गया। उस समय नाना पाटेकर की फिल्म ‘अंकुश’ काफी लोकप्रिय हो रही थी और चारों तरफ उनके अभिनय की चर्चा थी। हमने उन्हें मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया। कार्यक्रम के बाद वे हमारे घर आए और मेरी माताजी के पलंग पर बैठकर प्रेम से इंदौरी ‘सेव-परमल’ खाया। उन्होंने इंदौरी व्यंजनों की खूब तारीफ की, घर के माहौल में घुले-मिले और हमारे साथ क्रिकेट भी खेला। पर्दे पर गंभीर दिखने वाले यह अभिनेता निजी जीवन में बेहद सहज और जमीन से जुड़े इंसान थे।
पश्चिम बंगाल के अपने प्रभार कार्यकाल के दौरान, मैं एक शादी में शामिल होने पुणे गया और वहाँ उनके फार्म हाउस पर उनसे मिलने पहुँचा। नाना स्वयं बागवानी करते थे और पेड़-पौधों व खेती से उनका गहरा लगाव था। बातचीत के दौरान उन्होंने पूछा, “क्या कार्यक्रम है, कैलाश?” मैंने बताया कि शाम को शादी में जाना है। उन्होंने कहा, “ठीक है, लंच साथ में करेंगे।” समस्या यह थी कि खाना बनाने के लिए सब्जी खरीदने के पैसे नहीं थे। लेकिन उनके लिए यह कोई बड़ी बात नहीं थी। उन्होंने अपने बाग से आम तोड़े, टोकरी में रखे और फार्म हाउस के पास हाईवे पर जाकर आम बेचने लगे। उन्होंने चेहरे पर कपड़ा बाँध लिया था ताकि लोग पहचान न सकें। एक बड़े अभिनेता का सड़क किनारे आम बेचना मेरे लिए एक अविस्मरणीय दृश्य था। कुछ ही समय में सारे आम बिक गए , उससे मिले पैसों से सब्जी खरीदी गई, खाना बना और उन्होंने बड़ी आत्मीयता से खाना खिलाया। जिनके पास करोड़ों कमाने का अवसर था, वे पैसे और प्रतिष्ठा के पीछे भागने के बजाय सड़क किनारे आम बेचकर भी सहज रह सकते थे।
महाराष्ट्र में सूखे और किसानों की आत्महत्या की घटनाओं के दौरान वे प्रभावित किसानों से मिलते, उनकी बातें सुनते और कई जरूरतमंद परिवारों की आर्थिक मदद करते थे। वे कितने किसानों को कितना पैसा देते थे, इसका कोई सार्वजनिक हिसाब नहीं रखते थे। वे किसानों से मिलकर कहते- “डर क्यों रहे हो? मैं हूँ ना। चिंता क्यों करते हो?” उनके लिए यह किसी प्रचार का हिस्सा नहीं, बल्कि उनके स्वभाव का अंग था। उनकी सहायता का वास्तविक मूल्य धनराशि से अधिक उस भरोसे में था जो वे परेशान किसानों में जगाते थे।
नाना पाटेकर का भारतीय सेना के प्रति गहरा सम्मान और लगाव था। स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर वे सेना के जवानों के साथ समय बिताते थे। एक बार स्वतंत्रता दिवस से पहले मैं दिल्ली एयरपोर्ट पर था, तभी सैन्य वर्दी में खड़े एक व्यक्ति ने मुझे आवाज दी। पहले मैं पहचान नहीं पाया, ध्यान से देखने पर पता चला कि वे नाना पाटेकर थे, जो सैन्य अधिकारियों के साथ सीमा पर जवानों के बीच समय बिताने जा रहे थे। उन्हें 1990 में टेरिटोरियल आर्मी में मानद रैंक दी गई, जहाँ वे 2013 तक मानद लेफ्टिनेंट कर्नल की रैंक पर रहे। 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान उन्होंने तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस से अनुमति लेकर सीमावर्ती इलाकों (द्रास, लेह, कुपवाड़ा, सोपोर) में जवानों का हौसला बढ़ाने के लिए लगभग 60 दिन बिताए। ‘प्रहार’ और ‘अब तक छप्पन’ जैसी फिल्मों में उन्होंने सैनिक और राष्ट्रनिष्ठ किरदारों को जीवंत किया।
फिल्मी जीवन में उन्होंने व्यावसायिक सफलता के बजाय अपने विचारों, सिद्धांतों और सामाजिक उपयोगिता के आधार पर फिल्मों का चयन किया। पूरे करियर में उन्होंने 100 से अधिक फिल्मों में काम करने से मना किया। उनका दृष्टिकोण बन गया था— “अपने लिए बहुत कुछ कर लिया, अब समाज के लिए करना है।” उन्होंने संपत्ति को जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं माना। उनका मानना था कि बच्चों को अपना रास्ता स्वयं बनाना चाहिए। इसलिए उनके पास विशाल भौतिक संपत्ति भले न रही हो, लेकिन लोगों का अपार विश्वास और सम्मान था। उन्होंने पर्दे पर अनेक किरदार निभाए, लेकिन निजी जीवन में कभी कोई अभिनय नहीं किया। आज नाना पाटेकर हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका अभिनय, उनकी सादगी, संवेदनशीलता और देशभक्ति हमेशा हमारे साथ रहेगी। लोग उन्हें एक महान अभिनेता के साथ-साथ कर्मठ लोकसेवी और देशभक्त फौजी के रूप में याद रखेंगे।