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राम मंदिर से लेकर राष्ट्रसेवा तक… अशोक सिंहल जी की तपस्या

किसी महापुरुष का सच्चा स्मरण केवल उनके नाम और विचारों को याद करने से नहीं, बल्कि उनके कृतित्व को अपने जीवन में उतारने से होता है।

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Panchjanya

श्रद्धेय अशोक सिंहल जी की जन्मशताब्दी वर्ष के अवसर पर प. पू. सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत जी ने उनके जीवन, संकल्प, त्याग और राष्ट्रसेवा को याद करते हुए कहा कि किसी महापुरुष का सच्चा स्मरण केवल उनके नाम और विचारों को याद करने से नहीं, बल्कि उनके कृतित्व को अपने जीवन में उतारने से होता है। मोहन भागवत जी ने कहा कि “मेरा जीवन केवल अपने लिए नहीं है, मेरा जीवन इस राष्ट्र के लिए है”- अशोक सिंहल जी इसी दृढ़ संकल्प के साथ जीवनभर चलते रहे। उन्होंने अशोक सिंहल जी के उस संकल्प को भी याद किया, जिसमें राम मंदिर निर्माण के लिए उन्होंने अपने मोक्ष तक का त्याग करने की भावना व्यक्त की थी। डॉ. मोहन भागवत जी ने समाज से आह्वान किया कि अशोक सिंहल जी और अन्य महापुरुषों का स्मरण “पुरुषार्थ” के माध्यम से किया जाए- सिर्फ उत्सव और स्मरण तक सीमित रहकर नहीं, बल्कि राष्ट्र, समाज, धर्म और संस्कृति के लिए अपने जीवन में कुछ करने का संकल्प लेकर।

देखिए पाञ्चजन्य पर डॉ. मोहन भागवत जी का पूरा संबोधन।

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