
नितेश सिवाच ने ग्रीको-रोमन कुश्ती में भारत के लिए सिल्वर मेडल जीता
भारतीय कुश्ती में कई ऐसे खिलाड़ी रहे हैं, जिन्होंने मुश्किल हालात के बावजूद अपनी मेहनत से बड़ा मुकाम हासिल किया है। हरियाणा के सोनीपत जिले के जगसी गांव के पहलवान नितेश सिवाच की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। चोट के कारण उन्हें कुश्ती छोड़नी पड़ी और ऑपरेशन के बाद उन्होंने अपने पिता के साथ घर-घर जाकर दूध तक बेचा। लेकिन खेल के प्रति उनका जुनून उन्हें दोबारा मैट पर ले आया। इसके बाद नितेश ने एशियाई खेलों में रजत पदक जीतकर भारतीय ग्रीको-रोमन कुश्ती में एक खास उपलब्धि हासिल की।
97 किलोग्राम भारवर्ग में नितेश ने शानदार प्रदर्शन किया। क्वार्टर फाइनल में उन्होंने तुर्कमेनिस्तान के अमनबेर्डी अगामामेदोव को 7-1 से हराया। इसके बाद सेमीफाइनल में मंगोलिया के गंखुयाग गनबातर को 9-0 से मात देकर फाइनल में जगह बनाई। गनबातर इससे पहले हांगझोऊ एशियाई खेलों में कांस्य पदक जीत चुके थे। फाइनल में नितेश का सामना जापान के यूरी नकाजातो से हुआ। इस मुकाबले में उन्हें हार का सामना करना पड़ा और उन्हें रजत पदक मिला। हालांकि, यह पदक भारतीय ग्रीको-रोमन कुश्ती के लिए लंबे समय बाद आया। इससे पहले भारत ने 1962 के एशियाई खेलों में इस शैली में पदक जीता था। उस समय गणपत अंदलकर ने 97 किलोग्राम से अधिक भारवर्ग में कांस्य पदक हासिल किया था।
नितेश की कुश्ती की शुरुआत भी आसान नहीं रही। बचपन में उन्हें क्रिकेट पसंद था, जबकि उनके पिता चाहते थे कि वह पहलवान बनें। प्रताप स्पोर्ट्स स्कूल में दाखिले के बाद धीरे-धीरे उनका रुझान कुश्ती की ओर बढ़ा। इसी दौरान घुटने में चोट लगी और ऑपरेशन कराना पड़ा। कुछ समय तक उन्होंने पिता के साथ दूध बेचकर परिवार का हाथ बंटाया। बाद में पिता के प्रोत्साहन से नितेश ने फिर कुश्ती शुरू की और कड़ी मेहनत के दम पर एशियाई खेलों तक पहुंचे। उनकी यह कहानी बताती है कि मुश्किल परिस्थितियां रास्ता रोक सकती हैं, लेकिन मजबूत इरादा हो तो वापसी का रास्ता हमेशा बनाया जा सकता है।