गत 13 सितंबर को मूसलाधार बारिश के बावजूद गुजरात के भरूच के पुराने इलाके में लाल-पीले बलुआ पत्थरों से बने एक ऐतिहासिक भवन के बाहर सुबह से ही भीड़ जुटी रही। महाराष्ट्र, गुजरात और पंजाब के विभिन्न हिस्सों से आए 3,000 से अधिक ‘महानुभाव पंथ’ के अनुयायियों ने अपने आराध्य सर्वज्ञ चक्रधर स्वामी के जन्मस्थान के दर्शन के बाद एक सभा में जुटे। चक्रधर स्वामी का जन्म लगभग 800 साल पहले भरूच में हुआ था। भरूच नगर पालिका के वार्ड नंबर 11 स्थित यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) संरक्षित स्मारक पंथ के लाखों अनुयायियों के लिए सबसे पवित्र स्थान है। लेकिन इसकी कहानी भी मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला से अलग नहीं है।
संभाजी नगर से आए युवा संत सुदर्शन नागराज कपाटे ने कहा कि पंथ के ग्रंथ लीलाचरित्र और स्थानपोथी में चक्रधर स्वामी के जन्मस्थान का स्पष्ट प्रमाण है। उन्होंने एएसआई से इस ऐतिहासिक सत्य को स्वीकारने और स्मारक परिसर व आसपास के अवैध कब्जों को तत्काल हटाने की मांग की।
पुराना नाम भरवास
महानुभाव पंथ’ की मान्यताएं भारत के उथल-पुथल भरे इस्लामी अतीत के उस सिरे को जोड़ती हैं, जब गुजरात में इस्लामी आक्रमणों का दौर शुरू हुआ था। गुजरात की समृद्धि से आकर्षित होकर गजनी से आए दुर्दांत लुटेरे महमूद गजनवी ने सोमनाथ को नष्ट कर दिया था। 1094 से 1143 के बीच अनहिलवाड़ में जयसिंह सिद्धराज का शासन था और पाटन उनकी राजधानी। भरूच में उनके प्रधानमंत्री विशालदेव ने दुर्ग बनवाया था। पुरानी पोथियों में भरूच को भरवास कहा गया है। यहीं विशालदेव के महलों में हरिपाल देव का जन्म हुआ, जो आगे चलकर आध्यात्मिक विभूति ‘चक्रधर स्वामी’ के नाम से प्रसिद्ध हुए। बाद में वे महाराष्ट्र चले गए और उनके अनुयायियों में मराठीभाषियों की संख्या अधिक हुई। सदियां बीत गईं, लेकिन पूजा-परंपराओं और पोथियों में यह पंथ अपने आराध्य की स्मृतियों के साथ गुजरात और भरूच की उस पवित्र मिट्टी को आज भी संजोए हुए है।
अलाउद्दीन खिलजी का हमला
गुजरात पर 1299 में अलाउद्दीन खिलजी के भयावह हमले के बाद दिल्ली के तुर्क शासकों के दौर में लूट और नरसंहार का सिलसिला चलता रहा। मुगलों से पहले करीब 187 वर्षों के सुलतानी शासन में गुजरात के अनेक हिस्सों में मंदिरों और सांस्कृतिक स्थलों का विध्वंस हुआ। ‘मिरआते-सिकंदरी’, ‘तबकाते-अकबरी’ और ‘जफरुल-वालेह बे मुजफ्फर-आलेह’ जैसे ऐतिहासिक ग्रंथ इस दौर की घटनाओं का विवरण देते हैं। इनमें 1459 से करीब 55 वर्षों तक शासन करने वाले महमूद बेगड़ा के अभियानों का भी उल्लेख मिलता है। बेट द्वारिका के राजा भीम के टुकड़े-टुकड़े कर उन्हें दरवाजों पर टांगा गया। इस्लाम न कबूलने पर चांपानेर के राजा और मंत्री की हत्या के बाद जौहर और राजा की दो बेटियों को हरम में डालकर एक बेटे को मुसलमान बनाने के प्रसंग इनमें दर्ज हैं। सोमनाथ, पाटन, गिरनार, चांपानेर और भरूच के मंदिरों पर हमलों तथा उनके स्थान पर मस्जिदों के निर्माण के उल्लेख भी इन ग्रंथों में मिलते हैं।
महानुभाव पंथ की मांग
‘महानुभाव संप्रदाय’ की स्मृतियों से जुड़ा एएसआई संरक्षित स्मारक भरूच के मुस्लिम पक्ष के लिए मस्जिद है। धार की भोजशाला की तरह यहां भी कुछ वर्षों से नमाज होने लगी है। पंथ के अनुयायियों का कहना है कि एएसआई स्मारकों की निर्धारित परिधि में निर्माण पर रोक के बावजूद स्मारक से सटाकर मकान बना दिए गए हैं। पंथ की पुस्तक ‘भरवास दर्शन’ में चक्रधर स्वामी से जुड़ी मान्यताओं के साथ भरूच के इतिहास की दुर्लभ जानकारियां भी संकलित हैं और इसे स्मारक के मुक्ति अभियान की एक कड़ी माना जाता है।
खंडित हों या साबुत, पत्थर झूठ नहीं बोलते। स्मारक की निचली मंजिल के बंद कमरों पर एएसआई के ताले हैं। माना जाता है कि भीतर कई अवशेष सुरक्षित हैं। पंथ की मांग है कि इन कमरों को जनता के लिए खोला जाए और पुराने मंदिर के सभी अवशेषों को सूचीबद्ध किया जाए।
स्तंभों पर मूर्तियां
पहले भोजशाला में साल में केवल एक बार बसंत पंचमी के दिन हिंदुओं को पूजा की अनुमति थी, जबकि मुस्लिमों को हर शुक्रवार नमाज की। ढाई दशक पहले भोजशाला की मुक्ति का जनजागरण अभियान मध्य प्रदेश के मालवा अंचल में शुरू हुआ। अंतत: मई 2026 में उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ ने साक्ष्यों के आधार पर भोजशाला को एक मंदिर माना। मूर्तियों, संस्कृत शिलालेखों और मंदिर के स्पष्ट स्तंभों के बावजूद न्यायालय के लिए निर्णायक प्रमाण एएसआई के 100 दिन चले विस्तृत सर्वेक्षण से सामने आए। करीब दो हजार पृष्ठों की रिपोर्ट न्यायालय में प्रस्तुत हुई।
शंकराचार्य की शारदा पीठ की भरूच गादी के प्रमुख स्वामी मुक्तेश्वरानंद भोजशाला के निर्णय से बेहद उत्साहित हैं। वे कहते हैं, “अब एएसआई को किसी अलग से आवेदन की आवश्यकता ही नहीं होनी चाहिए। उसे भरूच के इस स्मारक का सर्वे भोजशाला के अनुभव के आधार पर तत्काल आरंभ करना चाहिए।” स्वामी मुक्तेश्वरानंद के अलावा स्वामी लोकेशानंद, स्वामी मानसरोवरजी महाराज और हरिचरणदास जी सहित गुजरात के अनेक संत और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि उपस्थित रहे। धार की भोजशाला के निर्णय के बाद उनमें नई ऊर्जा है।
भरूच के इतिहास-अध्येता और सामाजिक कार्यकर्ता विजय भाई शाह कहते हैं, “स्वाधीनता के आठ दशक बाद अपनी मूल पहचान से जुड़े स्मारकों के लिए अलग-अलग संघर्ष क्यों हों? ये एकमुश्त सर्वेक्षण और निर्णय के विषय हैं, ताकि देश की ऊर्जा दूसरे कामों में लगे। हम कब तक इन्हीं में उलझे रहेंगे?”

















