यह श्लोक मूल रूप से चाणक्य नीति (या नीति-ग्रंथों) एवं कौटिल्य के कूटनीतिक/सामाजिक सिद्धांतों पर आधारित नीति-परंपरा से लिया गया है, जिसमें संगठन, नेतृत्व और व्यक्ति के सामाजिक व्यवहार के नियमों का वर्णन है।
श्लोक :
रन्ध्रान्वेषी परीवादी, विवादी मर्मभेदकः।
लोक-संघटनाकार्ये, नियतं स्यात् पराजितः॥
भावार्थ :
दूसरे की कमजोरी ढूंढते रहने वाला, परनिन्दा करने वाला, दूसरे के रहस्यों का भेदन करने वाला समाज, संगठन कार्य में निश्चित ही पराजित होगा।
आज के युग की प्रासंगिकता :
टीम-वर्क और कॉर्पोरेट संस्कृति: आज के समय में किसी भी संगठन या कंपनी की सफलता आपसी विश्वास पर टिकी होती है। जो लोग केवल सहकर्मियों की कमियां ढूंढते हैं या पीठ पीछे बुराई करते हैं, वे कार्यस्थल के माहौल को विषाक्त (Toxic) बना देते हैं, जिससे पूरी टीम का प्रदर्शन और संगठन का लक्ष्य प्रभावित होता है।
नेतृत्व और सामाजिक संगठन: एक सफल नेता या समाज-सेवक वही बन सकता है जो लोगों को जोड़ना जानता हो। दूसरों के रहस्यों को उजागर करना और विवाद खड़ा करना समाज या संगठन को तोड़ता है, जोड़ता नहीं।
डिजिटल युग और सोशल मीडिया : आजकल लोग सोशल मीडिया पर दूसरों की कमियां उछालने, ‘ट्रोल’ करने और निजी जानकारियों को सार्वजनिक (Doxxing) करने में लगे रहते हैं।
सामूहिक शक्ति और एकता: किसी भी बड़े लक्ष्य को हासिल करने के लिए सकारात्मकता और अनुशासन आवश्यक है। रचनात्मक आलोचना तो ठीक है, लेकिन दुर्भावनापूर्ण छिद्रान्वेषण संगठन को पराजय की ओर ले जाता है।
















