आधुनिक काल में ‘संगठन शास्त्र’ और सामाजिक समरसता के महत्व को दर्शाने के लिए यह श्लोक है।
श्लोक :
विकासयति सद्भावान् विलोपयति दुर्गुणान्।
विनाशयति विद्वेषान् कार्यं संघटनात्मकम्॥
भावार्थ :
संगठनात्मक कार्य सद्भावों को विकसित करता है, दुर्गुणों को लुप्त करता है और विद्वेषों को विनष्ट करता है।
आज के युग में प्रांसगिकता :
1. कॉर्पोरेट संस्कृति और टीम बिल्डिंग :
सदभाव का विकास: आज के समय में किसी भी कंपनी या संस्थान में टीम भावना और कार्यस्थल संस्कृति सबसे महत्वपूर्ण है। जब लोग मिलकर काम करते हैं, तो एक-दूसरे के प्रति सहयोग और सद्भाव (Goodwill) बढ़ता है।
दुर्गुणों का लोप: अकेले काम करने की तुलना में संगठन में काम करने से व्यक्ति में अहंकार, आलस्य और स्वार्थ जैसे दुर्गुण कम होते हैं, और जवाबदेही तथा अनुशासन बढ़ता है।
2. सामाजिक समरसता और नेटवर्किंग :
विद्वेष का विनाश: आज सोशल मीडिया और वैचारिक मतभेदों के दौर में समाज में विद्वेष (Animosity/Hatred) तेज़ी से बढ़ता है। सामूहिक व संघटनात्मक कार्य (जैसे – सामाजिक सेवा, सामुदायिक पहल) लोगों को पास लाते हैं और आपसी दूरियों तथा रंजिशों को समाप्त करते हैं।
3. नेतृत्व और राष्ट्र-निर्माण :
जब समाज या देश किसी बड़े उद्देश्य के लिए संगठित होता है, तो व्यक्तिगत हित पीछे छूट जाते हैं और राष्ट्रीय या सामूहिक हित सर्वोपरि हो जाते हैं।

















