नई पीढ़ी का प्रश्न पूछना भारतीय परंपरा का हिस्सा, युवाओं के प्रश्नों को सुनने और समझने की जरूरत: दत्तात्रेय होसबाले
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नई पीढ़ी का प्रश्न पूछना भारतीय परंपरा का हिस्सा, युवाओं के प्रश्नों को सुनने और समझने की जरूरत: दत्तात्रेय होसबाले

भोपाल में आयोजित 'राष्ट्रीय संस्थान छात्र संवाद' में 250 विद्यार्थियों व प्राध्यापकों ने लिया भाग, आरएसएस सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी ने युवाओं से संवाद कर उनकी जिज्ञासाओं का किया समाधान

Written byShivam DixitShivam Dixit
Sep 21, 2026, 01:24 am IST
inभारत, संघ @100, मध्य प्रदेश
bhopal rashtriya sansthan chhatra samvad dattatreya hosabale

भोपाल। भोपाल में समाज सेवा न्यास द्वारा आयोजित ‘राष्ट्रीय संस्थान छात्र संवाद’ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी ने मुख्य वक्ता के रूप में अपने विचार रखे. उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी का प्रश्न पूछना भारतीय परंपरा का अहम हिस्सा है. युवाओं के प्रश्नों को सुनने, समझने और संवाद के माध्यम से उत्तर देने की आवश्यकता है. किसी युवा को उसके बाहरी स्वरूप या वैचारिक दृष्टिकोण के आधार पर आंकने के बजाय उसके भीतर की संवेदना और सकारात्मक शक्ति को समझा जाना चाहिए.

इस संवाद कार्यक्रम में लगभग 250 विद्यार्थी एवं प्राध्यापक शामिल हुए. कार्यक्रम में सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी के साथ मध्यभारत प्रांत संघचालक अशोक पांडेय जी तथा भोपाल विभाग संघचालक सोमकांत उमालकर जी मंचस्थ रहे. कार्यक्रम का शुभारंभ भारत माता की प्रतिमा पर पुष्पार्चन के साथ हुआ, जिसके पश्चात श्री राम जन्मभूमि संघर्ष पर आधारित एक विशेष डॉक्यूमेंट्री का प्रदर्शन किया गया. इस दौरान विद्यार्थियों ने सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक, प्रशासनिक, तकनीकी और राष्ट्रीय विषयों से जुड़ी अपनी जिज्ञासाएं खुलकर सामने रखीं.

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प्रश्न करने वाले युवाओं से संवाद होना चाहिए

सोशल मीडिया और वैचारिक ‘इको चैंबर’ के दौर में युवाओं से जुड़ने के प्रश्न पर उन्होंने कहा कि आज पीढ़ियों को ‘जेन जी’ और ‘जेन अल्फा’ जैसे नामों से परिभाषित किया जाता है, जबकि स्वामी विवेकानंद ने युवाओं को ‘युवा भारत’ कहा था. नरेंद्र के रूप में स्वामी विवेकानंद ने भी प्रश्न किए थे और नचिकेता का प्रश्न करना भारतीय परंपरा में प्रसिद्ध है. इसलिए यदि नई पीढ़ी सत्ता, समाज या किसी संस्था से प्रश्न करती है तो उसे गलत नहीं माना जाना चाहिए.

“युवाओं के प्रश्नों को सुनना और संवाद में जुड़ना चाहिए। केवल प्रश्न पूछने के कारण किसी को अस्वीकार करने के बजाय उसकी बात को गहराई से समझने का प्रयास होना चाहिए।” – दत्तात्रेय होसबाले, सरकार्यवाह, RSS

भारत को औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त करने के प्रश्न पर उन्होंने कहा कि देश राजनीतिक रूप से स्वतंत्र हो चुका है, लेकिन ‘डिकोलोनाइजेशन ऑफ माइंड’ की प्रक्रिया अभी जारी है. भारतीय सभ्यता के मूल्यों, दृष्टि और शब्दावली पर अधिक शोध की आवश्यकता बताते हुए उन्होंने ‘धर्म’ की अवधारणा का उदाहरण दिया. उनके अनुसार भारतीय दृष्टि को समझने के लिए इतिहास, पुरातत्व, भाषा विज्ञान और सामाजिक विज्ञान सहित विभिन्न क्षेत्रों में अध्ययन आवश्यक है.

विद्यार्थियों के बीच वैचारिक वातावरण बदलने के उपाय पर उन्होंने स्वाध्याय मंडल, ग्रुप डिस्कशन और राष्ट्रहित से जुड़ी रचनात्मक गतिविधियां शुरू करने का सुझाव दिया. उन्होंने बेंगलुरु के विद्यार्थियों के ‘नमो भारती’ कार्यक्रम का उदाहरण देते हुए कहा कि छोटी-छोटी गतिविधियों के माध्यम से भी सकारात्मक वातावरण तैयार किया जा सकता है.

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तकनीक साधन बने, जिसका नियंत्रण मानव के हाथ में रहे

डिजिटल युग में संघ के कार्यों और तकनीक के उपयोग से जुड़े प्रश्न पर सरकार्यवाह जी ने कहा कि मूल विचार और मूल्य स्थायी होते हैं, लेकिन समय के साथ उपलब्ध साधनों का उपयोग किया जाना चाहिए. सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग किया जाए, लेकिन वहां क्या और किस उद्देश्य से प्रसारित किया जा रहा है, यह व्यक्ति के संस्कार और विवेक पर निर्भर करता है. तकनीक मानवता, राष्ट्र, पर्यावरण और इतिहास के लिए लाभकारी होनी चाहिए तथा मनुष्य तकनीक का गुलाम बनने के बजाय उसे अपने नियंत्रण में रखे.

उन्होंने तकनीक के लोकतंत्रीकरण की आवश्यकता बताते हुए कहा कि इसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना चाहिए. साथ ही तकनीक पर मानवीय नियंत्रण बनाए रखना जरूरी है. यदि यह नियंत्रण समाप्त हो गया तो तकनीक व्यक्ति के लिए साधन रहने के बजाय उसे नियंत्रित करने वाली शक्ति बन सकती है.

वैचारिक संघर्ष के प्रश्न पर सरकार्यवाह जी ने कहा कि यदि इसे ‘विमर्श युद्ध’ कहा जा रहा है तो उसके लिए प्रभावी साधन भी आवश्यक हैं. इसके लिए तर्क सत्य और अध्ययन पर आधारित हों, अपनी बात रखने में स्पष्टता हो, प्रभावी माध्यमों का उपयोग किया जाए और इसके लिए प्रशिक्षण भी हो.

शिक्षा व्यवस्था में भारतीय दृष्टि से जुड़े प्रश्न पर उन्होंने कहा कि इतिहास, पुरातत्व, भाषा विज्ञान और सामाजिक विज्ञान के कई क्षेत्रों में भारत को लंबे समय तक पश्चिमी दृष्टि से देखने का प्रयास हुआ. भारतीय समाज की कुरीतियों को स्वीकार करते हुए उनके सुधार के प्रयास जरूरी हैं, लेकिन समाज की सकारात्मक उपलब्धियों और परंपराओं का भी वस्तुनिष्ठ अध्ययन होना चाहिए.

भ्रष्टाचार पर पूछे गए प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि व्यवस्था में सुधार जरूरी है, लेकिन इसकी शुरुआत व्यक्ति के अपने जीवन से होनी चाहिए. पहले स्वयं भ्रष्टाचार से मुक्त रहने का प्रयास करना चाहिए और समाज में भी इसके विरुद्ध जागरूकता विकसित करनी चाहिए. उन्होंने दोहराया कि मूल विचार और मूल्य अपरिवर्तित रहते हुए तकनीक का उपयोग किया जाना चाहिए। तकनीक मानवता, राष्ट्र, पर्यावरण और इतिहास के लिए लाभकारी होनी चाहिए.

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समाज के प्रति दायित्व और संवेदना

अपने पाथेय में सरकार्यवाह जी ने कहा कि विद्यार्थी और प्राध्यापक समाज का सुशिक्षित वर्ग हैं, इसलिए उनकी जिम्मेदारी भी अधिक है. व्यक्ति की शिक्षा में समाज का योगदान होता है, इसलिए शिक्षा को केवल व्यक्तिगत सफलता का माध्यम न मानकर समाज के प्रति दायित्व से जोड़ना चाहिए.

उन्होंने कहा कि व्यक्तिगत जिम्मेदारियों और समाज के प्रति दायित्व के बीच समन्वय ही धर्म का एक महत्वपूर्ण स्वरूप है. समाज को आत्मविश्वास के साथ सामर्थ्यवान भी बनना होगा, लेकिन यह शक्ति मानवता और राष्ट्र के हित के लिए होनी चाहिए. उन्होंने विद्यार्थियों से यह विचार करने का आह्वान किया कि समाज के प्रति उनके भीतर कितनी गहरी संवेदना है और उस संवेदना को कार्य में बदलने की उनकी क्या योजना है.

कार्यक्रम का समापन ‘वंदे मातरम्’ के सामूहिक उद्घोष के साथ हुआ.

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Topics: भोपाल राष्ट्रीय संस्थानछात्र संवादBhopal Rashtriya SansthanChhatra SamvadSamaj Seva NyasYouth Dialogue Bhopalदत्तात्रेय होसबालेDattatreya HosabaleRSS Sarkaryavah Dattatreya Hosabale
Shivam Dixit
Shivam Dixit
अनुभवी भारतीय पत्रकार, मीडिया एवं सोशल मीडिया विशेषज्ञ, राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार विजेता, और डिजिटल रणनीतिकार। वर्ष 2015 में पत्रकारिता की शुरुआत। प्रिंट, TV और डिजिटल मीडिया संस्थानों में विभिन्न भूमिकाओं में कार्य किया। भारत की प्रथम SMS समाचार एजेंसी "न्यूज़ नेटवर्क ऑफ इंडिया" (NNI) में रिपोर्टर कोऑर्डिनेटर के रूप में काम किया, डिजिटल मीडिया के अनोखे प्रोजेक्ट "इंडियाज़ पेपर" का नेतृत्व करते हुए 500 समाचार वेबसाइटों का प्रबंधन किया। भारत के अलग अलग राज्यों के लगभग 1000 स्थानीय पत्रकारों से जुड़ा यह प्रोजेक्ट "लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स" में दर्ज है। वर्ष 2022 से राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका पाञ्चजन्य (1948 में स्थापित) में उपसंपादक के रूप में कार्यरत हैं। शिवम् की पत्रकारिता में राष्ट्रीयता, सामाजिक मुद्दों और तथ्यपरक रिपोर्टिंग पर जोर रहा है। उनकी कई रिपोर्ट्स, जैसे- नूंह (मेवात) हिंसा, हल्द्वानी वनभूलपुरा हिंसा, जम्मू-कश्मीर पर "बदलता कश्मीर", "नए भारत का नया कश्मीर", "370 के बाद कश्मीर", "टेररिज्म से टूरिज्म", और अयोध्या राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से पहले के बदलाव जैसे "कितनी बदली अयोध्या", "अयोध्या का विकास", और "अयोध्या का अर्थ चक्र", कई राष्ट्रीय मंचों पर सराही गई हैं। उपलब्धियों में देवऋषि नारद पत्रकार सम्मान (2023) शामिल है, जिसे उन्होंने जहांगीरपुरी हिंसा के मुख्य आरोपी "अंसार खान" की साजिश को उजागर करने के लिए प्राप्त किया। [Read more]
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