"भारत अविनाशी और मृत्युंजयी राष्ट्र है": सरकार्यवाह जी ने 30 हजार स्वयंसेवकों को दिया 'शाखा से राष्ट्रनिर्माण का मंत्र'
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“भारत अविनाशी और मृत्युंजयी राष्ट्र है”: सरकार्यवाह जी ने 30 हजार स्वयंसेवकों को दिया ‘शाखा से राष्ट्रनिर्माण का मंत्र’

RSS Centenary Bhopal: भोपाल के लाल परेड मैदान में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में 30 हजार स्वयंसेवकों का एकत्रीकरण। सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी ने रामायण के हनुमान-जामवंत प्रसंग से समझाया समाज का सामर्थ्य। पढ़ें पूरी रिपोर्ट

Written byShivam DixitShivam Dixit
Sep 20, 2026, 09:53 pm IST
inभारत, संघ @100, मध्य प्रदेश
RSS Centenary Bhopal Swayamsevak Ekagrikaran Dattatreya Hosabale Lal Parade Ground Panchjanya

भोपाल के लाल परेड मैदान में अनुशासन में खड़े स्वयंसेवक, मंच से उद्बोधन देते हुए RSS सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले जी

भोपाल। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शताब्दी वर्ष की गतिविधियों के क्रम में रविवार को भोपाल के लाल परेड मैदान में स्वयंसेवकों का विराट एकत्रीकरण आयोजित हुआ। अनुशासन, संगठन और राष्ट्रभाव से ओतप्रोत आयोजन में लगभग 30 हजार स्वयंसेवकों के साथ समाज से 5 हजार मातृशक्ति एवं महानुभाव सहभागी हुए। कार्यक्रम में संघ की शताब्दी यात्रा, समाज से संपर्क एवं सेवा कार्यों का प्रतिवेदन प्रस्तुत किया गया।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में एम्स भोपाल के निदेशक लेफ्टिनेंट जनरल डॉ. नरेंद्र कोतवाल उपस्थित रहे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी, मध्यभारत प्रांत संघचालक अशोक पांडेय जी तथा भोपाल विभाग संघचालक सोमकांत उमालकर जी मंचस्थ रहे।

कार्यक्रम का प्रारंभ स्वयंसेवकों द्वारा सामूहिक आसनों के प्रदर्शन से हुआ। इसके बाद सामूहिक योग प्रदर्शन हुआ। इन प्रस्तुतियों के बाद संघ के घोष वादकों ने विभिन्न रचनाओं का वादन किया।

अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुंचाना हमारी प्राथमिकता हो

मुख्य अतिथि लेफ्टिनेंट जनरल डॉ. नरेंद्र कोतवाल ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की यात्रा समाज निर्माण से राष्ट्र निर्माण की यात्रा है। ऐसे कार्यक्रम में उपस्थित होना उनके लिए गौरव का विषय है। संघ का कार्य व्यक्ति से शुरू होकर परिवार, समाज और राष्ट्र तक पहुंचता है। किसी भी राष्ट्र की शक्ति केवल उसकी भौतिक उपलब्धियों से निर्धारित नहीं होती, बल्कि उसके नागरिकों के चरित्र, सामाजिक एकता, कर्तव्य बोध और परस्पर सहयोग से भी निर्धारित होती है।

उन्होंने कहा कि राष्ट्र की प्रगति का वास्तविक अर्थ तभी पूरा होगा, जब समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास के अवसर पहुंचें और प्रत्येक नागरिक स्वयं को राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया का सहभागी समझे। साथ ही समाज के सामने रखे गए पंच परिवर्तन के विषयों पर विशेष ध्यान देने का आग्रह किया। उन्होंने सामाजिक समरसता, परिवार और संस्कार, पर्यावरण संरक्षण, आत्मनिर्भरता तथा नागरिक कर्तव्य जैसे विषयों को समाज के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण बताया।

उन्होंने कहा कि भारत की यात्रा निरंतर चलने वाली यात्रा है। समस्याएं आती रहेंगी, परिस्थितियां बदलती रहेंगी और नई चुनौतियां सामने आती रहेंगी, लेकिन समाज को अपनी शक्ति, चरित्र और संगठन के बल पर उनका सामना करने की क्षमता बनाए रखनी होगी। यही सामर्थ्य भारत की दीर्घजीवी सभ्यता की विशेषता रही है।

भारत का आगे बढ़ना विश्व मानवता के लिए भी आवश्यक

मुख्य वक्ता दत्तात्रेय होसबाले जी ने कहा कि भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है और यह प्रगति अनेक आयामों में दिखाई दे रही है। भारत का आगे बढ़ना केवल भारत के लिए ही नहीं, बल्कि विश्व मानवता के लिए भी आवश्यक है। आज विश्व में भारत की उपलब्धियों को अनेक क्षेत्रों में देखा जा सकता है। विज्ञान, अंतरिक्ष और अन्य क्षेत्रों में भारतीय वैज्ञानिकों ने देश का नाम आगे बढ़ाया है। इसके साथ ही विश्व के अनेक हिस्सों में भारत को लेकर उत्सुकता के साथ सम्मान, श्रद्धा और गौरव का भाव भी दिखाई दे रहा है।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत के परम वैभव के ध्येय को लेकर कार्य कर रहा है। यह यात्रा किसी एक उपलब्धि पर समाप्त होने वाली यात्रा नहीं है। समाज संगठन और व्यक्ति के चरित्र निर्माण का कार्य निरंतर चलता रहने वाला है।

भारत पांच हजार वर्षों की यात्रा के बाद भी जीवंत है

सरकार्यवाह जी ने कहा कि भारत की लगभग पांच हजार वर्षों की सभ्यतागत यात्रा में एक बात स्पष्ट दिखाई देती है कि संकट चाहे कितना भी बड़ा रहा हो, भारत हर बार उससे उबरकर आगे बढ़ा है। भारत ने विभिन्न कालखंडों में संकटों और संघर्षों का सामना किया, लेकिन समाज की जीवनशक्ति समाप्त नहीं हुई। उन्होंने कहा कि दुनिया में अनेक ऐसी सभ्यताएं और राष्ट्र रहे हैं जो कभी शक्तिशाली थे, लेकिन आज उनका स्मरण इतिहास में होता है या उनके अवशेष संग्रहालयों में दिखाई देते हैं। इसके विपरीत भारत आज भी एक जीवंत समाज के रूप में खड़ा है। उन्होंने भारत को “अविनाशी और मृत्युंजयी राष्ट्र” बताते हुए कहा कि किसी समाज की वास्तविक शक्ति इस बात में नहीं होती कि उसके सामने समस्याएं आती हैं या नहीं। महत्वपूर्ण यह है कि समस्याओं के सामने खड़े होने और उनका सामना करने का सामर्थ्य समाज के भीतर कितना है। उन्होंने कहा कि भारत के इतिहास में आक्रमण हुए, संघर्ष हुए, सामाजिक शिथिलता आई और अनेक प्रकार की चुनौतियां सामने आईं। इसके बावजूद समाज ने अपने अस्तित्व और सांस्कृतिक निरंतरता को बनाए रखा।

दत्तात्रेस होसबाले जी ने कहा कि लंबे समय तक चले पराधीनता के कालखंड में भारतीय समाज के भीतर अपने स्वरूप और सामर्थ्य को लेकर विस्मृति आई। समाज की आंतरिक शक्ति, राष्ट्रीय भाव और अपने दायित्व को लेकर जो सजगता होनी चाहिए थी, वह कमजोर हुई।

उन्होंने कहा कि आपसी राग-द्वेष, संघर्ष और सामाजिक कुरीतियों के कारण भी समाज की एकता प्रभावित हुई। जब समाज अपने इतिहास, संस्कृति और सामूहिक दायित्व को भूलता है तो उसकी शक्ति कमजोर होती है।

इसी संदर्भ में उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के पीछे डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की दृष्टि का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि डॉ. हेडगेवार ने विचार किया कि भारत ने इतिहास में ऐसे कालखंड देखे हैं, जब वह भौतिक और आध्यात्मिक दोनों क्षेत्रों में उन्नति के शिखर पर था और विश्व में उसका प्रभाव था, फिर ऐसी स्थिति क्यों आई कि समाज पराधीन हो गया। उन्होंने कहा कि इसका एक कारण यह था कि समाज अपने राष्ट्रभाव, अपनी भूमिका और अपने सामूहिक दायित्व को भूल गया था। इसी विस्मृति से बाहर निकालने के लिए व्यक्ति निर्माण और समाज संगठन को केंद्र में रखकर कार्य प्रारंभ किया गया।

हनुमान और जामवंत का उदाहरण देकर समझाई समाज की शक्ति

सरकार्यवाह जी ने रामायण में हनुमान जी और जामवंत का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि कभी-कभी व्यक्ति अपनी शक्ति को भूल जाता है। जब सीता जी की खोज के लिए समुद्र पार करने का प्रश्न सामने आया तो वानर दल में अलग-अलग लोग अपनी क्षमता बता रहे थे, लेकिन निर्णायक छलांग लगाने का साहस किसी में नहीं था।

उन्होंने कहा कि उस समय जामवंत ने हनुमान जी को उनकी शक्ति का स्मरण कराया। हनुमान जी के भीतर सामर्थ्य पहले से था, आवश्यकता केवल उस शक्ति के जागरण की थी। बचपन में सूर्य को फल समझकर उसकी ओर छलांग लगाने की कथा का स्मरण कराते हुए जामवंत ने उन्हें उनकी क्षमता का बोध कराया और इसके बाद हनुमान जी ने समुद्र लांघा।

उन्होंने कहा कि हिन्दू समाज भी कई बार अपनी शक्ति और सामर्थ्य को भूल जाता है। ऐसे समय समाज के भीतर से कोई महापुरुष, कोई विचार या कोई संगठन उसे उसकी शक्ति का बोध कराता है। डॉ. हेडगेवार ने संघ की स्थापना के समय इसी प्रकार समाज की अंतर्निहित शक्ति को जागृत करने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि जब समाज अपनी शक्ति पहचान लेता है तो असंभव दिखाई देने वाले कार्य भी संभव होने लगते हैं और असाध्य दिखाई देने वाले लक्ष्य साध्य बन सकते हैं।

यह राम, बुद्ध और महावीर की भूमि है

सरकार्यवाह जी ने कहा कि भारत की पहचान केवल उसके भूगोल से नहीं होती। यह केवल भूमि का एक टुकड़ा या एक राज्य व्यवस्था मात्र नहीं है। यह ऐसी सभ्यता है, जिसने जीवन को केवल भौतिक सुख और उपभोग तक सीमित नहीं माना। यह राम, बुद्ध और महावीर की भूमि है। इसका अर्थ है कि यह शील और चरित्र की भूमि है। भारतीय चिंतन में व्यक्ति के चरित्र निर्माण को अत्यंत महत्व दिया गया है।

इसीलिए संघ की शाखा के माध्यम से व्यक्ति के चरित्र निर्माण और समाज में संगठन के भाव को जागृत करने का प्रयास किया जाता है। उन्होंने कहा कि शाखा केवल शारीरिक अभ्यास का स्थान नहीं है। वहां व्यक्ति अपने से आगे बढ़कर समाज और राष्ट्र के बारे में विचार करना सीखता है।

उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को यह विचार करना चाहिए कि वह इस राष्ट्र का नागरिक है और इसलिए उसकी भी जिम्मेदारी है। प्रतिदिन यह विचार होना चाहिए कि अपने गांव, मोहल्ले, कार्यक्षेत्र और समाज के लिए वह राष्ट्रहित में क्या कर सकता है। देशभक्ति केवल 26 जनवरी, 15 अगस्त या किसी विशेष अवसर पर प्रकट होने वाला भाव नहीं है। देशभक्ति का अर्थ है कि व्यक्ति के जीवन में 24 घंटे राष्ट्र के प्रति दायित्व का भाव बना रहे।

उन्होंने कहा कि अपने कार्य को ईमानदारी से करना, समाज के लिए समय देना, जरूरतमंद की सहायता करना, अपने आसपास के वातावरण को बेहतर बनाना और राष्ट्रहित को ध्यान में रखकर निर्णय लेना भी नागरिक दायित्व का हिस्सा है।

कोविड महामारी का उल्लेख करते हुए कहा कि उस कठिन समय में स्वयंसेवकों और समाज ने मिलकर अनेक सेवा कार्य किए। संकट के समय समाज के अलग-अलग वर्गों के लोग एक साथ आए और आवश्यकता के अनुसार सेवा के कार्यों में सहभागी बने।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रभक्ति या सेवा केवल स्वयंसेवकों की जिम्मेदारी नहीं है। समाज के प्रत्येक व्यक्ति को संकट के समय आगे आना चाहिए। संघ का प्रयास समाज की इसी सामूहिक शक्ति को जागृत करना है।

उन्होंने असम में आई बाढ़ के दौरान सेवा भारती के स्वयंसेवकों द्वारा किए गए राहत कार्यों का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में स्वयंसेवक राहत और सहायता के कार्य में जुटे थे और समाज के विभिन्न वर्गों के लोग भी प्रभावित परिवारों की सहायता के लिए आगे आए।

उन्होंने कहा कि सेवा की भावना किसी एक संगठन तक सीमित नहीं हो सकती। संकट के समय पूरा समाज खड़ा हो, यही स्वस्थ सामाजिक व्यवस्था की पहचान है।

पंच परिवर्तन समाज के सकारात्मक बदलाव का आधार

दत्तात्रेय होसबाले जी ने कहा कि पिछले एक वर्ष में देशभर में छोटे-बड़े कार्यक्रमों के माध्यम से यह विचार किया गया कि समाज के साथ मिलकर कौन-कौन से सकारात्मक कार्य किए जा सकते हैं। इसी चिंतन से पंच परिवर्तन का विचार समाज के सामने रखा गया। पंच परिवर्तन में सामाजिक समरसता, नागरिक कर्तव्य, स्वबोध, पर्यावरण संरक्षण और कुटुंब प्रबोधन को प्रमुखता से बताया। ये पांचों विषय समाज के जीवन से जुड़े हुए हैं और इनके माध्यम से समाज में सकारात्मक परिवर्तन की दिशा तैयार की जा सकती है।

महामना मदन मोहन मालवीय का उदाहरण देते हुए कहा कि गांव और बस्ती के विकास की जिम्मेदारी केवल शासन-प्रशासन की नहीं हो सकती। वहां रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति की भी भूमिका है।

उन्होंने कहा कि यदि किसी गांव में शिक्षा, स्वच्छता, स्वास्थ्य या अन्य किसी क्षेत्र में कमी है तो केवल सरकार से अपेक्षा करने के बजाय समाज को भी अपनी क्षमता के अनुसार प्रयास करना चाहिए। सामूहिक जिम्मेदारी की यह भावना गांव और बस्ती को आत्मनिर्भर और सशक्त बना सकती है।

उन्होंने कहा कि समाज को अपनी नई पीढ़ी को रामायण, महाभारत, संतों की वाणी और गुरुओं के उपदेशों से परिचित कराना चाहिए। इन परंपराओं में जीवन, कर्तव्य, त्याग, सेवा और चरित्र निर्माण के अनेक संदेश हैं। परिवार और समाज को इन मूल्यों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास करना चाहिए।

जाति, पंथ, भाषा और प्रांत के भेद से समाज कमजोर होता है

उन्होंने कहा कि जाति, पंथ, भाषा और प्रांत के आधार पर स्वयं को अलग-अलग मानने से समाज की सामूहिक शक्ति कमजोर होती है। उन्होंने कहा कि यदि चार उंगलियां अलग-अलग रहें तो वे सीमित शक्ति रखती हैं, लेकिन जब वे एक साथ मिलकर मुट्ठी बनती हैं तो उनकी शक्ति कई गुना बढ़ जाती है। यही संगठन की शक्ति है। उन्होंने कहा कि भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में एकता का अर्थ विविधताओं को समाप्त करना नहीं है, बल्कि उन विविधताओं के बावजूद स्वयं को एक बड़े राष्ट्रीय परिवार का हिस्सा मानना है। हम सभी एक विशाल भारत परिवार के सदस्य हैं। ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना भारत की व्यापक दृष्टि को व्यक्त करती है। इसलिए समाज के विभिन्न वर्गों को जोड़ना और एक-दूसरे के सुख-दुख में सहभागी बनना आवश्यक है।

शाखा में प्रतिदिन एक घंटा समाज के लिए

उन्होंने कहा कि समाज संगठन कोई एक दिन का काम नहीं है। जिस प्रकार किसी खिलाड़ी या धावक को अपनी क्षमता बनाए रखने के लिए प्रतिदिन अभ्यास करना पड़ता है, उसी प्रकार समाज संगठन के लिए भी निरंतर प्रयास आवश्यक है। किसी धावक के लिए प्रतिदिन दौड़ने का अभ्यास करना हमेशा आसान नहीं होता, लेकिन निरंतर अभ्यास के बिना वह अपनी क्षमता विकसित नहीं कर सकता। इसी प्रकार समाज को संगठित करना सरल दिखाई दे सकता है, लेकिन उसे निरंतर करते रहना अनुशासन और धैर्य मांगता है। उन्होंने कहा कि शाखा में जाति और भाषा के भेद से ऊपर उठकर राष्ट्र की आराधना का भाव विकसित किया जाता है। व्यक्ति निर्माण और समाज संगठन का यह काम निरंतर चलना चाहिए।

सरकार्यवाह जी ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ स्वयं को समाज से अलग मानकर काम नहीं करता। संघ समाज का ही एक अंग है। समाज की शक्ति को संगठित करना, व्यक्ति में चरित्र निर्माण करना और समाज को अपने दायित्व के प्रति जागृत करना उसके कार्य का हिस्सा है। संघ का उद्देश्य किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है। व्यक्ति निर्माण से समाज संगठन और समाज संगठन से राष्ट्र निर्माण की यात्रा निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। भारत के परम वैभव का अर्थ केवल आर्थिक या सैन्य शक्ति नहीं है। भारत का परम वैभव ऐसा समाज खड़ा करने में है जो चरित्रवान, सक्षम, संगठित, संवेदनशील और अपने दायित्व के प्रति जागरूक हो।

उन्होंने कहा कि समाज में केवल आत्मविश्वास पर्याप्त नहीं है, बल्कि सामर्थ्य और क्षमता भी आवश्यक है। एक शक्तिशाली समाज का उद्देश्य किसी अन्य समाज या व्यक्ति को नुकसान पहुंचाना नहीं, बल्कि मानवता की स्थापना और मानव जीवन के विकास में योगदान करना होना चाहिए। भारत की परंपरा में शक्ति को हमेशा लोककल्याण से जोड़ा गया है। इसलिए समाज की शक्ति का उपयोग मानवता, राष्ट्र और संस्कृति की रक्षा तथा विकास के लिए होना चाहिए। भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है और इसके साथ देश के नागरिकों के भीतर आत्मविश्वास भी बढ़ रहा है। विश्व में भारत के प्रति बढ़ती रुचि और सम्मान को उन्होंने इस परिवर्तन का एक संकेत बताया।

उन्होंने कहा कि भारत के पुनरुत्थान की यात्रा में प्रत्येक नागरिक की भूमिका है। भारत को केवल एक भौगोलिक इकाई के रूप में देखने के बजाय एक जीवंत सभ्यता और समाज के रूप में समझना होगा।

उन्होंने कहा कि शिक्षक अपने विद्यार्थियों को अच्छे संस्कार देकर, किसान अपने श्रम से, वैज्ञानिक अपने शोध से, सैनिक अपनी सेवा से, व्यापारी ईमानदारी से व्यापार करके और सामान्य नागरिक अपने आसपास के समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाकर राष्ट्र निर्माण में योगदान दे सकता है। राष्ट्र के प्रति दायित्व को जीवन के सामान्य कार्यों से अलग नहीं किया जा सकता। व्यक्ति अपने दैनिक जीवन में जिस प्रकार का व्यवहार करता है, वही समाज के वातावरण को भी प्रभावित करता है।

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Shivam Dixit
Shivam Dixit
अनुभवी भारतीय पत्रकार, मीडिया एवं सोशल मीडिया विशेषज्ञ, राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार विजेता, और डिजिटल रणनीतिकार। वर्ष 2015 में पत्रकारिता की शुरुआत। प्रिंट, TV और डिजिटल मीडिया संस्थानों में विभिन्न भूमिकाओं में कार्य किया। भारत की प्रथम SMS समाचार एजेंसी "न्यूज़ नेटवर्क ऑफ इंडिया" (NNI) में रिपोर्टर कोऑर्डिनेटर के रूप में काम किया, डिजिटल मीडिया के अनोखे प्रोजेक्ट "इंडियाज़ पेपर" का नेतृत्व करते हुए 500 समाचार वेबसाइटों का प्रबंधन किया। भारत के अलग अलग राज्यों के लगभग 1000 स्थानीय पत्रकारों से जुड़ा यह प्रोजेक्ट "लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स" में दर्ज है। वर्ष 2022 से राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका पाञ्चजन्य (1948 में स्थापित) में उपसंपादक के रूप में कार्यरत हैं। शिवम् की पत्रकारिता में राष्ट्रीयता, सामाजिक मुद्दों और तथ्यपरक रिपोर्टिंग पर जोर रहा है। उनकी कई रिपोर्ट्स, जैसे- नूंह (मेवात) हिंसा, हल्द्वानी वनभूलपुरा हिंसा, जम्मू-कश्मीर पर "बदलता कश्मीर", "नए भारत का नया कश्मीर", "370 के बाद कश्मीर", "टेररिज्म से टूरिज्म", और अयोध्या राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से पहले के बदलाव जैसे "कितनी बदली अयोध्या", "अयोध्या का विकास", और "अयोध्या का अर्थ चक्र", कई राष्ट्रीय मंचों पर सराही गई हैं। उपलब्धियों में देवऋषि नारद पत्रकार सम्मान (2023) शामिल है, जिसे उन्होंने जहांगीरपुरी हिंसा के मुख्य आरोपी "अंसार खान" की साजिश को उजागर करने के लिए प्राप्त किया। [Read more]
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