स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद जी ने बड़े भारी मन से यह कहा था कि कोई देश विदेशी भाषा द्वारा न तो उन्नति कर सकता है, न ही राष्ट्रभावना की अभिव्यक्ति और जब तक देश में अंग्रेजी का आधिपत्य है तब तक स्वतंत्रता पर जनता का अधिकार अधूरा है। हो सकता है कि इन्हें यह शब्द अपने उन सहकारियों से सहयोग न मिलने के कारण कहने पड़े हों जो लंबे समय तक भारत में विदेशी भाषा का प्रभुत्व बनाए रखने के लिए एक हो गए थे। कौन नहीं जानता कि पंडित जवाहर लाल नेहरू भी उसी पक्ष में खड़े थे।
राजभाषा हिंदी और न्यायपालिका में भाषा का सवाल
विश्व का कोई भी देश ऐसा नहीं जहां अपनी भाषाओं का ऐसा अपमान होता हो जैसा मेरे देश में हो रहा है। चाहे सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 348 पर आधारित तर्क ही दिया है जिसमें सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट की कार्यवाही की भाषा अंग्रेजी कही गई है पर आम भारतीय और राष्ट्रभक्त भारतीय के लिए यह समाचार अत्यंत ही पीड़ादायक है कि सितंबर 2013 में भी हमारी हिंदी हिंदुस्तान के सुप्रीम कोर्ट में हार गई।
14 सितंबर 1949 को हिंदी को राजभाषा का दर्जा तो दिया गया और इसके लिए संविधान की धारा 343 से लेकर 352 तक की व्यवस्था की गई और यह कहा गया कि देवनागरी लिपि में भारतीय संघ की राजभाषा हिंदी होगी और संघ के राजकीय प्रायोजनों के लिए भारतीय अंकों का अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप ही होगा।
कैसी विडंबना है कि भारत का एक नागरिक सूचना अधिकार के अंतर्गत प्रार्थना पत्र देकर सुप्रीम कोर्ट से विकलांगों के बारे में सूचना मांगता है। पत्र हिंदी में दिया गया था, लेकिन उत्तर अंग्रेजी में मिला।
जानकारी मांगने वाले प्रार्थी ने आरटीआई कानून का हवाला देकर हिंदी में जवाब मांगा तो उत्तर मिला कि सुप्रीम कोर्ट की भाषा अंग्रेजी है। प्रार्थी ने मुख्य सूचना आयुक्त का दरवाजा खटखटाया। उनका तर्क यह था कि क्योंकि आवेदन आरटीआई कानून के तहत किया गया था इसलिए मुझे उत्तर भी हिंदी में ही दिया जाए।
अदालतों में हिंदी के प्रयोग को लेकर पुराने सवाल
1970 में सुप्रीम कोर्ट ने भी राज नारायण की याचिका पर सुनवाई से सिर्फ इसलिए इंकार कर दिया था क्योंकि वह हिंदी में बहस करना चाहते थे। वर्ष 2004 में एक प्रमुख नागरिक राजकुमार कौशिक की याचिका को स्वीकार ही नहीं किया, क्योंकि हिंदी के अधिकार की पैरवी करने वाली याचिका हिंदी में थी।
धीरे-धीरे ही सही देश की कुछ अदालतों में अब हिंदी और भारतीय भाषाओं का प्रवेश हो गया है। अब प्रश्न यह है कि हम कौन सा हिंदी दिवस मनाते हैं? क्या यह दिन मनाने का कोई लाभ होता है या सरकारी निर्देशों—आदेशों का पालन करके रस्म पूरी की जाती है?
वैसे ही नागपंचमी के दिन नाग देवता को दूध पिलाकर शेष वर्ष भर उसे डंडे से मारा जाता है या एक दिन पूर्वजों के नाम करके पितरों को खीर.हलवा खिलाकर ही अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ ली जाती है।
हिंदी माध्यम से शिक्षा और व्यक्तिगत अनुभव
बात पुरानी है, पर राज नारायण जी के सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिका अस्वीकृत किए जाने के बाद की। सन 1972 में पंजाब यूनिवर्सिटी में ज्ञानी की परीक्षा देने के लिए मैंने परीक्षा का फार्म हिंदी में भर दिया और परिणाम वही हुआ कि मेरी परीक्षार्थी के नाते उम्मीदवारी ही रद्द कर दी गई। हिंदी माध्यम से शोध कार्य के लिए भी उन दिनों आज्ञा नहीं थी।
कानून की शिक्षा के लिए एलएलबी में प्रवेश लेने के लिए मैंने हिंदी में फाॅर्म भरा। उसके कारण मुझे जितनी डांट सहनी पड़ी उससे यह सोचने को विवश हुई कि मैं स्वतंत्र भारत की नागरिक हूं या अभी भी विदेशी शासन की छाया का ग्रहण देश को लगा हुआ है।
देश के अलग-अलग क्षेत्रों में हिंदी का प्रसार
आज देश के पचास प्रतिशत से ज्यादा लोग हिंदी बोलते हैं और इससे भी ज्यादा समझते हैं। मिजोरम जैसे प्रांतों में भी हिंदी सिखाने-पढ़ाने के लिए निजी शिक्षण संस्थाएं काम कर रही हैं। सागर के बीचोंबीच बसे लक्षद्वीप और अंडेमार-निकोबार के कोने-कोने में हिंदी बोलने वाले, पढ़ने वाले और हिंदी के गीत गाने वाले मिलते हैं पर राजकीय स्तर पर हिंदी सम्मानपूर्वक स्थान नहीं पा सकी।
अपने पंजाब को ही देख लें संपर्क भाषा हिंदी और अंग्रेजी है पर पूरी पंजाब सरकार के कार्य व्यवहार में हिंदी को बहिष्कृत कर रखा है। पंजाब की अकाली—भाजपा सरकार ने अमृतसर में श्री दरबार साहिब तक विरासती मार्ग बनवाया। डंडे के बल से लोगों की दुकानों के डिजाइन बदलवाए और उन पर केवल अंग्रेजी और पंजाबी में उनके नामपट लगा दिए।
सारा पंजाब पूछता है कि क्या हिंदी हमारी विरासती भाषा नहीं? क्या हिंदी पंजाब की भाषा नहीं? अंग्रेजी तो वह भाषा है जो डायर ने गोलियां मार-मार कर हिंदुस्तानियों के मुंह में डाली थी। याद रखना होगा इसी विरासती मार्ग अर्थात हाल बाजार से डायर अपना फौजी जत्था लेकर निकला था जिसने जलियांवाला बाग में नृशंस हत्याकांड किया, लेकिन वहां डायर की भाषा पूरी तरह सम्मानित है।
फिर भी वे लोग हिंदी दिवस मनाएंगे जिन्होंने हिंदी को तिरस्कृत किया, निकाल दिया। जो भी भारतीय अमृतसर में पर्यटन के लिए आए वे जरूर देखें हिंदी को अपमानित कर अंग्रेजी को कैसे विकसित किया उस सरकार ने जो विरासत की बात करती रही।
हिंदी, पंजाबी और अंग्रेजी को लेकर बहस
जो सरकारें पंजाबी का प्रयोग न करने वाले कर्मचारियों पर दंड का प्रावधान करती हैं उनके घर, परिवार और व्यवहार में न हिंदी है, न पंजाबी। उनके बच्चों की शिक्षा का ऐसा प्रबंध है जिससे वे मां कहना भी भूल जाएं। आज पंजाब में और हिंदी भाषी प्रांतों में भी बोलबाला डायर तथा मैकाले की भाषा का है। केवल भाषा ही नहीं, अपितु संस्कृति को भी अंग्रेजी ग्रहण लग चुका है।
भारतेंदु हरिश्चंद्र और अपनी भाषा का संदेश
इसी महीने 9 सितंबर को भारतेंदु हरीशचंद्र जी का भी जन्मदिवस था। भारत स्वतंत्र होने से पहले जिन्होंने हिंदी का गद्य-पद्य, नाटक-कहानी आदि दी वे किसी को याद नहीं। किसी को भारतेंदु हरीशचंद्र के शब्द- अपनी भाषा है भली, भलो अपनो देश, जो कछु है अपनो भलो, यही राष्ट्र संदेश।
उन्होंने यह भी कहा था-
निज भाषा उन्नति अहै
सब उन्नति को मूल
बिन निज भाषा ज्ञान के
मिटे हीय को सूल
उन्होंने देश की भाषाओं की बात कही थी, किसी एक भाषा की नहीं क्योंकि भारत अनेक भाषाओं का देश है। बोलियां भी असंख्य हैं। अब अच्छा हो रहा है कि भारत सरकार की नई शिक्षा नीति भारतीय भाषाओं को प्रमुखता देने की बात कर रही है। कर देंगे तो बहुत अच्छा होगा।
शिक्षा में भाषा के आधार पर असमानता का सवाल
आज की विडंबना यह है कि जो मैकाॅले की भाषा में पढ़ाते हैं। भारत और भारतीयता से दूर करते हैं उन विद्यालयों में गरीब शिक्षा पाना तो दूर उन स्कूलों की दहलीज के अंदर भी नहीं जा सकता और अमीरों के लिए वही बढ़िया शिक्षा केंद्र हैं। देश में भाषा के आधार पर शिक्षा में भी असमानता है।
स्थिति तो यह है कि स्कूल जाते बच्चों के चेहरे, वेशभूषा और उनकी हालत देखकर ही पता चल जाता है कि ये बच्चे भारतीय भाषाओं में पढ़ने जा रहे हैं या मैकाले के स्कूल में।
विदेश, शिक्षा और भारतीय भाषाओं का भविष्य
दुर्भाग्य से अब तो नौकरी और उन्नति के राह ढूंढने के लिए भी विदेश ज्यादा आकर्षित कर रहा है। विद्या और व्यापार के लिए विदेश जाना किसी को मना नहीं, पर जब अपने देश के लोग ही विदेश जाते समय देश को यह प्रमाण पत्र देकर जाते हैं यहां कुछ है ही नहीं, सिस्टम ही बेइमान है तब किसी भी राष्ट्रभक्त के हृदय को ठेस पहुचंती है। यह उत्तर कोई नहीं देता कि बेईमान सिस्टम को बदलेगा कौन?
वैसे कौन नहीं जानता कि भारतीय भाषाओं के समाचार पत्रों के लेखक अंग्रेजी में लिखने वाले लेखकों के बराबर स्थान-सम्मान और धन नहीं प्राप्त कर पाते। अपनी भाषाओं वाले ही अपने लेखकों का अवमूल्यन करते हैं। भारतीय भाषाओं के लिए लड़ने, आंदोलन करने और जेलों में जाने वालों के घरों में भी हालत अच्छी नहीं। उनकी अगली पीढ़ी पूरी तरह अंग्रेजी भक्त ही नहीं अंग्रेजियत की पुजारी भी हो गई है।
स्वतंत्रता आंदोलन और हिंदी की भूमिका
संविधान सभा के अधिकतर सदस्यों का यह मत था कि आजादी में लड़ाई में हिंदी भाषा ने सारे देश को जोड़ा, देश प्रेम की भावना को मुखर किया, देश को अंग्रेजी शासन से स्वतंत्र करवाया। इसलिए स्वतंत्रता के पश्चात हमारे संविधान में देवनागरी में लिखी जाने वाली हिंदी भाषा को संघ की राजभाषा के रूप में घोषित किया जाए। यह हमारे देश की प्रतिनिधि भाषा है।
हमारे देश के बहुत से राज्यों में केवल हिंदी ही बोली जाती है और कुछ ऐसे प्रांत जहां हिंदी उनकी भाषा नहीं, पर आज उन राज्यों में भी हिंदी का प्रयोग जनता अधिक कर रही है। इस प्रकार हमारे देश में मान्यता प्राप्त प्रमुख भाषाओं में हिंदी सबसे आगे है।
हिंदी के सम्मान का अर्थ दूसरी भाषाओं का विरोध नहीं
आज के शासक विनोवा भावे जी को भूल गए जो कहते थे- मैं दुनिया की सब भाषाओं की इज्जत करता हूं, पर मेरे देश में हिंदी की इज्जत न हो यह मैं सह ही नहीं सकता। श्री रवीन्द्र नाथ टैगोर ने भी यह कहा कि भारतीय भाषाएं नदियां हैं और हिंदी महानदी। हिंदी के बिना हमारा काम चल ही नहीं सकता।
कैसी विडंबना है कि हिंदी के अच्छे जानकार भी संसद में अंग्रेजी बोलकर अपने ज्ञान की धाक जमाते हैं।
हमारे देश में कुछ प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति भी ऐसे हो चुके हैं जो हिंदी भाषी होते हुए भी अंग्रेजी में ही राष्ट्र को संबोधित करते रहे।
हिंदी दिवस को केवल औपचारिकता तक सीमित न रखने की अपील
बेचारी भारत माता के कान अपनी भाषाएं सुनने को तरस जाते हैं। केवल समारोह के लिए हिंदी दिवस मनाने वालों से एक ही निवेदन है कि डॉ. मार्टिन लूथर को ही सुन लें। उन्होंने कहा- हिंदी सीखे बिना भारतीयों के दिल तक पहुंचा नहीं जा सकता।
हमें याद रखना होगा कि स्वतंत्र भारत के नागरिकों का गौरव अपनी भाषा से है। स्वतंत्रता पूर्व उपन्यास सम्राट प्रेमचंद जी ने कहा था- जब आपके पास राष्ट्रभाषा ही नहीं तो आपका कोई राष्ट्र भी नहीं। गंगाधर तिलक जी ने यह कहा- सरलता से सीखी जाने वाली भाषाओं में हिंदी सर्वोपरि है, पर यह याद रखना होगा कि हिंदी प्रेम का अर्थ दूसरी भारतीय भाषाओं का विरोध नहीं।
हिंदी और भारतीय भाषाओं के भविष्य पर सवाल
सन 1949 से हिंदी और हिंदी दिवस की चर्चा की जा रही है। अब इस कोरी चर्चा के बाद देश की हालत यह हो गई है कि अपने दुधमुंहे बच्चे को भी अंग्रेजी में ही शिक्षा मिले, इसके लिए भारी भरकम रकम खर्च कर माता-पिता प्रयास करते दिखाई देते हैं।
आज का ज्वलंत प्रश्न तो यह है कि जब हमारी आर्थिक दृष्टि से मजबूत परिवारों की नई पीढ़ी हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं से दूर हो जाएगी तो देश में भारतीय भाषाओं का भविष्य क्या होगा।
केवल एक निवेदन लकीर की फकीरी पूरी करने के लिए हिंदी दिवस मत मनाइए। मंच सजाने और भाषण देने की कोई मजबूरी नहीं। हिंदी अर्थात् सभी भारतीय भाषाओं को दिल से जोड़ें तभी हिंदी दिवस मनाने का कोई भी अधिकारी है।
अधिकतर 14 सितंबर हिंदी दिवस श्राद्ध पक्ष के साथ ही जुड़ता है। अब भी हिंदी पक्ष या मास मनाते मनाते श्राद्ध पक्ष भी होगा।
हिंदी दिवस पर संकल्प
संकल्प लीजिए कि हिंदी के लिए श्रद्धा दिवस एक दिन के लिए नहीं है। यह पूरें राष्ट्र को सदैव के लिए राष्ट्रीय गौरव से जोड़ने का पर्व है।

















