
भुवनेश्वर: ओडिशा के कोरापुट जिले की पहाड़ियों में स्थित छायादार कॉफी बागानों से निकलकर एक स्थानीय उत्पाद अब नई दिल्ली के अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक मंच तक पहुंच गया है। पूर्वी घाट की पहाड़ियों में जनजातीय वर्ग के किसानों द्वारा उत्पादित कोरापुट की कॉफी राज्य की एक नई पहचान को दुनिया के सामने प्रस्तुत कर रही है।
कोरापुट के जनजातीय वर्ग के किसानों द्वारा उत्पादित प्रीमियम 100 प्रतिशत अरेबिका कॉफी ‘टाइगर ब्राइट’ को नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन को कवर करने वाले पत्रकारों के लिए तैयार मीडिया किट में शामिल किया गया है। इसके अलावा, सम्मेलन में शामिल प्रतिनिधियों और अतिथियों के लिए प्रदर्शित किए जा रहे उत्पादों में भी इस कॉफी को जगह दी गई है। इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर के अतिथियों को ओडिशा के इस विशिष्ट उत्पाद का स्वाद चखने का अवसर मिला है।
ब्रिक्स मीडिया और प्रतिनिधि किट में कोरापुट कॉफी को शामिल किया जाना केवल इसकी वैश्विक पहचान तक सीमित नहीं है। इससे जनजातीय वर्ग के किसानों की मेहनत, क्षेत्र की विशिष्ट कृषि-जलवायु परिस्थितियों और ओडिशा में विकसित हो रही कॉफी अर्थव्यवस्था को भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहचान मिली है।
विदेश मंत्रालय की पहल से मिला वैश्विक मंच
यह पहल विदेश मंत्रालय (MEA) के उस प्रयास का हिस्सा है, जिसके तहत अंतरराष्ट्रीय दर्शकों के सामने भारत की विविध क्षेत्रीय परंपराओं, स्थानीय उत्पादों और स्वदेशी उद्यमों को प्रदर्शित किया जा रहा है। ‘वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट’ (ODOP) पहल के तहत राज्यों से वैश्विक आयोजन के लिए अपने विशिष्ट स्थानीय उत्पाद उपलब्ध कराने का आग्रह किया गया था।
ओडिशा के लिए कोरापुट कॉफी का चयन कृषि, जनजातीय वर्ग की आजीविका, मूल्य संवर्धन, ब्रांडिंग और स्थानीय पहचान को एक साथ प्रस्तुत करने का अवसर बना है।
‘टाइगर ब्राइट’ में बसी है कोरापुट की पहचान
‘टाइगर ब्राइट’ कोरापुट के लगभग 920 से 950 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में उगाई जाती है। जिले के नंदपुर, माछकुंड, लक्ष्मीपुर, काशीपुर, दशमंतपुर, लमतापुट, कोरापुट और पट्टांगी प्रमुख कॉफी उत्पादक क्षेत्र हैं। क्षेत्र की विशिष्ट कृषि-जलवायु परिस्थितियां कॉफी उत्पादन के लिए अनुकूल हैं। यहां कॉफी के पौधे आमतौर पर प्राकृतिक छाया में उगाए जाते हैं और इनके आसपास आम, कटहल तथा खट्टे फलों के पेड़ पाए जाते हैं। कॉफी चेरी को पूरी तरह पकने के बाद हाथ से तोड़ा जाता है और गुणवत्ता तथा स्वाद बनाए रखने के लिए सावधानीपूर्वक प्रसंस्करण किया जाता है।
यह प्रीमियम अरेबिका कॉफी है, जिसे वॉश्ड-प्रोसेस के बाद हल्के-मध्यम स्तर तक रोस्ट किया जाता है। इसके स्वाद में संतरा, नींबू और मौसंबी जैसे उष्णकटिबंधीय खट्टे फलों की ताजगी के साथ कैरामेल, चॉकलेट और कोको की हल्की झलक मिलती है। विदेश मंत्रालय के अनुरोध के बाद टीडीसीसीओएल (TDCCOL) ने ‘टाइगर ब्राइट’ के लगभग 1,500 पैकेट नई दिल्ली भेजे। प्रत्येक पैकेट 250 ग्राम का था।
स्थानीय उत्पाद को मिला अंतरराष्ट्रीय मंच
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में देश के विभिन्न राज्यों के स्थानीय उत्पादों के साथ ‘टाइगर ब्राइट’ की मौजूदगी ने कोरापुट कॉफी को उसके पारंपरिक उपभोक्ता आधार से कहीं व्यापक मंच उपलब्ध कराया है।
विदेश मंत्रालय ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में राज्यों के स्वदेशी और स्थानीय उत्पादों को प्रदर्शित करने के लिए आमंत्रित किया था। ओडिशा ने कोरापुट कॉफी का चयन किया, जबकि बिहार ने पारंपरिक सत्तू और मखाना तथा गुजरात ने हस्तशिल्प प्रदर्शित किए।
उत्पादों की यह विविधता दर्शाती है कि भारत एक बड़े अंतरराष्ट्रीय आयोजन का उपयोग केवल कूटनीतिक संवाद के लिए ही नहीं, बल्कि देश की समृद्ध क्षेत्रीय पहचान और स्थानीय उत्पादों को दुनिया के सामने रखने के लिए भी कर रहा है।
मुख्यमंत्री माझी ने बताया गौरव का क्षण
ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने ब्रिक्स इंडिया 2026 शिखर सम्मेलन में कोरापुट कॉफी को शामिल किए जाने का स्वागत किया। उन्होंने इसे दुनिया के सामने ओडिशा की कहानी प्रस्तुत करने का एक और माध्यम बताया।
सोशल मीडिया पोस्ट में मुख्यमंत्री ने कहा कि पिछले कुछ दिनों से वह वैश्विक मंचों पर ओडिशा के बारे में बात कर रहे हैं और दुनिया को राज्य में मौजूद अवसरों, ताकत और संभावनाओं से परिचित करा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में कोरापुट कॉफी के माध्यम से ओडिशा की “एक और कहानी” सामने आना विशेष रूप से सुखद है। मुख्यमंत्री ने कहा कि यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘वोकल फॉर लोकल’ के विचार की वास्तविक भावना को दर्शाता है, जिसके माध्यम से स्थानीय उत्पादों को वैश्विक मंच तक पहुंचने का अवसर मिल रहा है।
उन्होंने कहा, “ओडिशा से बाहर हमारे लोगों की मेहनत और हमारी धरती की समृद्धि को पहचान मिलते देखना मेरे लिए बेहद गर्व का क्षण है।” माझी ने कहा कि वह चाहते हैं कि दुनिया ऐसे ओडिशा को जाने, जो अपनी मिट्टी से जुड़ा हुआ है, अपनी पहचान पर गर्व करता है और अपनी कहानी दुनिया के साथ साझा करने का आत्मविश्वास रखता है।
राज्यपाल ने किसानों की वैश्विक पहचान को सराहा
ओडिशा के राज्यपाल डॉ. हरि बाबू कंभमपति ने भी ब्रिक्स मीडिया किट में कोरापुट कॉफी को शामिल किए जाने को राज्य के लिए गौरव का क्षण बताया। सोशल मीडिया पोस्ट में राज्यपाल ने कहा कि यह प्रदर्शन ‘वोकल फॉर लोकल’ की भावना को दर्शाता है, क्योंकि इसके माध्यम से किसानों, स्थानीय उत्पादों और ओडिशा की समृद्ध क्षेत्रीय विरासत को वैश्विक मंच मिला है।
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की स्थानीय ताकतें नई ऊंचाइयों तक पहुंच रही हैं।
स्थानीय पहल से विकसित हुई कॉफी अर्थव्यवस्था
कोरापुट कॉफी ब्रांड के संगठित विकास को 11 सितंबर 2019 को इसके औपचारिक शुभारंभ के बाद गति मिली। इस पहल का उद्देश्य आदिवासी किसानों द्वारा उत्पादित कॉफी के लिए एक व्यवस्थित बाजार तैयार करना और पूरी मूल्य श्रृंखला को मजबूत करना था, ताकि किसानों तथा स्थानीय समुदायों को अपने उत्पाद से उत्पन्न आर्थिक मूल्य का अधिक लाभ मिल सके। समय के साथ यह पहल खरीद, सुखाने, ग्रेडिंग, प्रसंस्करण, ब्रांडिंग, विपणन और खुदरा बिक्री तक फैले व्यापक तंत्र में विकसित हुई है।
इस वृद्धि का असर खरीद के आंकड़ों में भी दिखाई देता है। 2025-26 के सीजन में टीडीसीसीओएल ने रिकॉर्ड 102.54 मीट्रिक टन कॉफी फल की खरीद की, जो 2022-23 में खरीदी गई 34.68 मीट्रिक टन मात्रा की तुलना में लगभग तीन गुना और 2024-25 की 34.41 मीट्रिक टन खरीद से काफी अधिक है।
इस बढ़ी हुई खरीद से करीब 360 जनजातीय परिवारों को लाभ मिला है, जो क्षेत्र में आजीविका के अवसर के रूप में कॉफी की बढ़ती भूमिका को दर्शाता है। किसानों को सीधे भुगतान और पारदर्शिता बढ़ाने के लिए खरीद व्यवस्था को भी आधुनिक बनाया गया है। टीडीसीसीओएल ने पारंपरिक नकद लेनदेन की जगह सीधे बैंक हस्तांतरण की व्यवस्था अपनाई है और आदिवासी कॉफी किसानों के बैंक खातों में 1.07 करोड़ रुपये सीधे हस्तांतरित किए हैं।
इस पहल में आदिवासी महिलाओं की भागीदारी भी बढ़ी है। कुल 71 जनजातीय वर्ग के महिला किसान इससे जुड़ी हैं, जबकि कॉफी उत्पादकों की पहचान और डिजिटल निगरानी को आसान बनाने के लिए 45.7 प्रतिशत उत्पादकों ने स्मार्ट कार्ड अपनाए हैं।
कॉफी बीन्स से आगे बढ़ा मूल्य संवर्धन
कोरापुट कॉफी का विकास अब केवल कच्चे कॉफी फल के उत्पादन तक सीमित नहीं है। इसका फोकस प्रसंस्करण, गुणवत्ता सुधार, ब्रांडिंग, खुदरा बिक्री और उपभोक्ता जुड़ाव तक विस्तारित हो चुका है।
टीडीसीसीओएल ने ओडिशा और दिल्ली में कोरापुट कॉफी ब्रांड के आठ कैफे स्थापित किए हैं, जिनमें नाल्को दामनजोड़ी का आउटलेट भी शामिल है। इन कैफे के माध्यम से ब्रांड को सीधे उपभोक्ताओं तक पहुंचाने के साथ-साथ कॉफी के पीछे की कहानी को भी लोगों तक पहुंचाया जा रहा है। 2023-24 वित्तीय वर्ष में इन कैफे की बिक्री 1.64 करोड़ रुपये रही।
उत्पाद श्रृंखला भी ‘टाइगर ब्राइट’ के अलावा रोस्टेड बीन्स और इंस्टेंट कॉफी तक विस्तारित हुई है। ‘टाइगर ब्राइट’ के 10,634 से अधिक पैकेट बाजार में उतारे जा चुके हैं। यह संकेत है कि कोरापुट कॉफी एक क्षेत्रीय कृषि उत्पाद से आगे बढ़कर एक ब्रांडेड उपभोक्ता उत्पाद बन रही है।
राष्ट्रीय स्तर पर भी मिली पहचान
कोरापुट कॉफी को राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में भी पहचान मिली है। इस उत्पाद ने KYK 2024 में दो फाइन कप पुरस्कार जीते और कॉफी बोर्ड की फ्लेवर ऑफ इंडिया फाइन कप 2024 प्रतियोगिता में चौथा स्थान हासिल किया। इन उपलब्धियों ने कोरापुट को उभरते कॉफी उत्पादक क्षेत्र के रूप में स्थापित करने में मदद की है और ऐसे उत्पाद के प्रति देशभर में जागरूकता बढ़ाई है, जो कभी मुख्य रूप से ओडिशा तक ही सीमित था।
प्रधानमंत्री मोदी ने पहले ही इसे बताया है ‘ओडिशा का गौरव’
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी पहले ‘मन की बात’ कार्यक्रम में कोरापुट कॉफी की सराहना की थी। 26 अक्टूबर को उन्होंने इसके स्वाद का उल्लेख करते हुए इसे ‘ओडिशा का गौरव’ बताया था। मोदी ने कहा था कि कॉफी को केवल उसके स्वाद के लिए ही सराहना नहीं मिल रही है, बल्कि इसकी खेती क्षेत्र के लोगों, विशेषकर महिलाओं के लिए आजीविका के अवसर भी पैदा कर रही है।
उन्होंने कोरापुट कॉफी के असाधारण स्वाद और क्षेत्र के लोगों को इससे मिल रहे लाभ का उल्लेख किया था। प्रधानमंत्री ने यह भी बताया था कि कुछ लोगों ने कॉफी के प्रति अपने जुनून के चलते इसकी खेती शुरू की, जिनमें कॉरपोरेट क्षेत्र में काम कर चुके लोग भी शामिल हैं। उन्होंने कॉफी की खेती से महिलाओं के जीवन में आए बदलाव को भी रेखांकित किया था और कहा था कि इससे उन्हें सम्मान और समृद्धि दोनों मिले हैं।
कलेक्टर ने मिट्टी, जलवायु और किसानों की मेहनत को बताया आधार
कोरापुट के कलेक्टर मनोज सत्यवान महाजन ने कहा कि कॉफी केवल एक व्यावसायिक उत्पाद नहीं है।
उन्होंने कहा, “कोरापुट कॉफी केवल एक उत्पाद नहीं है, बल्कि यह मिट्टी की समृद्धि, क्षेत्र की विशिष्ट कृषि-जलवायु परिस्थितियों और हमारे आदिवासी किसानों की मेहनत का प्रतिनिधित्व करती है।”
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में इसकी मौजूदगी को उन्होंने गर्व का विषय बताते हुए कहा कि इस मंच के माध्यम से कोरापुट की विशिष्ट पहचान और आदिवासी कृषि समुदायों के योगदान को प्रदर्शित करने का अवसर मिला है।
किसानों को बड़े बाजार की उम्मीद
कोरापुट के कॉफी उत्पादकों ने भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिली पहचान का स्वागत किया है। किसानों को उम्मीद है कि ब्रिक्स मंच के माध्यम से कोरापुट कॉफी भारत और विदेशों के बड़े बाजारों तक पहुंच सकेगी। कोरापुट जिले के पुंजीसिल गांव की कॉफी उत्पादक किसान ने कहा कि ब्रिक्स किट में ‘टाइगर ब्राइट’ को शामिल किए जाने से किसानों में बाजार के विस्तार को लेकर उम्मीद जगी है।
उन्होंने कहा कि इस अवसर से प्रतिनिधियों को न केवल कोरापुट कॉफी की विशिष्ट खुशबू और स्वाद का अनुभव मिलेगा, बल्कि इसके पीछे काम करने वाले आदिवासी किसानों और समुदायों की कहानी से भी परिचित होने का अवसर मिलेगा। किसानों के लिए व्यापक पहचान का अर्थ अधिक मांग, बेहतर बाजार पहुंच और क्षेत्र के कॉफी उत्पादक समुदायों को अधिक दृश्यता के रूप में सामने आ सकता है।
पूर्वी घाट से ब्रिक्स मंच तक
‘टाइगर ब्राइट’ की कहानी मूल रूप से भूगोल, लोगों और उद्यम के एक साथ आने की कहानी है।
कोरापुट के वनाच्छादित और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में उगाई जाने वाली यह कॉफी अपने भौगोलिक परिवेश की विशेषताओं को समेटे हुए है। जनजातीय वर्ग के किसानों द्वारा इसकी खेती इसे आजीविका का माध्यम बनाती है। संगठित मूल्य श्रृंखला के जरिए प्रसंस्करण और ब्रांडिंग ने इसे विशिष्ट पहचान दी है। वहीं, ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में प्रदर्शन ने अब इस पहचान को दुनिया के सामने रखने का अवसर दिया है।
भारत के महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक आयोजनों में कोरापुट कॉफी की मौजूदगी यह दर्शाती है कि स्थानीय स्तर पर जड़ें रखने वाले उत्पाद अपने क्षेत्रों के वैश्विक दूत बन सकते हैं। ओडिशा के लिए ‘टाइगर ब्राइट’ केवल कॉफी की कहानी नहीं है। यह जनजातीय वर्ग के उद्यम, कृषि विविधीकरण, मूल्य संवर्धन, महिला भागीदारी, ब्रांडिंग और बाजार तक पहुंच की कहानी भी है। कोरापुट के किसानों के लिए ब्रिक्स में मिली जगह उन प्रयासों की पहचान है, जिनकी शुरुआत जिले की पहाड़ियों और कॉफी बागानों से हुई थी।
राज्य के लिए यह इस बात का सशक्त उदाहरण है कि उसकी धरती की समृद्धि और लोगों का कौशल अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी जगह बना सकता है।
पूर्वी घाट के छायादार कॉफी बागानों से नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेज तक ‘टाइगर ब्राइट’ ने एक उल्लेखनीय यात्रा तय की है। यह यात्रा अभी जारी है, लेकिन इसका संदेश स्पष्ट है—जब स्थानीय उत्पादों को संगठित मूल्य श्रृंखला, गुणवत्ता सुधार, ब्रांडिंग और बाजार तक पहुंच का समर्थन मिलता है, तो वे अपने समुदायों की कहानी को अपने मूल स्थान से बहुत दूर तक पहुंचा सकते हैं।