भोपाल (मध्य प्रदेश)। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय (MCU) में स्वामी विवेकानंद के ऐतिहासिक शिकागो विश्व धर्म सम्मेलन व्याख्यान की पावन स्मृति में विशेष व्याख्यान का गरिमामय आयोजन किया गया. ‘युवा भारत: कल, आज और कल’ विषय पर आयोजित इस बौद्धिक सत्र में मुख्य वक्ता के रूप में प्रखर विचारक मुकुल कानिटकर उपस्थित रहे, जबकि अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी ने की. कार्यक्रम के दौरान मुख्य वक्ता ने विद्यार्थियों की वैचारिक जिज्ञासाओं का समाधान भी किया.
मुकुल कानिटकर ने युवाओं को आत्ममंथन का संदेश देते हुए कहा कि “तू कौन है, कहाँ से आया है और तेरे जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य क्या है?”—जो व्यक्ति इन प्रश्नों का सामना करने का साहस जुटाता है और इनके उत्तर खोजता है, वास्तव में वही सच्चा युवा और महापुरुष है. स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, संत मीराबाई और डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने जब स्वयं से ये प्रश्न पूछे, तो उनके जीवन की दिशा बदल गई. प्रत्येक युवा को प्रतिदिन दर्पण देखते समय यह आत्म-प्रश्न पूछना चाहिए.

“कष्ट और अपमान झेलने के बाद भी नहीं की कोई शिकायत, यही थी विवेकानंद की शक्ति”
शिकागो धर्म सम्मेलन (11 सितंबर 1893) के प्रसंग का उल्लेख करते हुए मुकुल कानिटकर ने बताया कि जब स्वामी विवेकानंद ने मंच से संबोधन शुरू किया, तो सभागार में कई मिनटों तक करतल ध्वनि गूंजती रही. इसका कारण केवल ‘भाइयो और बहनो’ शब्द नहीं, बल्कि उसके पीछे की गहन भावपूर्ण अभिव्यक्ति और पवित्रता थी.
“शिकागो व्याख्यान से पहले स्वामी जी ने अमेरिका में डेढ़ महीने तक भीषण अभाव, कष्ट और तिरस्कार का विषपान किया। परंतु जब उन्हें बोलने का अवसर मिला, तो उन्होंने किसी के प्रति कोई कटुता या शिकायत नहीं रखी। उन्होंने आत्मीयता से कहा—’मेरे प्यारे अमेरिकी बहनों और भाइयों’। इस आंतरिक शक्ति ने सभी के हृदय पर शक्तिपात कर दिया। जो शक्तिहीन होता है, वह शिकायत करता है; युवा तो हर परिस्थिति में समाधान प्रस्तुत करता है।” – मुकुल कानिटकर, प्रखर विचारक
उन्होंने बताया कि स्वामी जी के प्रभाव के कारण उस सम्मेलन में उनके कुल 7 भाषण हुए. पाश्चात्य देशों में उनके कार्यों पर अमेरिकी शोधकर्ता मैरी लुई बर्क (जिन्हें बाद में ‘सिस्टर गार्गी’ के नाम से जाना गया) ने ‘स्वामी विवेकानंद इन द वेस्ट: न्यू डिस्कवरीज़’ शीर्षक से 6 खंडों में दुनिया का सबसे प्रामाणिक और ऐतिहासिक शोध ग्रंथ रचा.

“11 सितंबर 1893 हिन्दू धर्म के पुनर्जन्म का दिन”- भगिनी निवेदिता का स्मरण
मुकुल कानिटकर ने कहा कि भगिनी निवेदिता के अनुसार 11 सितंबर 1893 हिंदू धर्म के पुनर्जन्म का दिन था, जिसने संपूर्ण विश्व में सनातन संस्कृति के प्रति संकीर्ण धारणाओं को बदल दिया. उन्होंने स्वामी जी द्वारा मद्रास में युवाओं से पूछे गए तीन प्रश्नों का उल्लेख किया:
- पहला प्रश्न: क्या आप अंतःकरण से भारत भूमि को अपनी सच्ची माता मानते हैं?
- दूसरा प्रश्न: क्या आपने अपने विवेक और मस्तिष्क का उपयोग देश की समस्याओं के ठोस समाधान के लिए किया है?
- तीसरा प्रश्न: क्या उस समाधान को साकार करने के लिए आप अपने हाथों से प्रत्यक्ष सेवा कार्य करने को तत्पर हैं?

उन्होंने युवाओं से ज्वलंत प्रश्न पूछते हुए कहा कि यदि हम भारत को माता मानते हैं, तो हम इसे अस्वच्छ क्यों करते हैं और प्लास्टिक का उपयोग कर भूमि को क्यों दूषित करते हैं? उन्होंने युवाओं से स्वदेशी अथवा मित्र राष्ट्रों के उत्पाद अपनाने का आग्रह किया.
सकारात्मक पत्रकारिता और संस्कृति-आधुनिकता का संतुलन
आधुनिकता की व्याख्या करते हुए मुकुल कानिटकर ने स्पष्ट किया कि आधुनिकता केवल तकनीक और उपकरणों में होती है, संस्कृति में नहीं. संस्कृति शाश्वत प्रवाह है. हमें अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहते हुए विचारों और तकनीकी दृष्टि से आधुनिक बनना होगा.
पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के विचारों को उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा कि जब कोई पत्रकार राष्ट्रभक्ति से परिपूर्ण होता है, तो वह समाज को नई प्रेरणा देने वाले समाचार सृजित करता है. नकारात्मक तथ्य तो स्वतः फैल जाते हैं, परंतु सकारात्मक और रचनात्मक विषयों को सामने लाने के लिए गहरी दृष्टि और अथक परिश्रम की आवश्यकता होती है.

कार्यक्रम की प्रमुख झलकियां:
- कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी का विचार: अध्यक्षीय उद्बोधन में कुलगुरु ने कहा कि 1893 के ऐतिहासिक घटनाक्रम ने विश्व को भारत का एक सर्वथा नया परिचय दिया और रामकृष्ण परमहंस द्वारा चुने गए स्वामी जी के विचारों ने भारत को देखने का वैश्विक नजरिया बदल दिया.
- प्रतिभाशाली छात्र पुरस्कृत: स्वामी विवेकानंद के जीवन दर्शन पर आयोजित फीचर लेखन एवं प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता के विजयी छात्र-छात्राओं को मंच से सम्मानित किया गया.
- सफल संचालन: कार्यक्रम का संचालन पत्रकारिता विभाग की छात्रा अनन्या एवं जनसंचार विभाग की छात्रा सुमेधा ने किया, जबकि आभार प्रदर्शन कुलसचिव प्रो. पी. शशिकला द्वारा किया गया.











