भारत लगातार खुद को बड़े और लंबे युद्ध को ध्यान में रखकर तैयारी कर रहा है। देश ने लगभग हर बड़े युद्ध संबंधी काम के लिए अपने मिसाइल सिस्टम बना लिए हैं। चाहे हवा से हवा में मार करने वाली हों, जमीन से हवा में, टैंक रोधी, जहाज रोधी या लंबी दूरी तक हमला करने वाली। लेकिन असली चुनौती यह है कि इनका उत्पादन इतनी बड़ी संख्या में हो और लंबे युद्ध में जब स्टॉक खत्म हो तो जल्दी से दोबारा बनाया जा सके।
अगस्त 2026 के आखिरी हफ्ते में सरकार ने DRDO के पारंपरिक मिसाइल सिस्टम की तकनीक भारतीय कंपनियों को देने का फैसला किया। इससे यह सवाल सामने आया कि भारत के पास कौन-कौन सी मिसाइल हैं, उनकी रेंज कितनी है, कितनी स्वदेशी हैं और कहां कमी है।
पिछले साल मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर ने दिखाया कि लंबे ऑपरेशन में सटीक हथियार, एयर डिफेंस और पर्याप्त मिसाइल स्टॉक कितने जरूरी हैं। उसी महीने आंध्र प्रदेश के नगायालंका में 1460 करोड़ रुपये की नवदुर्गा डिफेंस टेस्टिंग रेंज का शिलान्यास हुआ। जुलाई 2026 में प्रोजेक्ट कुशा का पहला उड़ान परीक्षण हुआ। यह स्वदेशी लंबी दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल है जिसकी रेंज 400 किलोमीटर तक हो सकती है। अगस्त 2026 में रक्षा मंत्री ने डीआरडीओ की तकनीक निजी कंपनियों को ट्रांसफर करने की मंजूरी दी। 2028 से 2030 के बीच प्रोजेक्ट कुशा को चरणबद्ध तरीके से शामिल करने की योजना है।
भारत के पास कौन-कौन सी पारंपरिक मिसाइलें हैं
एयर डिफेंस में आकाश, आकाश-एनजी, ORSAM और VSHORDS हैं। हवा से हवा में अस्त्र परिवार की मिसाइलें बन रही हैं। रडार और एयर डिफेंस सिस्टम को नष्ट करने के लिए रुद्रम है। टैंक रोधी में नाग परिवार, सैंट और एमपी-एटीजीएम हैं। नौसेना के लिए एनएएसएम-एसआर जैसी एंटी-शिप मिसाइलें हैं। जमीन पर हमले के लिए लॉन्ग रेंज लैंड अटैक क्रूज मिसाइल और प्रलय है। पिनाका रॉकेट आर्टिलरी का काम करती है। ब्रह्मोस भारत-रूस का संयुक्त प्रोग्राम है और MRSAM भारत-इजरायल का। अग्नि और के-सीरीज रणनीतिक मिसाइलें हैं जो परमाणु निवारक का हिस्सा हैं, इसलिए इनके लिए तकनीक नहीं खोली गई।
वहीं अगर हम इन मिसाइलों की मारक क्षमताओं को देखें तो अस्त्र मार्क-1 की रेंज 100 किलोमीटर से ज्यादा है। मार्क-2 की करीब 200 किलोमीटर और मार्क-3 (गांडीव) और ज्यादा दूर तक जाएगी। प्रलय 500 किलोमीटर तक मार कर सकती है। ब्रह्मोस की रेंज करीब 450 किलोमीटर है और 800 किलोमीटर वाली भी बन रही है। पिनाका गाइडेड रॉकेट करीब 120 किलोमीटर तक जाते हैं। क्यूआरएसएएम की रेंज करीब 30 किलोमीटर है। लंबी दूरी की एयर डिफेंस के लिए रूसी एस-400 है और प्रोजेक्ट कुशा को इसका स्वदेशी विकल्प बनाया जा रहा है।
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कमी कहां है?
हालांकि, सरकार की कोशिशों का नतीजा यह रहा है कि इस क्षेत्र में कई बड़ी निजी कंपनियां भी उतर चुकी हैं। लेकिन, फिर भी मुख्य समस्या उत्पादन क्षमता की है। भारत मिसाइल डिजाइन, डेवलप और टेस्ट कर सकता है, लेकिन लंबे समय तक बड़ी संख्या में बनाने और युद्ध के दौरान स्टॉक भरने में दिक्कत है। अगर कोई मिसाइल सिर्फ एक-दो फैक्ट्री पर निर्भर हो तो वहां रुकावट आने पर सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है। कई कंपनियां बनाएं तो बेहतर रहेगा। कई बार मिसाइल भारत में असेंबल होती है लेकिन सीकर, प्रोपल्शन, इलेक्ट्रॉनिक्स या खास सामग्री बाहर से आती है।
स्वदेशीकरण का मतलब क्या है
सिर्फ भारत में असेंबल करना स्वदेशीकरण नहीं है। मिसाइल में एयरफ्रेम, प्रोपल्शन, सीकर, गाइडेंस, इलेक्ट्रॉनिक्स, वारहेड और सॉफ्टवेयर होते हैं। कई चीजें अभी भी विदेश से आती हैं। सरकार के अनुसार 15,700 से ज्यादा डिफेंस आइटम स्वदेशी हो चुके हैं जिससे करीब 9,000 करोड़ रुपये का आयात घटा है। घरेलू रक्षा उत्पादन 2025-26 में 1.78 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया है। जिसमें, निजी क्षेत्र का हिस्सा करीब 24 प्रतिशत है।
सबसे मुश्किल कंपोनेंट कौन से हैं
सीकर, प्रोपल्शन सिस्टम और एडवांस्ड इलेक्ट्रॉनिक्स सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील हैं। भारत ने स्वदेशी सीकर और गैलियम-नाइट्राइड जैसी तकनीक में तरक्की की है, लेकिन कुछ खास हिस्सों के लिए अभी भी विदेश पर निर्भरता है। युद्ध के समय अगर आयातित हिस्सा न मिले तो असेंबली भी रुक सकती है।
उदाहरण के तौर पर भारत की रीढ़ कही जाने वाली ब्रह्मोस की ही बात करें तो यह पूरी तरह स्वदेशी नहीं है। यह भारत-रूस का संयुक्त प्रोग्राम है। भारत ने कई कंपोनेंट, इलेक्ट्रॉनिक्स और कंट्रोल सिस्टम लोकल बनाए हैं लेकिन प्रोपल्शन जैसे कुछ महत्वपूर्ण हिस्से अभी भी रूसी हैं।
भारत के पास क्या कमी है
लंबी दूरी की एयर डिफेंस में एस-400 सबसे ऊंची क्षमता है। प्रोजेक्ट कुशा इससे निर्भरता कम करेगा। हवा से हवा में अस्त्र मार्क-1 स्वदेशी है, मार्क-2 और आगे वाली वर्जन ज्यादा रेंज देंगी। बीच के समय के लिए रूसी आर-37एम पर भी विचार हो रहा है। जरूरत ज्यादा प्रकार की मिसाइलों की नहीं बल्कि ज्यादा उत्पादन, गहरे स्टॉक और मजबूत सप्लाई चेन की है।
निजी कंपनियां भी कर रही उत्पादन
अडानी डिफेंस ने कानपुर के पास 3,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का प्लांट लगाया है। कल्याणी की इजरायली कंपनी के साथ जॉइंट वेंचर है। लार्सन एंड टुब्रो, टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स, भारत फोर्ज जैसी कंपनियां काम कर रही हैं। डीआरडीओ ने 130 से ज्यादा कंपनियों को तकनीक ट्रांसफर की है। लेकिन, पूरी मिसाइल बनाने के लिए खास इंफ्रास्ट्रक्चर, मशीनें, टेस्टिंग और सप्लायर नेटवर्क चाहिए। सिर्फ तकनीक मिलने से काम नहीं चलेगा। फैक्ट्री, मशीन, कुशल कर्मचारी और बड़े-बड़े नियमित ऑर्डर चाहिए। छोटे या अनियमित ऑर्डर से डेडिकेटेड प्रोडक्शन लाइन लगाना मुश्किल है।

















