
हाल ही में किर्गिस्तान के बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) का 26वां शिखर सम्मेलन हुआ। इसमें सदस्य देशों ने ‘बिश्केक डिक्लेरेशन’ अपनाया। इसमें आतंकवाद से लड़ने की बात कही गई, खासकर सीमा पार आतंकवादियों की आवाजाही रोकने पर जोर दिया गया। साथ ही ईरान की जमीन पर सैन्य हमलों की निंदा भी की गई।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सम्मेलन में संवाद और कूटनीति से विवाद सुलझाने की जरूरत बताई। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की मौजूदगी में उन्होंने उन देशों को कड़ा संदेश देने की बात कही जो आतंक को राज्य नीति के रूप में इस्तेमाल करते हैं। अगला SCO समिट 2027 में पाकिस्तान में होना है।
पूर्व राजदूत अशोक सज्जनहार के अनुसार भारत के लिए SCO का मुख्य फोकस मध्य एशियाई देश हैं। भारत इन्हें अपना विस्तारित पड़ोस मानता है।
भारत SCO में शामिल हुआ था मुख्य रूप से मध्य एशियाई देशों से जुड़ने के लिए। इन देशों से भारत के पुराने सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और सभ्यतागत रिश्ते हैं। सोवियत काल तक ये रिश्ते काफी मजबूत थे। ये देश प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर हैं—तेल, गैस, खनिज, यूरेनियम आदि। भारत की ऊर्जा जरूरतें पूरी करने के लिए इनसे अच्छे संबंध जरूरी हैं। SCO उच्च स्तर पर इन देशों से संपर्क बढ़ाने का मंच देता है।
दूसरा बड़ा मुद्दा आतंकवाद, सुरक्षा और स्थिरता है। सीमा पार आतंकवाद और दोहरे मानदंडों के खिलाफ भारत की चिंता बिश्केक डिक्लेरेशन में साफ नजर आई।
तीसरा मुद्दा कनेक्टिविटी है। ताजिकिस्तान तक कानूनी पहुंच पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से है, लेकिन असल में रास्ता बंद है। इसलिए भारत ईरान के चाबहार पोर्ट और INSTC (अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा) के जरिए जुड़ने की कोशिश कर रहा है। यह करीब 7200 किलोमीटर लंबा गलियारा है जिसमें जहाज, रेल और सड़क शामिल हैं। मोदी की पुतिन, ईरानी राष्ट्रपति और उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति से मुलाकातों में भी कनेक्टिविटी पर बात हुई।
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चौथा, दुनिया के अलग-अलग धड़ों में बंटने के समय भारत खुद को पुल बनाने वाला देश के रूप में पेश करना चाहता है। रूस, ईरान और चीन के साथ संबंधों में सहजता दिखाकर सामरिक स्वायत्तता का संदेश देना भी मकसद था।
आखिर में सभ्यतागत संवाद, बौद्ध विरासत, पारंपरिक दवाएं, युवा वैज्ञानिक और लेखक मंच जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाना। विशेषज्ञों के मुताबिक, इनमें से ज्यादातर उद्देश्य संतोषजनक रूप से पूरे हुए, हालांकि काम जारी है।
मोदी ने आतंकवाद को मानवता के लिए गंभीर चुनौती बताया और राज्य नीति के रूप में इस्तेमाल करने वालों के खिलाफ कड़ा संदेश देने की बात कही। विशेषज्ञ कहते हैं कि भारत का यह रुख हमेशा से एक जैसा रहा है, चाहे शहबाज शरीफ मौजूद हों या न हों। अगले साल पाकिस्तान में समिट में मोदी जाएंगे या नहीं, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी। संबंधों की स्थिति देखकर सरकार फैसला करेगी।
बिश्केक डिक्लेरेशन में ईरान पर हमलों की निंदा है, लेकिन अमेरिका और इजरायल का नाम नहीं लिया गया। पिछले साल तियानजिन में नाम लेकर बात कही गई थी। विशेषज्ञ मानते हैं कि भाषा नरम रखने से अमेरिका या इजरायल बहुत नाराज नहीं होंगे। भारत इन दोनों से अच्छे संबंध रखता है, लेकिन ये रिश्ते विशेष नहीं हैं। ईरान से भी पुराने सभ्यतागत रिश्ते हैं। ऊर्जा सुरक्षा, होर्मुज जलडमरूमध्य और खाड़ी में रह रहे भारतीयों की सुरक्षा भी मायने रखती है। मध्य एशियाई देश भी अमेरिका से अच्छे संबंध रखते हैं और बहु-दिशा वाली विदेश नीति अपनाते हैं।
SCO में चीन और कुछ हद तक रूस का दबदबा है। लेकिन संगठन का केंद्र मध्य एशियाई देश हैं। भारत की ताकत ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रिश्ते हैं, यानी सॉफ्ट पावर। चुनौती इसे आर्थिक रिश्तों, परियोजनाओं और कनेक्टिविटी में बदलने की है। यूक्रेन युद्ध के बाद मध्य एशियाई देश चीन और रूस पर निर्भरता कम करना चाहते हैं। भारत यहां विकल्प बन सकता है। उज्बेकिस्तान में मोदी की यात्रा सफल रही—वहां UPI अपनाया गया, यूरेनियम सप्लाई का समझौता हुआ और सामरिक साझेदारी को व्यापक बनाया गया।
भारत की कोशिश से SCO में अंग्रेजी को भी भाषा बनाने पर सहमति बनी। पहले सिर्फ रूसी और मंदारिन थीं। मध्य एशियाई देश भूमि-आबद्ध हैं। उज्बेकिस्तान तो दोहरा भूमि-आबद्ध है। समुद्र तक पहुंच नहीं होने से कनेक्टिविटी उनके लिए बहुत जरूरी है। INSTC और चाबहार उनके लिए महत्वपूर्ण रास्ते हैं। चीन की बेल्ट एंड रोड पहल में भारत शामिल नहीं है क्योंकि वह पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से गुजरती है।