विवेकानंद शिला स्मारक एवं विवेकानंद केंद्र के अध्यक्ष और जीवनव्रती कार्यकर्ता श्री ए. बालकृष्ण का निधन 27 अगस्त की रात्रि में हो गया। वे 88 वर्ष के थे। उनका अंतिम संस्कार 29 अगस्त को कन्याकुमारी में किया गया। बालकृष्ण जी का जन्म 3 मई, 1938 को केरल में हुआ था। उन्होंने कुछ समय भारतीय वायु सेना में अपनी सेवाएं दीं। 1973 में वे विवेकानंद केंद्र के जीवनव्रती कार्यकर्ताओं के प्रथम दल में सम्मिलित हुए।
यह वह समय था जब एकनाथ रानाडे जी ने ऐसे युवा पुरुषों और महिलाओं का आह्वान किया था, जो राष्ट्रसेवा और आध्यात्मिक आदर्शों के प्रति समर्पित होकर भारत के कोने-कोने में जाकर राष्ट्रजागरण का कार्य करें। प्रशिक्षण पूर्ण होने के बाद एकनाथ जी ने उन्हें अरुणाचल प्रदेश भेजा। 1962 के भारत-चीन युद्ध के दुष्प्रभावों से उबर रहे इस सीमावर्ती क्षेत्र में उन्होंने शिक्षा के माध्यम से समाजसेवा और राष्ट्रनिर्माण का कार्य प्रारंभ किया। ‘मनुष्य निर्माण और राष्ट्र निर्माण’ के विवेकानंद केंद्र के मूल उद्देश्य को अपने जीवन का ध्येय बनाकर उन्होंने अपना पूरा जीवन सेवा कार्य में समर्पित कर दिया।
अरुणाचल प्रदेश में शिक्षा के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय और अग्रणी योगदान को देखते हुए 2014 में अरुणाचल प्रदेश सरकार ने उन्हें राज्य पुरस्कार से सम्मानित किया। बालकृष्ण जी का जीवन एक ऐसे कर्मयोगी का उदाहरण है, जिन्होंने भारत माता की सेवा को अपना जीवन समर्पित किया और विवेकानंद केंद्र को एक जीवंत स्मारक बनाने के स्वप्न को साकार करने में अपना अमूल्य योगदान दिया। वे एक समर्पित सेवाव्रती, मार्गदर्शक और विवेकानंद केंद्र की प्रेरणादायी शक्ति थे। उनका निःस्वार्थ सेवा, अनुशासन, समर्पण और राष्ट्रभक्ति से परिपूर्ण जीवन आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरणा देता रहेगा।
प्रधानमंत्री ने दी श्रद्धांजलि
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके साथ बिताए पलों को याद करते हुए शोक संवेदना व्यक्त की। उन्होंने कहा, ‘‘विवेकानंद केंद्र के अखिल भारतीय अध्यक्ष रहे श्री ए. बालकृष्णन जी के निधन से गहरा दुख हुआ है। बालकृष्णन जी ने अपने जीवन के पांच दशक से अधिक का समय स्वामी विवेकानंद के आदर्शों और समाज की सेवा में समर्पित किया। विवेकानंद केंद्र के शुरुआती ‘जीवनव्रतियों’ में से एक के तौर पर, उन्होंने पूरे देश में अथक परिश्रम किया। पूर्वोत्तर भारत के साथ उनका विशेष और गहरा जुड़ाव था। उन्होंने शिक्षा, समाज-सेवा और राष्ट्र-निर्माण से जुड़े कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। विवेकानंद केंद्र के पूरे परिवार और उनके प्रशंसकों के प्रति मेरी गहरी संवेदनाएं।’’
संघ ने जताया शोक
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत और सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले ने शोक संवेदना में कहा, ‘‘विवेकानंद केंद्र के अध्यक्ष श्री ए. बालकृष्णन जी कर्मयोग की साक्षात प्रतिमूर्ति थे, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन स्वामी विवेकानंद जी के विश्वबंधुत्व एवं सहिष्णुता के संदेश के प्रसार तथा राष्ट्र एवं समाज की सेवा में समर्पित कर दिया। उनका सरल जीवन, निःस्वार्थ सेवा, त्याग एवं हिंदुत्व के प्रति उनकी अटूट निष्ठा भारतवासियों के लिए सदैव प्रेरणास्रोत बनी रहेगी। श्री बालकृष्ण जी, स्वामी विवेकानंद जी के कार्य को आगे बढ़ाने के लिए कन्याकुमारी स्थित विवेकानंद केंद्र के आजीवन समर्पित स्वयंसेवक-दल की प्रारंभिक पीढ़ी के स्वयंसेवक थे। उनके निधन से हिंदू समाज ने एक महान आत्मा को खो दिया है। उनके देवलोक गमन से उत्पन्न हुई रिक्तता की पूर्ति अत्यंत कठिन है। हम दिवंगत श्री बालकृष्ण जी को अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं तथा परमात्मा से प्रार्थना करते हैं कि इस पुण्यात्मा को परम गति एवं मोक्ष प्रदान करें।’’
सहदुल दा नहीं रहे

बिहार में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता और लखीसराय जिले के संघचालक श्री कृष्ण प्रसाद सिंह उपाख्य सहदुल दा नहीं रहे। लंबी बीमारी के बाद 27 अगस्त को उन्होंने अंतिम सांस ली। मुखाग्नि उनकी बड़ी पुत्री ज्योत्सना ने दी। 73 वर्षीय सहदुल दा 5 दशक से नियमित शाखा जाते थे। उन्होंने मुख्य शिक्षक, नगर कार्यवाह, खंड कार्यवाह, जिला कार्यवाह और जिला संघचालक जैसे दायित्वों का निर्वहन किया। वे राम जन्मभूमि आंदोलन से गहरे जुड़े थे। 1992 की कारसेवा में भी गए थे। बड़हिया के इस संपन्न किसान की पहचान कंधे पर झोला लटकाए दिन भर घूमने वाले संघ कार्यकर्ता की थी। 30 अगस्त को बड़हिया में आयोजित स्मृति सभा में कार्यकर्ताओं ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी। सहदुल दा अपने पीछे नाती-नतनियों से भरा पूरा परिवार छोड़ गए हैं।

















