स्वामी विवेकानंद से मोहन भागवत जी तक: भारतीय आध्यात्मिक-विचार परंपरा की निरंतर यात्रा
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स्वामी विवेकानंद से मोहन भागवत जी तक: भारतीय आध्यात्मिक-विचार परंपरा की निरंतर यात्रा

स्वामी विवेकानंद ने विश्व को भारत की आध्यात्मिक दृष्टि से परिचित कराया; मोहन जी उसी दृष्टि को आज के सामाजिक और वैश्विक प्रश्नों से जोड़ते हैं।

Written byप्रियंक कानूनगोप्रियंक कानूनगो
Aug 31, 2026, 07:07 pm IST
inविश्लेषण, संघ @100

न्यूयॉर्क का मैडिसन स्क्वायर गार्डन केवल एक विशाल सभागार नहीं, बल्कि दुनिया के उन प्रतिष्ठित मंचों में से एक है, जहां किसी विचार का प्रस्तुत होना अपने आप में वैश्विक संवाद का हिस्सा बन जाता है। ऐसे मंच से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का संबोधन इसलिए विशेष महत्व रखता है, क्योंकि उसमें केवल एक संगठन का संदेश नहीं, बल्कि भारत की उस दीर्घ आध्यात्मिक और सभ्यतागत विचार-परंपरा की निरंतरता दिखाई देती है, जिसकी आधुनिक विश्व में सबसे प्रभावशाली अभिव्यक्तियों में से एक स्वामी विवेकानंद का 1893 का शिकागो संबोधन था।

स्वामी विवेकानंद ने शिकागो में दुनिया के सामने उस भारत को प्रस्तुत किया था, जिसकी आध्यात्मिक चेतना विविध मतों और विश्वासों को परस्पर विरोधी मानने के बजाय सत्य तक पहुंचने के विभिन्न मार्गों के रूप में देखने की क्षमता रखती है। उन्होंने भारतीय दृष्टि को केवल सहिष्णुता तक सीमित नहीं रखा, बल्कि स्वीकार्यता के उच्चतर भाव से जोड़ा। उन्होंने उस सभ्यता की बात की जिसने इतिहास में धार्मिक उत्पीड़न से बचकर आए समुदायों को आश्रय दिया और अलग-अलग आस्थाओं को अपने भीतर स्थान दिया। उनके संबोधन में भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं था; वह ऐसी सभ्यता के रूप में सामने आया, जिसकी शक्ति विविधताओं को मिटाने में नहीं, बल्कि उन्हें साथ लेकर चलने में निहित है। एक सदी से अधिक समय बाद मोहन जी के संबोधन में उसी सभ्यतागत दृष्टि की समकालीन अभिव्यक्ति दिखाई देती है।

विविधता में निहित एकता को पहचानना आवश्यक

दोनों के बीच सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक कड़ी यहीं बनती है। स्वामी विवेकानंद ने विश्व को भारत की आध्यात्मिक दृष्टि से परिचित कराया; मोहन जी उसी दृष्टि को आज के सामाजिक और वैश्विक प्रश्नों से जोड़ते हैं। स्वामी जी ने विभिन्न धार्मिक परंपराओं के सह-अस्तित्व को भारत की आध्यात्मिक उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया था, जबकि मोहन जी उसे ‘Unity in Diversity’ की भारतीय दृष्टि के रूप में सामने रखते हैं- विविधता को समाप्त करना समाधान नहीं; उसके भीतर निहित एकता को पहचानना आवश्यक है।
यह अंतर केवल भाषा का नहीं, बल्कि दोनों कालखंडों की आवश्यकताओं का भी है।

विवेकानंद के समय प्रश्न था कि औपनिवेशिक दृष्टि से देखे जा रहे भारत को विश्व किस प्रकार समझे और भारत स्वयं अपनी सभ्यतागत शक्ति को किस आत्मविश्वास के साथ पहचाने। आज प्रश्न अलग है। दुनिया तकनीकी रूप से पहले से कहीं अधिक जुड़ी हुई है, लेकिन पहचान, धर्म, संस्कृति, नस्ल और विचारधारा के आधार पर अनेक समाजों में विभाजन भी तीव्र हुआ है। ऐसे समय में प्रश्न यह है कि भारत अपने हजारों वर्षों के सह-अस्तित्व के अनुभव से विश्व को क्या दे सकता है। मोहन जी का उत्तर, भारत की इसी सभ्यतागत चेतना में दिखाई देता है।

हिंदुत्व की व्याख्या

उनके संबोधन में हिंदुत्व की व्याख्या भी इसी व्यापक संदर्भ में सामने आती है। हिंदुत्व को किसी एक पूजा-पद्धति अथवा संकीर्ण धार्मिक पहचान तक सीमित करने के बजाय वे इसे जीवन और समाज को देखने की ऐसी दृष्टि से जोड़ते हैं, जिसमें व्यक्ति स्वयं से आगे समाज को देखता है, अधिकारों के साथ कर्तव्यों को समझता है और विविधताओं के बीच एकात्मता का अनुभव करता है। इसी संदर्भ में उनका यह विचार विशेष महत्व रखता है कि यदि कोई यह मानता है कि भारत में मुसलमानों के लिए स्थान नहीं होना चाहिए, तो ऐसी सोच हिंदुत्व की मूल भावना को नहीं समझती। यह उस अवधारणा की ओर संकेत करता है जिसमें भारत की सभ्यतागत एकता किसी समुदाय के निष्कासन या उसकी पहचान के निषेध पर नहीं, बल्कि विभिन्न समुदायों को साथ लेकर चलने की क्षमता पर आधारित है।

यहां स्वामी विवेकानंद की विचार-परंपरा की स्पष्ट प्रतिध्वनि सुनाई देती है। उनके लिए भी भारत की आध्यात्मिक शक्ति का अर्थ किसी दूसरे मत पर विजय अथवा उसका उन्मूलन नहीं था। वे भारत की शक्ति इसी बात में देखते थे कि इस भूमि ने अलग-अलग विश्वासों को स्थान दिया, उनके बीच संवाद की संभावना बनाए रखी और आध्यात्मिक सत्य की खोज को किसी एक पद्धति तक सीमित नहीं किया। मोहन जी इसी भाव को आज सामाजिक समरसता और मानव-एकता के प्रश्न से जोड़ते हैं।

उनके विचार का एक महत्वपूर्ण आयाम विदेशों में बसे भारतीयों के प्रति उनका आग्रह भी है। अपनी मातृभूमि और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहते हुए कर्मभूमि के प्रति निष्ठा, ईमानदारी और जिम्मेदारी निभाना- ये दोनों भाव परस्पर विरोधी नहीं हैं। जिस देश और समाज में व्यक्ति रहता है, जहां उसका श्रम, जीवन और भविष्य जुड़ा है, उसके प्रति दायित्व निभाना भी उतना ही आवश्यक है।

विश्व को एक परिवार के रूप में देखना

यह भारतीय दृष्टि के उस व्यापक तत्व को सामने लाता है जिसमें अपनी पहचान की रक्षा और दूसरे के अस्तित्व का सम्मान साथ-साथ चलते हैं। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का अर्थ अपनी विशिष्टता को समाप्त कर देना नहीं, बल्कि अपनी पहचान के साथ विश्व को एक परिवार के रूप में देखने की क्षमता विकसित करना है। आज इस विचार की प्रासंगिकता और बढ़ गई है। तकनीक ने भौगोलिक दूरियाँ कम कर दी हैं, लेकिन सामाजिक और वैचारिक दूरियाँ अनेक स्थानों पर बढ़ी हैं। पहचान आधारित संघर्ष, धार्मिक ध्रुवीकरण और सांस्कृतिक टकराव वैश्विक विमर्श के बड़े प्रश्न बन चुके हैं। ऐसे समय में भारत का सभ्यतागत अनुभव केवल गौरवपूर्ण अतीत की स्मृति बनकर नहीं रह सकता; उसे वर्तमान और भविष्य के लिए उपयोगी विचार में बदलना होगा। यहीं मोहन जी के संबोधन का व्यापक महत्व दिखाई देता है।

स्वामी विवेकानंद के समय चुनौती और आज का समय

विवेकानंद ने जिस भारत को विश्व-मंच पर आत्मविश्वास के साथ खड़ा किया था, वह राजनीतिक रूप से पराधीन भारत था। उनके सामने चुनौती थी कि दुनिया भारत को केवल गरीबी, औपनिवेशिक अधीनता अथवा पिछड़ेपन के चश्मे से न देखे, बल्कि उसकी गहरी दार्शनिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक चेतना को भी समझे। आज परिस्थितियां बदल चुकी हैं। भारत स्वतंत्र है, आत्मविश्वास के साथ विश्व से संवाद कर रहा है और वैश्विक विमर्श में उसकी भूमिका निरंतर बढ़ी है। इसलिए भारत की सभ्यतागत दृष्टि की प्रस्तुति भी अब केवल स्वयं को दुनिया के सामने समझाने तक सीमित नहीं रह सकती; उसमें विश्व के समकालीन प्रश्नों के समाधान में योगदान देने की आकांक्षा भी स्वाभाविक रूप से जुड़ती है। यही शिकागो से मैडिसन स्क्वायर तक की यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन है।

तब भारत दुनिया से कह रहा था- हमें हमारी वास्तविकता और हमारी सभ्यता के आलोक में समझिए। आज भारत यह भी कह सकता है-हमारे सभ्यतागत अनुभव को समझिए; संभव है कि उसमें आज की दुनिया के कुछ प्रश्नों के उत्तर भी मिलें। लेकिन इस परिवर्तन के भीतर एक गहरी निरंतरता बनी हुई है।

स्वामी विवेकानंद पश्चिम के सामने भारत की आध्यात्मिक शक्ति लेकर गए थे, लेकिन उन्होंने भारत को भी आधुनिक विज्ञान, ज्ञान, संगठन और आत्मविश्वास से सीखने का संदेश दिया। उनका विचार आत्ममुग्धता का नहीं, संवाद का था। उसी संवाद की आधुनिक अभिव्यक्ति उस सोच में दिखाई देती है जो भारतीय सभ्यतागत मूल्यों को विश्व के सामने रखते हुए अन्य समाजों के प्रति सम्मान और कर्मभूमि के प्रति दायित्व की बात करती है।

मैडिसन स्क्वायर गार्डन का संबोधन का निहितार्थ

इसी अर्थ में मैडिसन स्क्वायर गार्डन का संबोधन केवल एक समकालीन सार्वजनिक भाषण के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसे उस दीर्घ वैचारिक संवाद के एक आधुनिक अध्याय के रूप में भी पढ़ा जा सकता है, जिसे स्वामी विवेकानंद ने आधुनिक विश्व के सामने असाधारण आत्मविश्वास के साथ स्थापित किया था। एक संन्यासी ने विश्व को भारत की आत्मा से परिचित कराया था; आज उसी व्यापक सभ्यतागत परंपरा का एक स्वयंसेवक उस आत्मा को अपने समय की भाषा और चुनौतियों के संदर्भ में अभिव्यक्त कर रहा है। समय बदला है, मंच बदला है, परिस्थितियां बदली हैं और विश्व में भारत की स्थिति भी बदली है- परंतु विचार की मूल धारा बनी हुई है: विविधता में एकता, सह-अस्तित्व, कर्तव्य, सामाजिक समरसता और मानव-कल्याण।

स्वामी विवेकानंद ने भारत की आध्यात्मिक चेतना को आधुनिक विश्व-मंच पर प्रतिष्ठित किया था। मोहन जी उसी चेतना को आज की दुनिया के प्रश्नों से जोड़ते हुए सामाजिक और वैश्विक संदर्भ में आगे रखने का प्रयास करते दिखाई देते हैं। शिकागो से मैडिसन स्क्वायर तक की यह यात्रा इसलिए केवल दो भाषणों या दो व्यक्तित्वों के बीच समानता की कहानी नहीं है। यह उस भारतीय विचार की निरंतर यात्रा है, जो अपनी जड़ों में दृढ़ रहते हुए भी विश्व को अपना मानता है-और जो विविधता को समस्या नहीं, बल्कि एक व्यापक एकात्मता की अभिव्यक्ति के रूप में देखने का साहस रखता है। यही स्वामी विवेकानंद से मोहन जी तक चली आ रही भारतीय आध्यात्मिक-विचार परंपरा की सबसे सुंदर और सार्थक कड़ी है।

Topics: वसुधैव कुटुम्बकम्न्यूयॉर्कRSSविविधता में एकतापाञ्चजन्य विशेषसंघ के 100 सालमैडिसन स्क्वायर गार्डनसभ्यतागत चेतनासरसंघचालकन्यूयॉर्क का मैडिसन स्क्वायर गार्डनडॉ. मोहन भागवतन्यूयॉर्क में सरसंघचालकश्री मोहन भागवतमैडिसन स्क्वायर मोहन भागवतस्वामी विवेकानंद
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