पर्यावरण के विनाश से समस्त जीव-जगत का अस्तित्व संकट में पड़ जाता है, वायु दूषित हो जाती है और प्रकृति अपना स्वाभाविक स्वरूप खो देती है। प्रकृति पर विजय प्राप्त नहीं की जा सकती। प्रकृति से युद्ध नहीं, उसके साथ सह-अस्तित्व ही मनुष्य के अस्तित्व की शर्त है। हिमालय इस सत्य का सबसे बड़ा उदाहरण है। वर्ष 1894 की गोहना झील से लेकर 2013 की केदारनाथ त्रासदी, 2021 की चमोली आपदा, 2023 की दक्षिण ल्होनाक झील की तबाही और अब 2026 में नेपाल की भोटेकोशी नदी की विनाशकारी बाढ़- लगभग डेढ़ शताब्दी की ये घटनाएं हमें एक ही संदेश देती हैं कि हिमालय के साथ की गई छोटी सी छेड़छाड़ हजारों-लाखों लोगों के लिए विनाशकारी परिणाम ला सकती है।
आज हमारे पास उपग्रह हैं, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस है, रडार हैं, सेंसर हैं, कंप्यूटर मॉडल हैं, लेकिन प्रकृति की शक्ति आज भी 1894 जैसी ही है। यही बात हमें नेपाल 2026 की आपदा में दिखाई दी।
नेपाल में क्या हुआ
26 अगस्त 2026 को नेपाल के रसुआ जिले में भटकोसी -त्रिशूली घाटी में कई आई आकस्मिक बाढ़ ने पूरे हिमालय क्षेत्र को झकझोर दिया। यह एक प्रकार का हिमस्खलन था, जिसकी बर्फ-चट्टान का विशाल हिस्सा टूटकर नीचे आया। उसने लेंडी नदी को अस्थायी रूप से रोक दिया और वहां एक अस्थायी झील या बांध बन गया। इसके टूटने पर अत्यधिक ऊर्जा के साथ पानी और मलबा नीचे की तरफ आया। इसमें सैकड़ों लोगों की मौत हुई और हजारों लोग लापता हैं। करीब 15 विद्युत परियोजनाएं, 35 पुल, 45 केबल पुल और लगभग 40 किलोमीटर सड़क बह गई।
भारत भी सुरक्षित नहीं
नेपाल जैसी घटना भारत में भी हो सकती है। इसके प्रमाण भी हैं। वैज्ञानिक आंकड़ों में मौजूद भारत के हिमालय राज्यों में हजारों हिमनद झीले हैं, उनमें से कई का आकार बढ़ रहा है। कुछ प्राकृतिक बांधों से घिरी हैं, उसके नीचे गांव, शहर , पुल, जलविद्युत परियोजनाएं हैं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि हमारे ऊपर खतरा बढ़ रहा है और इस खतरे के नीचे हमारे मानवीय गतिविधियां भी बढ़ रही हैं।

अप्रैल 2024 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने ‘हिमालयी क्षेत्र की हिमनदीय झीलों’ की विस्तृत रिपोर्ट जारी की थी। इस रिपोर्ट में 1984–2023 के दीर्घकालीन उपग्रह विश्लेषण में 2016–17 के दौरान 10 हेक्टेयर से बड़ी 2,431 हिमनदीय झीलों की पहचान की गई। इनमें से 676 झीलों का क्षेत्रफल 1984 के बाद उल्लेखनीय रूप से बढ़ा। इन 676 विस्तारित झीलों में 130 भारत में स्थित थीं, जिसमे से 65 सिंधु बेसिन में, 7 गंगा बेसिन में , 58 ब्रह्मपुत्र बेसिन में हैं। इनमें से 601 झीलें यानी 89% झीलें अपने पुराने क्षेत्रफल के दुगने से अधिक हो चुकी हैं। इनमें से हिमाचल की गेपोंग घाट हिमनद झील का क्षेत्रफल 4 दशकों में तीन गुना हो गया है, यदि झील बढ़ रही तो क्या उसके प्राकृतिक बांध , नीचे की घाटी, वहां मौजूद आधरभूत संरचना उसी गति से सुरक्षित हो रही है ? यही भारत की चुनौती है। 2026 में आईआईटी रोपड़ और यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी सिडनी के संयुक्त अध्ययन ने हिमाचल प्रदेश की स्थिति पर विशेष चिंता जताई। 1990 में 107 हिमनद झीलें, 2024 में 669 हो गईं अर्थात इनकी संख्या में पांच गुना से अधिक की वृद्धि हुई और इनका क्षेत्रफल 102% बढ़ गया है। इनमें 88 झीलों को GLOF उत्प्रेरकों के प्रति संवेदनशील पाया गया। हिमाचल की दो झीलों पर कंप्यूटर आधारित बाढ़ मॉडल वैज्ञानिकों ने किया और बताया कि लगभग 35 लाख लीटर प्रति सेकंड जल प्रवाह संभावित है, जिसमें चट्टान ,मिट्टी, बर्फ पेड़ सब शामिल होंगे तो यह चलता हुआ मलबा , प्रलय बन सकता है। GLOF का मतलब है Glacial Lake Outburst Flood यानी हिमझील फटने से आने वाली अचानक बाढ़।
गर्म होता हिमालय खतरे की घंटी
हिमालय के वैश्विक ताप में वृद्धि हो रही है। ऐसा अनुमान है कि वैश्विक ताप के कारण 2100 तक उच्च पर्वतीय एशिया के लगभग 65 प्रतिशत ग्लेशियर समाप्त हो जाएंगे, लेकिन तापमान बढ़ना GLOF का अकेला कारण नहीं है। तापमान वृद्धि, हिमनद के पीछे हटने और झील के विस्तार की पृष्ठभूमि तैयार करती है, लेकिन झील टूटने के कई कारण हो सकते है -हिमस्खलन, भूस्खलन, चट्टान गिरना, अत्यधिक वर्षा अथवा प्राकृतिक बांध की अस्थिरता।
भारत के लिए खतरा केवल GLOF नहीं
हिमालय में कई गतिविधियां हो सकती है, भूस्खलन से नदी अवरुद्ध हो सकती है, अत्यधिक वर्षा हो सकती है और झील का स्तर बढ़ सकता है। यहां भूकंप आ सकता है, ढलान अस्थिर हो सकता है। कुल मिलाकर हमें बहु-जोखिम हिमालय आपदा प्रबंधन करना होगा। वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के विज्ञानी लितान मोहंती और ऑस्ट्रिया स्थित विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान के प्रतीक गंतायत के अध्ययन के अनुसार, पूरे हिमालयी क्षेत्र में लगभग 24,440 हिमनदीय झीलों की पहचान की गई है। इनमें 221 झीलों को अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील पाया गया है, जिनमे से सर्वाधिक कोसी नदी बेसिन में हैं ।

कश्मीर से सिक्किम तक खतरा है। भारत में जम्मू कश्मीर में चिनाब एवं व्यास बेसिन, सिक्किम में तीस्ता नदी बेसिन और नेपाल के कोसी गंडक बेसिन का प्रभाव उत्तर प्रदेश और बिहार पर पड़ेगा। हिमालय में 1242 जल विद्युत परियोजनाएं, जिनमें से ब्यास में 384, रावी में 183, टोंस में लगभग 106 परियोजनाएं हैं। भारत सरकार के अनुसार देश के हिमालयी नदी बेसिन में 10 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल वाली 2,485 हिमनदीय झीलों की दूरसंवेदी तकनीक के माध्यम से निगरानी की जा रही है। 2025 में किए गए वैज्ञानिक आकलन में इनमें से 56 झीलों को ‘बहुत अधिक जोखिम’ वाली श्रेणी में रखा गया।
‘बहुस्तरीय आपदा’ क्या है?
एक हिमस्खलन झील में गिरता है, तब झील का प्राकृतिक बांध टूटता है और पानी नीचे की दूसरी झील तक पहुंचता है, इससे दूसरी झील भी टूट जाती है और पानी के साथ चट्टान, मिट्टी और पेड़ नीचे की ओर बहते हैं जिससे अत्यंत विनाशकारी बाढ़ पैदा होती है। इस प्रकार की घटना को बहुस्तरीय या श्रृंखलाबद्ध आपदा कहा जा सकता है।
भारत पहले भी ऐसी आपदाएं देख चुका है
नेपाल की घटना भारत के लिए कोई नई चेतावनी नहीं है । हिमालय पहले भी हिमनद और हिमनद से बनी झीलों से जुड़ी विनाशकारी घटनाओं का भारत सामना कर चुका है। 2013 में केदारनाथ त्रासदी चोराबाड़ी ताल से जुड़ी हुई थी , 2021 में चमोली आपदा चमोली क्षेत्र में ग्लेशियर और चट्टानी सामग्री के नीचे आने से विनाशकारी हुई थी। 2023 में सिक्किम के दक्षिण ल्होनाक झील के फटने से तीस्ता नदी में विनाशकारी बाढ़ आई थी।
भारत ने अब तक इसके लिए क्या किया है
भारत में सबसे पहले खतरे की वैज्ञानिक पहचान के लिए वाडिया इंस्टीट्यूट आफ हिमालयन जियोलॉजी एवं इसरो के माध्यम से ऐसी खतरनाक झीलों की पहचान की गई है। दूसरा केंद्रीय जल आयोग ने अपनी निगरानी का दायरा बढ़ा दिया है और भारत की सीमा में 681 हिमनद झीलों की निगरानी करनी शुरू कर दी। भारत ने 2025 में पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर 150 करोड़ का GLOF जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रम बनाया है। इसके अलावा प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली पर भी काम किया है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन में अक्टूबर 2020 में हिमनदी झील विस्फोट बाढ़ प्रबंधन के राष्ट्रीय दिशा निर्देश जारी किए हैं। बांधों के डिजाइन में GLOF भी शामिल किया है। शायद हिमालय हमें पर्याप्त समय दे रहा है इसलिए अभी हमें और कुछ भी किया जाना चाहिए।
भारत को क्या करना चाहिए
- हर संबंधित संवेदनशील हिमालय घाटी के डिजिटल मॉडल बनाया जाए, जिसमें इसरो उपग्रह, वाडिया संस्थान के आंकड़े, मौसम, वर्षा, तापमान, झील का जलस्तर, हिमनद की गति, भूस्खलन, नदी का प्रवाह, पुल, सड़क, बांध, जलविद्युत परियोजना, जनसंख्या और इसके साथ कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित मॉडल भी जोड़े जाएं। इससे केवल खतरे का पता नहीं चलेगा, इसके साथ आपदा का संभावित मार्ग पहले से दिखाई देगा।
- एक झील एक जोखिम मानचित्र तैयार किया जाए, हर संवेदनशील झील के साथ कितने गांव, कितनी आबादी, पुल सड़क स्कूल अस्पताल आदि प्रभावित हो रहे
- हर झील का डिजिटल स्वास्थ्य कार्ड हो जिसमें उसका साप्ताहिक अपडेट हो, जिसमें जलस्तर, क्षेत्रफल, बांध की स्थिति, आसपास की ढलान, बर्फ की स्थिति और संभावित खतरा दर्ज हो।
- जिला प्रहरी, गांव का नागरिक वैज्ञानिक निगरानी तंत्र का हिस्सा बने। हर संवेदनशील घाटी में कुछ स्थानीय युवा को प्रशिक्षित कर उन्हें हिमालय प्रहरी बनाया जाए। उपग्रह ऊपर से देखेंगे और स्थानीय नागरिक प्रत्यक्ष रूप से सारी चीजों को देखेंगे।
- हिमालय में हर पुल पर स्मार्ट सेंसर लगाएं, जिसमें स्वचालित सायरन, मोबाइल अलर्ट और यातायात बंद करने का तरीका विकसित हो। इन आपदाओं में सबसे महत्वपूर्ण समय होता है, इसलिए हर गांव के लिए पहले से निकासी मार्ग, सुरक्षित ऊंचाई, सायरन और एकत्रीकरण स्थल निर्धारित हो और साल में कम से कम दो बार मॉकड्रिल हो।
किसी भी परियोजना के बनाने से पहले उसके पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन बहुत जरूरी है हिमालय घाटी की एक निश्चित वहन क्षमता है। इसलिए किसी घाटी में अधिकतम निर्माण क्षेत्र, अधिकतम पर्यटक संख्या, सड़क की क्षमता, आपदा की स्थिति में अधिकतम सुरक्षित आबादी आदि। इस सब का निर्धारण हो। नए निर्माण पर रोक लगाई जाए, जल विद्युत परियोजना के लिए GLOF स्ट्रेस टेस्ट हो, जिसमें कंप्यूटर मॉडल से तय किया जाए कि यदि जोखिम वाली झील टूट जाए तो परियोजना पर क्या प्रभाव पड़ेगा। हिमालय की एक बड़ी समस्या है मोबाइल नेटवर्क न मिलना। इसलिए चेतावनी प्रणाली केवल मोबाइल पर नहीं, सैटेलाइट संदेश, रेडियो, सौर ऊर्जा वाले सायरन और स्थानीय वायरलेस नेटवर्क का मिश्रित तंत्र बनाना चाहिए। इन सारी चीजों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को जोड़कर खतरा सूचकांक बनाने की आवश्यकता है।
हिमालय आपदा कोष को आपदा के बाद राहत पुनर्निर्माण के खर्च होने के साथ साथ उसका एक हिस्सा झीलों का निगरानी सेंसर, निकासी मार्ग, सुरक्षित पुल और वैज्ञानिक अध्ययन पर लगाया जाए।
हिमालय जोखिम एटलस है जरूरी
भारत को अपना हिमालय जोखिम एटलस बनाना चाहिए, जिसमें एक ही नक्शे पर हिमनद झील, भूस्खलन, नदी, बांध, सड़क, पुल, जलविद्युत परियोजनाएं जनसंख्या आदि दिखाई दे। सबसे महत्वपूर्ण है कि हमें प्रकृति के साथ विज्ञान, विवेक और सह अस्तित्व के माध्यम से सुरक्षित जीवन की तलाश करना चाहिए। यही भारत के हिमालय की अगली विकास दृष्टि होगी।
















