केरलम के प्रमुख सुन्नी मुस्लिम संगठन ‘समस्त केरल जमीयतुल उलमा’ ने सार्वजनिक कार्यक्रमों और समारोहों में मुस्लिम महिलाओं के शामिल होने पर रोक लगाने का निर्देश जारी किया है। समस्त केरल जमीयतुल उलमा के अध्यक्ष ई. सुलेमान मुसलियार और महासचिव कंथापुरम ए.पी. अबूबकर मुसलियार की ओर जारी बयान में कहा गया कि मुस्लिम महिलाओं को किसी भी सार्वजनिक कार्यक्रमों और मंचों पर हिस्सा नहीं लेना चाहिए, क्योंकि इससे वे गैर पुरुषों के सामने प्रदर्शन की तरह दिखती हैं। मस्जिद, मदरसा और अन्य इस्लामी संस्थानों के प्रमुख मुस्लिम महिलाओं को सार्वजनिक कार्यक्रमों, मंचों व किसी भी तरह के जश्न में हिस्सा लेने की इजाजत न दें, जहां गैर पुरुष मौजूद हों। यह इस्लाम में हराम है।
इसको लेकर सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। भाजपा और सोशल मीडिया यूजर्स ने केरल की कांग्रेस सरकार पर सवाल उठाए हैं। यूजर्स ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी के सार्वजनिक मंचों से मनुस्मृति, महिलाओं के साथ भेदभाव और पितृसत्तात्मक सोच की आलोचना करने वाले बयानों का उल्लेख करते हुए कहा कि क्या वह इस मामले में भी समान दृष्टिकोण अपनाएंगे? क्या वह कहेंगे, “पितृसत्ता को खत्म करो”?
भाजपा ने क्या कहा?
भाजपा नेता अमित मालवीय ने शुक्रवार (28 अगस्त) को समस्त केरल जमीयतुल उलमा के बयान का स्क्रीनशॉट साझा करते हुए एक्स पर लिखा, ”केरल के इस्लामिक संगठन समस्त केरल जमीयतुल उलमा ने एक फरमान जारी किया है कि त्यौहारों के दौरान महिलाओं को सार्वजनिक रूप से शामिल नहीं किया जाना चाहिए और उन्हें दूसरे पुरुषों के सामने नहीं लाया जाना चाहिए। क्या राहुल गांधी, जो खुद को पितृसत्ता को खत्म करने का चैंपियन बताते हैं, इस पर बोलेंगे और इसकी निंदा करेंगे?”
उन्होंने कहा कि क्या पितृसत्ता, पिंजरों और महिलाओं की आजादी पर उनके बयान केवल बहुसंख्यक समुदाय की महिलाओं के लिए ही हैं? उनके पिंजरा तोड़ो अभियान का क्या हुआ? क्या यह अभियान भी हिंदू समाज को निशाना बनाने की एक और कोशिश है, जबकि दूसरी जगहों पर उन्हीं सिद्धांतों का उल्लंघन होने पर चुप्पी साध ली जाती है?अगर महिलाओं की आजादी ही असल मकसद है, तो धर्म के आधार पर सिद्धांत नहीं बदल सकते।
ओणम कार्यक्रम मनाए जाने के वीडियो वायरल
रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह निर्देश तब आया है, जब सोशल मीडिया पर केरलम के मालाबार के अलग-अलग हिस्सों में छात्रों (जिनमें मुस्लिम लड़कियां भी शामिल थीं) द्वारा ओणम कार्यक्रम मनाए जाने के वीडियो वायरल हुए। इसके बाद, मुस्लिम लड़कियां और महिलाएं 26 अगस्त को हुए ईद-ए-मिलाद के जश्न में भी शामिल होती दिखीं, जिसकी इस्लामिक संस्थाओं ने मंजूरी नहीं दी थी। बयान में इस बात पर जोर दिया गया कि इस्लामी जश्न मजहबी सीमाओं से बाहर नहीं होने चाहिए। इस्लामिक संस्थानों के प्रमुखों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ऐसे कार्यक्रम या जश्न पूरी तरह से इस्लामी कानूनों के मुताबिक आयोजित हों। इसमें यह भी कहा गया कि सार्वजनिक सड़कों पर पुरुषों के बीच मुस्लिम महिलाओं का प्रदर्शन, गैर-इस्लामी रीति-रिवाजों और जश्न में उनकी भागीदारी की इस्लाम में इजाजत नहीं है।
















