भारत सिमटता जा रहा है। लगभग 2500 वर्ष में भारत का 24वां विभाजन हो चुका है। 24वां विभाजन 1947 में हुआ। अंग्रेजी शासनकाल में यह भारत का सातवां विभाजन था। प्रसिद्ध लेखक वैद्य गुरुदत्त के दो उपन्यास-‘विश्वासघात’ और ‘देश की हत्या’ विभाजन की विभीषिका पर ही आधारित हैं। इनमें विभाजन से पूर्व ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ से लेकर भारत के विभाजन और उसके बाद की घटनाओं का सिलसिलेवार वर्णन मिलता है।
वैद्य गुरुदत्त स्वयं इन घटनाओं के साक्षी रहे हैं। उन्होंने ‘विश्वासघात’ उपन्यास में अंग्रेजों की कुटिल चाल का विशेष उल्लेख करते हुए बताया है कि अंग्रेज भारतवर्ष को छोड़ने से पूर्व हिंदुओं का अकंटक राज्य स्थापित नहीं होने देना चाहते थे। उन्हें हिंदुओं पर विश्वास नहीं था। उनकी इच्छा थी कि यहां एक प्रबल मुस्लिम राज्य स्थापित हो जाए, जो हिंदुओं के स्वतंत्र राज्य को तंग करता रहे। वैद्य गुरुदत्त ने ‘देश की हत्या’ उपन्यास में ‘जौहर’ शीर्षक के अंतर्गत रावलपिंडी जिले की गुजर खान तहसील का वर्णन किया है। वहां करम सिंह और उसके पांच लड़के तथा बड़ी संख्या में सिख आबादी रहती थी। हजारों की संख्या में मुसलमान आसपास के गांवों से आ गए। मार-काट और वहशी दरिंदगी का नंगा नाच होने लगा। सभी लोग लड़ते हुए> अपनी जान बचाने के लिए कस्बे के गुरुद्वारे में पहुंच गए। वहां महिलाओं ने चिता जलाकर बच्चों के साथ स्वयं को स्वाहा कर लिया।
150 पुरुष वहां से दो मील दूर मंडली स्टेशन तक पहुंचने के लिए हजारों की भीड़ से लड़ते हुए आगे बढ़ने लगे। केवल छह लोग ही स्टेशन तक पहुंचने में सफल हो पाए। इसी कारण यह घटना संसार को पता लग सकी।
श्रीगुरुजी का प्रवास
5 अगस्त, 1947 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक श्रीगुरुजी का कराची में प्रवास हुआ। कराची शहर में सायं 5 बजे 10 हजार स्वयंसेवकों का शानदार और प्रभावशाली संचलन निकला। वहां उन्होंने कहा, “हमारी मातृभूमि पर एक बड़ी विपत्ति आन पड़ी है। मातृभूमि का विभाजन अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ नीति का ही परिणाम है। मुस्लिम लीग ने जो पाकिस्तान हासिल किया है, वह हिंसात्मक पद्धति से, अत्याचार का तांडव मचाते हुए हासिल किया है। हमारा दुर्भाग्य है कि कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के सामने घुटने टेक दिए। मुसलमान और उनके नेताओं को गलत दिशा में मोड़ दिया गया है।
ऐसा कहा जा रहा है कि वे इस्लाम मजहब का पालन करते हैं, इसलिए उन्हें अलग राष्ट्र चाहिए। जबकि देखा जाए तो उनके रीति-रिवाज, उनकी संस्कृति पूर्णतः भारतीय है, अरबी मूल की नहीं। यह कल्पना करना भी कठिन है कि हमारी खंडित मातृभूमि सिंधु नदी के बिना हमें मिलेगी। यह प्रदेश सप्त सिंधु का प्रदेश है। राजा दाहिर के तेजस्वी शौर्य का यह प्रदेश है। हिंगलाज देवी के अस्तित्व से पावन हुआ यह सिंध प्रदेश हमें छोड़ना पड़ रहा है। इस दुर्भाग्यशाली और संकट की घड़ी में सभी हिंदुओं को आपस में मिल-जुलकर एक-दूसरे का ध्यान रखना चाहिए। संकट के ये दिन भी खत्म हो जाएंगे, ऐसा मुझे विश्वास है।”
6 अगस्त, 1947 की प्रभात शाखा में प्रार्थना के उपरांत श्रीगुरुजी ने सिंध प्रांत के सभी प्रमुख शहरों के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं और प्रचारकों की बैठक ली। उन्होंने कहा, “हिंदुओं की सुरक्षा की जिम्मेदारी नियति ने ही संघ के कंधों पर सौंपी है।” 6 अगस्त, 1947 को ही श्रीगुरुजी के सान्निध्य में हैदराबाद में स्वयंसेवकों का बड़े पैमाने पर एकत्रीकरण हुआ। लगभग दो हजार से अधिक स्वयंसेवक उपस्थित थे। वहां श्रीगुरुजी ने कहा, “इस बात पर हमें पूरा विश्वास और श्रद्धा है कि गुंडागर्दी और हिंसा के सामने झुककर जो विभाजन स्वीकार किया गया, वह कृत्रिम है। आज नहीं तो कल, हम पुनः अखंड भारत बनेंगे। लेकिन फिलहाल हमारे सामने हिंदुओं की सुरक्षा का काम अधिक महत्वपूर्ण और चुनौतीपूर्ण है।”
क्रूर विभाजन
उन दिनों पंजाब राज्य में 29 जिले होते थे। 5 मार्च, 1947 से दंगे प्रारंभ हुए और बढ़ते-बढ़ते पश्चिमी और पूर्वी पंजाब में जगह-जगह फैल गए। लाहौर के निवासी इस आशा में थे कि लाहौर भारत में ही रहेगा। लेकिन 14 अगस्त, 1947 को नियति ने भारत का क्रूर विभाजन कर दिया और 17 अगस्त को सारा लाहौर जिला पाकिस्तान को दे दिया गया। यहां तक कि शक्करगढ़ तहसील, जो पूर्व में हिंदू बहुल थी और रावी नदी से लगी हुई थी, उसे भी पूर्वी पंजाब में सम्मिलित नहीं किया गया। लगभग डेढ़ करोड़ लोगों का विस्थापन हुआ। अखंड भारत पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान के नाम से विभाजित हो गया। पंजाब के 29 जिलों में से 17 जिले पश्चिमी पंजाब में चले गए और 12 जिले पूर्वी पंजाब को मिले।
संघ के शिविर
इस विपरीत परिस्थिति में श्रीगुरुजी के मार्गदर्शनों ने स्वयंसेवकों में साहस भर दिया। स्वयंसेवकों ने अतुलनीय बलिदान दिया और लोगों की भरपूर सहायता की। विस्थापितों के लिए करनाल, अंबाला, हिसार, रोहतक और कुरुक्षेत्र में सबसे बड़े और लंबे समय तक चलने वाले कैंप बनाए गए। पंजाब में 85, जबकि हरियाणा में कुल मिलाकर 50 शरणार्थी कैंप लगाए गए। हमारा परिवार (लेखक) भी सितंबर, 1947 में सरगोधा से अंबाला शहर के बलदेव नगर कैंप में विस्थापित हुआ। लाहौर के डी.ए.वी. महाविद्यालय में भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा बहुत बड़ा शरणार्थी शिविर लगाया गया, जो 21 नवंबर, 1947 तक चला। इसमें 30,000 शरणार्थी थे।
वहां लकड़ी और मिट्टी के तेल से खाना बनता था। कुछ दिन बाद तत्कालीन पाकिस्तान सरकार ने लकड़ी देना बंद कर दिया तो लोगों ने महाविद्यालय के दरवाजों और खिड़कियों को तोड़ना शुरू कर दिया। महाविद्यालय के प्रधानाचार्य लाला मेहरचंद जी को लगा कि अब लोग पुस्तकों को जला देंगे। उन्होंने शिविर के अधीक्षक श्री चुन्नीलाल कपूर से निवेदन किया-“आप इस महाविद्यालय की पुस्तकों को बचा लीजिए।” पुस्तकालय में बहुत-सी दुर्लभ पुस्तकों के साथ पंडित भगवद्दत्त जी द्वारा संग्रहित 7,000 पांडुलिपियां भी थीं। किसी तरह इन सारी पुस्तकों को ट्रकों में भरकर लौहगढ़ आर्य समाज, अमृतसर पहुंचाया गया। वर्तमान में इनमें से अधिकांश पुस्तकें पटियाला विश्वविद्यालय में सुरक्षित हैं।
अखंड भारत की कामना
कृष्णानंद सागर द्वारा चार भागों में लिखी गई ‘विभाजन कालीन भारत के साक्षी’ पुस्तक में 350 भुक्तभोगी परिवारों के संस्मरण हैं। एक स्थान पर कृष्णानंद सागर लिखते हैं- “सोचता हूं, हम एक रात के लिए घर से निकले थे। आज तीन पीढ़ियां बीत गईं, लेकिन वह एक रात समाप्त नहीं हुई। वह रात कब समाप्त होगी और हम कब घर वापस पहुंचेंगे? इसका उत्तर क्या कोई देगा?” महर्षि अरविंद घोष ने प्रथम स्वतंत्रता दिवस पर आकाशवाणी से प्रसारित संदेश में कहा था, “पारंपरिक सद्भाव अथवा समझौते से, चाहे जैसे भी हो, विभाजन समाप्त होना चाहिए और निश्चित होगा। यही प्रकृति की आवश्यकता और ईश्वरीय इच्छा है।”
भारतीय इतिहास के हजारों वर्षों के विजय-गौरव तथा सतत संघर्ष के आधार पर आशा है कि भारत की युवा पीढ़ी देश एवं राष्ट्र को उन्नत, सबल, समर्थ तथा शक्तिशाली बनाने के लिए पुनः प्रयास करेगी, ताकि भारत विश्व में पुनः महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर सके और महर्षि अरविंद के सपनों के भारत का निर्माण हो सके।
















