सिख इतिहास सेवा, सहायता, सरदारी, समर्पण, संघर्ष, साहस, शहादत और ‘सरबत का भला’ की भावना से भरा हुआ है। यही कारण है कि सिख समुदाय की पहचान केवल धार्मिक आस्था से नहीं, बल्कि संकट में दूसरों के साथ खड़े होने की परंपरा से भी जुड़ी रही है। बावजूद इसके अंबाला पंजोखरा साहिब विवाद के बाद जो घटनाक्रम सामने आया, उसने एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है,क्या किसी विवाद के समाधान के लिए ऐसा रास्ता चुना जा सकता है, जिससे हजारों आम लोग घंटों तक परेशानी में फंसें रहे और विपरीत हालात में जान भी जोखिम में दिखे ?
13 अगस्त को अंबाला में एनएच-44 पर करीब छह घंटे तक चले प्रदर्शन ने यही सवाल सामने ला दिया। लगभग 1,500 से 1,600 लोगों की भीड़ के हाईवे पर पहुंचने के बाद दिल्ली, पंजाब, चंडीगढ़ और हिमाचल की ओर जाने वाले मार्गों पर यातायात बुरी तरह प्रभावित हुआ। वाहनों की लंबी कतारें लगीं। इनमें बच्चे, महिलाएं, बुजुर्ग, मरीज और जरूरी काम से यात्रा कर रहे लोग भी शामिल थे। पेट्रोल-डीजल और गैस के टैंकरों तथा अन्य आवश्यक सामान लेकर जा रहे वाहन भी फंसे रहे। पुलिस के अनुसार, कुछ वाहनों के चालकों से चाबियां तक छीनी गईं,जबकि विपरीत हालात बनने पर यह गलत हरकत खुद प्रदर्शनकारियों सहित सैंकड़ों बेकसूर लोगों की जान,माल और राष्ट्रीय संपत्ति के लिए खतरा बन सकती थी।
7 अगस्त को पंजोखरा साहिब में गुरसिमरन सिंह मंड और उनके बेटे भवजोत से जुड़ा विवाद हुआ। पुलिस के अनुसार, वहां मौजूद कुछ लोगों ने मंड की गाड़ी पर हमला किया और तोड़फोड़ की। इस मामले में हरविंदर सिंह और अनमोल सिंह को गिरफ्तार किया गया। दूसरी ओर, एक सिख धड़े ने आरोप लगाया कि मंड की गाड़ी श्रद्धालुओं से टकराई और एक व्यक्ति वाहन के नीचे फंस गया। इस घटना का वीडियो सामने आने के बाद पुलिस ने जांच शुरू की। मंड और उनके बेटे के खिलाफ भी मामला दर्ज किया गया। दोनों युवकों की तत्काल रिहाई की मांग को लेकर विवाद बढ़ता गया और बाद में अंबाला में एनएच-44 पर प्रदर्शन हुआ।
बड़ा सवाल यही है कि किसी पक्ष को गिरफ्तारी गलत लगती है तो उसके पास अदालत, कानूनी अपील और प्रशासन से बातचीत और संतोष पर विरोध धरना प्रदर्शन करने के भी जैसे रास्ते हैं। लेकिन गिरफ्तारी के विरोध में राष्ट्रीय राजमार्ग को घंटों बंद कर देना उस आम आदमी को सजा देने जैसा है, जिनका इस विवाद से कोई लेना-देना नहीं,कहां तक जायज है। अस्पताल जाने वाला व्यक्ति, परीक्षा देने वाले विद्यार्थी, नौकरी पर जाने वाला कर्मचारी या देशभर में उपयोगी सामग्री की आपूर्ति लेकर निकल रहे चालक,किसी के विवाद की पीड़ा क्यों झेलें ?
पुलिस का कहना है कि प्रदर्शन के दौरान कुछ लोग धारदार हथियारों, गंडासों और अन्य हथियारों के साथ मौजूद थे और पुलिस पर हमला किया गया। पुलिस के अनुसार छह कर्मचारी घायल हुए, जिनमें डीएसपी वीरेंद्र शर्मा भी शामिल हैं। पुलिस ने दावा किया कि डीएसपी के अंगूठे पर धारदार हथियार से गंभीर चोट आई। स्थिति बिगड़ने के बाद पुलिस को आंसू गैस और लाठीचार्ज का सहारा लेना पड़ा। हरियाणा पुलिस ने बाद में संकेत दिया कि पुलिसकर्मियों पर हमला करने वालों की पहचान कर उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। इसी के साथ बड़ा सवाल यह भी है कि प्रदर्शन में शामिल हर व्यक्ति को हिंसा या उपद्रव के लिए जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा। बड़ी संख्या में लोग संभवतः अपनी मांग रखने के लिए आए होंगे। लेकिन भीड़ में यदि कुछ लोग पुलिस पर हमला करते हैं, रास्ता जबरन रोकते हैं या आवश्यक सेवाओं को बाधित करते हैं तो उनकी पहचान करके कानून के अनुसार कार्रवाई होना जरूरी है। धार्मिक पहचान किसी व्यक्ति को कानून से ऊपर होने का अधिकार नहीं दे सकती।
15 अगस्त से ठीक पहले हुई यह घटना इसलिए भी गंभीर है, क्योंकि देश राष्ट्रीय पर्व की तैयारी कर रहा है। कुछ लोग इसे किसी बड़ी साजिश से जोड़ रहे हैं, लेकिन फिलहाल ऐसी साजिश का सार्वजनिक रूप से प्रमाण सामने नहीं आया है। इसलिए इस दावे को तथ्य की तरह पेश करने के बजाय जांच का विषय मानना ही उचित होगा। हां, इतना स्पष्ट है कि संवेदनशील समय में सड़क बंद करने और हिंसक टकराव की स्थिति पैदा होने से प्रशासन, पुलिस और समाज,तीनों के सामने बड़ी चुनौती खड़ी होती है। अब रास्ता साफ है,मांगें कानून के दायरे में उठें, आरोपों की निष्पक्ष जांच हो और दोषी चाहे किसी भी पक्ष का हो, इनके खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई होनी चाहिये। पुलिस ने गिरफ्तार युवकों को अदालत की प्रक्रिया पूरी होने के बाद दो दिन में छोड़ने का आश्वासन दिया है और कहा है कि आगे की कार्रवाई कानून के अनुसार होगी। सिख परंपरा की सबसे बड़ी ताकत उसकी सेवा और ‘सरबत का भला’ की भावना है। इसलिए पंजोखरा विवाद से निकला सबसे बड़ा सबक यही है कि आस्था और अधिकारों की लड़ाई भी ऐसी होनी चाहिए जिसमें निर्दोष आम आदमी न पिसे। सड़क रोकना आसान है, लेकिन समाज का भरोसा बनाए रखना कठिन,असली सरदारी इसी कठिन रास्ते को चुनने में है।

















