यह श्लोक भारत की वैश्विक नीति और भूमिका को परिभाषित करता है। ‘आर्य’ का अर्थ किसी जाति से न होकर ‘श्रेष्ठ विचारों और आचरण’ से है।
श्लोक :
उत्कर्षों हास्तु हिन्दूनां, अखण्डं भारतं तथा।
कृण्वन्तो विश्वमार्य च प्रतिज्ञा सफला भवेत्॥
भावार्थ :
हिन्दुओं की उन्नति हो और भारत अखण्ड होये तथा सारे संसार को आर्य अर्थात् श्रेष्ठ बनाने की प्रतिज्ञा सफल हो।
आज की प्रासंगिक : यह श्लोक भारत को केवल एक मजबूत अर्थव्यवस्था या सैन्य शक्ति बनाने तक सीमित नहीं रखता, बल्कि नैतिक, वैचारिक और सांस्कृतिक रूप से विश्व का मार्गदर्शन (विश्वगुरु की भूमिका) करने के संकल्प को रेखांकित करता है।
आज के दौर में इस पंक्ति का प्रासंगिकता ‘हिंदू’ शब्द के व्यापक अर्थ है। यह केवल धार्मिक उत्थान नहीं, बल्कि भारतीय चिंतन, दर्शन, योग, आयुर्वेद और सनातन मूल्यों (वसुधैव कुटुंबकम्) को पुनर्जीवित करने और विश्व पटल पर स्थापित करने का प्रतीक है। आधुनिक भारत के युवाओं में अपनी संस्कृति और जड़ों के प्रति बढ़ता गर्व इसी उत्थान का संकेत है।

















