पाञ्चजन्य द्वारा आयोजित ‘सुशासन संवाद राजस्थान’ में राजस्थान के मुख्यमंत्री श्री भजनलाल शर्मा जी ने विशेष बातचीत की। इस विशेष संवाद में मुख्यमंत्री ने राजस्थान के विकास, सुशासन, जनकल्याण और सरकार की प्राथमिकताओं के साथ-साथ भारतीय संस्कृति, राष्ट्रभाव, कर्तव्यबोध और युवा शक्ति की भूमिका पर भी विस्तार से अपने विचार साझा किए। मुख्यमंत्री श्री भजनलाल शर्मा ने पाञ्चजन्य के साथ अपने पुराने जुड़ाव को स्मरण करते हुए कहा कि यह केवल एक पत्रिका नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक मूल्यों और राष्ट्रभक्ति की सशक्त आवाज रही है। उन्होंने पंडित श्री दीनदयाल उपाध्याय के ‘एकात्म मानववाद’ से लेकर श्री अटल बिहारी वाजपेयी के सुशासन के विचारों तक, उन मूल सिद्धांतों को रेखांकित किया जो अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुंचाने और राष्ट्र को सशक्त बनाने की प्रेरणा देते हैं।
उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे अपनी संस्कृति, इतिहास और विरासत को समझें, अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों को भी पहचानें और भारत को विश्व में अग्रणी राष्ट्र बनाने के संकल्प के साथ आगे बढ़ें। आइए, सुनते हैं मुख्यमंत्री श्री भजनलाल शर्मा के साथ हुआ यह विशेष ‘सुशासन संवाद राजस्थान’।
सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रभाव
आज पाञ्चजन्य सुशासन संवाद में आप सभी के बीच आकर मुझे अत्यंत प्रसन्नता हो रही है। यह मेरे लिए गौरव का विषय है, क्योंकि आज का विषय केवल शासन-व्यवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारी राष्ट्रीय भावना, सांस्कृतिक चेतना और उन जीवन-मूल्यों से जुड़ा हुआ है, जिन्हें हमारे महापुरुषों और हमारे पूर्वजों ने हमें विरासत में सौंपा है।
पाञ्चजन्य भारत की राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक मूल्यों और राष्ट्रीय विचारधारा की एक सशक्त आवाज रहा है। जब हम विद्यार्थी परिषद में काम करते थे, उस समय पाञ्चजन्य घर-घर सहजता से उपलब्ध नहीं होता था। कहीं किसी संस्थान में मिलता था, कहीं किसी कार्यालय में। जब हमें पाञ्चजन्य की प्रति मिलती थी तो उसे पढ़ने के लिए हम किसी न किसी नुक्कड़ या शांत स्थान पर चले जाते थे। जितना समय मिलता, उतने समय में उसे पढ़ने का प्रयास करते थे। कई बार तो आग्रहपूर्वक उसे अपने साथ ले आते थे। उस समय पाञ्चजन्य की भूमिका आज की तरह ही अत्यंत महत्वपूर्ण थी। उसमें प्रकाशित लेख हमें गौरव का अनुभव कराते थे। उसके विचारों को पढ़कर हमारे भीतर राष्ट्र के प्रति भावना, विश्वास और समर्पण का भाव उत्पन्न होता था।
राष्ट्रभाव की प्रेरणा
आप सभी जानते हैं कि किसी भी विषय की अनुभूति तीन प्रकार से होती है- देखकर, पढ़कर और सुनकर। जब किसी विषय की अनुभूति हमारे भीतर गहराई से होती है, तो उसका अनुसरण भी हम अपने जीवन में करने लगते हैं। मेरे राष्ट्र के कर्णधार युवाओं, मैं आपसे यही कहना चाहता हूं कि हमारे राष्ट्र के प्रति हमारे जो विचार हैं, हमारी जो संस्कृति है, वह हमें यूं ही प्राप्त नहीं हुई है। यह हमारे पूर्वजों की अमूल्य थाती है। दुनिया में शायद ही कोई दूसरा राष्ट्र ऐसा होगा, जिसकी सांस्कृतिक विरासत इतनी प्राचीन, व्यापक और निरंतर जीवंत रही हो। इस राष्ट्रीय विचारधारा की सशक्त आवाज पाञ्चजन्य है, जो 1948 से निरंतर इस यात्रा को आगे बढ़ाने का कार्य कर रहा है। पाञ्चजन्य संस्कृति, स्वाभिमान और राष्ट्रभक्ति की प्रेरणा की गाथा है। इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की उस राष्ट्रसेवा की परंपरा का स्मरण करना भी स्वाभाविक है, जिसने समाज के प्रत्येक वर्ग को संगठित होने और राष्ट्र निर्माण के लिए समर्पित होने की प्रेरणा दी है।
पाञ्चजन्य की विचारधारा
पाञ्चजन्य के मार्गदर्शक पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने भारतीय चिंतन को ‘एकात्म मानववाद’ का दर्शन दिया। उन्होंने राष्ट्र को मजबूत और विकसित बनाने की जो परिकल्पना प्रस्तुत की, उसका मूल भाव यही था कि समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक विकास का लाभ पहुंचे। जब तक अंतिम व्यक्ति आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्त नहीं होगा, तब तक राष्ट्र की वास्तविक प्रगति संभव नहीं है। निश्चित रूप से पाञ्चजन्य ने भी सदैव समाज की अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति को आगे लाने और उसकी आवाज को सामने रखने का प्रयास किया है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने हमें यह बताया कि भारत में शासन का आधार हमारी अपनी संस्कृति, हमारी सामाजिक संरचना और हमारी मानवीय संवेदनाओं से जुड़ा होना चाहिए।
अटल जी के विचारों से सुशासन की प्रेरणा
वर्ष 1948 में पाञ्चजन्य का साप्ताहिक प्रकाशन श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के संपादन में प्रारंभ हुआ। श्रद्धेय अटल जी के संपादन में पाञ्चजन्य ने भारतीय संस्कृति के आदर्शों का स्मरण कराने और राष्ट्रीय चेतना को जागृत करने का संकल्प लिया। हम हर वर्ष 25 दिसंबर को पूर्व प्रधानमंत्री, भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी जी की जयंती मनाते हैं और इसे ‘सुशासन दिवस’ के रूप में भी मनाया जाता है। इसके पीछे एक गहरी भावना है। हमारे पूर्वजों और मनीषियों ने जिस कल्पना और विचार के साथ इस राष्ट्र को स्वतंत्रता दिलाने का स्वप्न देखा था, उन विचारों को आगे बढ़ाना और उन्हें शासन तथा समाज के जीवन में उतारना हमारी जिम्मेदारी है।
राष्ट्रनिर्माण में जागरूकता और सांस्कृतिक चेतना की भूमिका
आप सभी यह भी जानते हैं कि जब देश की आजादी की लड़ाई लड़ी जा रही थी, तब जितने लोग स्वतंत्रता संग्राम में संघर्ष कर रहे थे, उससे कहीं अधिक लोग केवल तमाशा देख रहे थे। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं था कि वे देश की स्वतंत्रता नहीं चाहते थे। अंतर केवल इतना था कि उन्हें सही जानकारी और सही दिशा का भान नहीं था। आज भी मैं आपसे यही कहना चाहता हूं कि वर्तमान परिदृश्य में हमें समाज को जोड़ने का काम करना चाहिए। हमें लोगों को जागरूक करना चाहिए और उन्हें बताना चाहिए कि हमारा राष्ट्र विश्व में प्रथम कैसे बन सकता है। हमारी सांस्कृतिक विरासत इतनी समृद्ध है कि दुनिया के अनेक देश हमारी संस्कृति को समझने और उससे प्रेरणा लेने के लिए भारत की ओर देखते हैं। जिन लोगों ने कभी हमारी संस्कृति को बदलने का प्रयास किया, वे स्वयं समय के साथ सीमित होकर रह गए, लेकिन भारत की संस्कृति निरंतर आगे बढ़ती रही। यही भारत की आत्मा है।
इसलिए मैं आप सभी से कहना चाहता हूं कि हमारे उपनिषदों, हमारी गीता, हमारी रामायण और हमारे अन्य शास्त्रों में जीवन और राष्ट्र निर्माण के लिए बहुत कुछ निहित है। आप शोध करते हैं, इसलिए मैं आपसे आग्रह करूंगा कि इन विषयों पर भी शोध करें। हमारी संस्कृति को देखें, हमारे विचारों को समझें और उनके मूल भाव को वर्तमान समय के संदर्भ में समाज तक पहुंचाने का प्रयास करें। मित्रों, भारत की सनातन संस्कृति हमारे पूर्वजों की वह थाती है, जिसमें परिवार, प्रेम, संस्कार और कर्तव्य को विशेष स्थान दिया गया है। लंबे समय तक इस राष्ट्र का जीवन केवल अधिकारों की भावना पर नहीं, बल्कि कर्तव्य की भावना पर आधारित रहा है। हमारे यहां कर्तव्य में ही अधिकारों का भाव समाहित माना गया है।
अधिकार से पहले कर्तव्य का बोध
आज परिस्थितियां बदल रही हैं। आज हम अक्सर पूछते हैं- मेरा अधिकार क्या है? बेटी पूछती है कि मेरा अधिकार क्या है, पत्नी पूछती है कि मेरा अधिकार क्या है, समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपने अधिकारों की बात करता है। लेकिन आवश्यकता इस बात की भी है कि हम स्वयं से पूछें- मेरा कर्तव्य क्या है? हमारी संस्कृति हमें कर्तव्य का बोध कराती है। इसलिए हमें अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों को भी समझना होगा। मैं आप सभी से यह भी कहना चाहता हूं कि माता-पिता के बिना कुछ नहीं है, गुरु के बिना कुछ नहीं है। हमें अपने माता-पिता और अपने पूर्वजों से जो आदर्श और संस्कार प्राप्त हुए हैं, उन्हें संजोकर रखना चाहिए। हमें यह विचार करना चाहिए कि उन संस्कारों को अपने जीवन में कैसे उतारें और उन्हीं संस्कारों के आधार पर अपने राष्ट्र को आगे कैसे ले जाएं।
स्वाधीन भारत की यात्रा के प्रत्येक मोड़ पर पाञ्चजन्य ने राष्ट्रीयता के सजग प्रहरी के रूप में अपनी भूमिका निभाई है। पाञ्चजन्य की शुरुआत लखनऊ से हुई और बाद में इसका प्रकाशन दिल्ली से होने लगा। समय के साथ इसके स्वरूप और आकार में परिवर्तन आया, लेकिन पाञ्चजन्य के मूल चरित्र में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। आज भी पाञ्चजन्य राष्ट्रीय रक्षा और राष्ट्र निर्माण के इस यज्ञ में निरंतर अपनी आहुति दे रहा है।
अटल स्मृति वर्ष के अवसर पर पाञ्चजन्य के मंच पर सुशासन पर यह संवाद अपने आप में अत्यंत महत्वपूर्ण है। श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी जी की जन्मशती के अवसर पर आयोजित यह कार्यक्रम उनके विचारों, उनके व्यक्तित्व और उनके सुशासन के प्रति समर्पण को स्मरण करने का एक महत्वपूर्ण अवसर है।
राष्ट्रसेवा की प्रेरणा बने अटल जी
मैं पाञ्चजन्य को जयपुर में इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम के आयोजन के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद और साधुवाद देता हूं। मुझे भी माननीय पूर्व प्रधानमंत्री, भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी जी के साथ कुछ समय उनके सानिध्य में रहने का अवसर मिला है। उनके व्यक्तित्व, नेतृत्व, ज्ञान और कवित्व की जितनी प्रशंसा की जाए, वह कम है। मुझे आज भी वह अवसर स्मरण है, जब मैं पहली बार उनसे मिलने दिल्ली गया था। उस समय मैं युवा मोर्चा में काम करता था। उत्तर प्रदेश के नगला चंद्रभान में हमारे संघ के एक वरिष्ठ प्रचारक थे, जो हमारे लिए ताऊ जी के समान थे। उनके साथ मुझे अटल जी से मिलने का अवसर मिला। जब मैं उनसे मिला और उनसे बातचीत की, तो उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता यह लगी कि राष्ट्र उनके लिए केवल एक शब्द नहीं था, बल्कि उनके जीवन की भावना था। उनके मुंह से निकलने वाला राष्ट्र के प्रति एक-एक शब्द प्रेरणा देता था। राष्ट्र के लिए उनका योगदान अत्यंत व्यापक और अविस्मरणीय है। उन्होंने सुशासन को केवल शासन की व्यवस्था नहीं माना, बल्कि उसे राष्ट्रसेवा का माध्यम बनाया। उनके विचार, उनका नेतृत्व और उनका जीवन आज भी हम सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।
इसी प्रेरणा को आगे बढ़ाते हुए हमें अपने राष्ट्र, अपनी संस्कृति, अपने समाज और अपने कर्तव्यों के प्रति समर्पित होकर भारत को एक सशक्त, समृद्ध और विश्व में अग्रणी राष्ट्र बनाने के संकल्प के साथ आगे बढ़ना चाहिए।














