
प्रतीकात्मक तस्वीर
पंजाब में विधानसभा चुनाव चौखट पर दस्तक देना शुरू कर चुके हैं। आम आदमी पार्टी के नेतृत्व वाली भगवंत मान की सरकार ने 16 मार्च, 2022 को शपथ ग्रहण किया और इस सरकार के कार्यकाल के छह महीनों का समय शेष बचा है। संभावना है कि अगले साल के पहले दो महीनों में विधानसभा चुनाव हो सकते हैं। वैसे राजनीतिक दलों ने लंगर लंगोट कसने शुरू भी कर दिए हैं और विकास के तमाम दावों के बावजूद सत्ताधारी पार्टी खतरनाक पंथक राजनीति खेलती दिखाई दे रही है। केवल इतना ही नहीं इन चुनावों में पंथक मुद्दों की बहुतायत होती दिखाई दे रही है।
पंजाब में 2027 में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। वारिस पंजाब दे ने अपना पहला उम्मीदवार घोषित कर चुनावी गतिविधियों में तेजी ला दी है। विधानसभा चुनाव को लेकर अकाली दल (वारिस पंजाब दे) ने अपना पहला उम्मीदवार घोषित कर दिया है। पार्टी ने फतेहगढ़ साहिब की बस्सी पठाना विधानसभा सीट से सतवंत सिंह को उम्मीदवार बनाया है। सतवंत सिंह पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या की साजिश के मामले के दोषी केहर सिंह का बेटा है। पार्टी की ओर से आज मंगलवार को अमृतसर में उनके नाम की घोषणा की गई।
उम्मीदवारी का एलान पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष और खडूर साहिब के खालिस्तान समर्थक सांसद अमृतपाल सिंह के पिता तरसेम सिंह ने किया। इस दौरान सांसद सरबजीत सिंह खालसा भी मौजूद रहे। पार्टी ने इसे 2027 चुनाव के लिए अपना पहला उम्मीदवार बताया है। पार्टी नेताओं के अनुसार, सतवंत सिंह को उम्मीदवार बनाने के पीछे उन परिवारों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने की नीति है, जिन्हें पार्टी पंथ और पंजाब के लिए संघर्ष करने वाले मानती है। तरसेम सिंह ने कहा कि ऐसे परिवारों के सम्मान को केवल बयानों तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए, बल्कि उन्हें संगठन और राजनीति में भी उचित स्थान मिलना चाहिए।
पंजाब की राजनीति में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पंथक मुद्दे एक बार फिर केंद्र में आते दिखाई दे रहे हैं। मुख्यमंत्री भगवंत मान द्वारा पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह हत्याकांड में उम्रकैद की सजा काट रहे आतंकवादी जगतार सिंह हवारा को अपनी बीमार मां से मिलने के लिए 10 दिन की पैरोल देने की सिफारिश ने सियासी हलकों में नई बहस छेड़ दी है। मान ने राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया को पत्र लिखकर हवारा की मां की बिगड़ती सेहत का हवाला देते हुए मानवीय आधार पर पैरोल पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करने का आग्रह किया है।
यह कदम इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि हवारा की पैरोल का मामला लंबे समय से पंजाब की पंथक राजनीति का संवेदनशील मुद्दा रहा है। इसी साल फरवरी में गांव हवारा कलां में आयोजित एक पंथक सभा में भी हवारा की बीमार मां से मुलाकात के लिए पैरोल की मांग प्रमुखता से उठी थी और सरकार को इस मामले में समयबद्ध कार्रवाई करने की मांग की गई थी। इस साल जुलाई में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने हवारा की पैरोल याचिका पर समयबद्ध प्रक्रिया के तहत कार्रवाई के निर्देश दिए थे।
मान के पैरोल संबंधी पत्र ने सबसे ज्यादा असहज स्थिति शिरोमणि अकाली दल के सामने पैदा कर दी है। बंदी सिंहों की रिहाई और सिख कैदियों के मुद्दे पर अकाली दल लंबे समय से अपनी पंथक पहचान को मजबूत करता रहा है। यानी अकाली दल के सामने एक ऐसी स्थिति बन गई है जिसमें समर्थन करे तो आम आदमी पार्टी को पंथक मुद्दे पर श्रेय मिल सकता है और विरोध करे तो पंथक मतदाताओं के बीच गलत संदेश जाने का खतरा है।
दूसरी ओर बेअदबी कानून पर अकाली दल आम आदमी पार्टी को घेरने की तमाम कोशिश कर रहा है और इस प्रयास में एसजीपीसी से लेकर अकाल तख्त से भी अकाली दल को परोक्ष रूप से साथ मिलता दिख रहा है। अकाल तख्त पंजाब सरकार को इस आधार पर घेर रहा है कि उसने उक्त कानून लाते समय पंथक शक्तियों से विचार विमर्श नहीं किया। अकाल तख्त इस मामले में पूरी सरकार को अपने यहां तलब कर चुका है और कानून में बदलाव के लिए धार्मिक निर्देश जारी कर चुका है। परेशानी यह है कि सरकार ने न तो अभी तक अकाल तख्त के सुझावों को पूरी तरह लागू किया है और न ही इनकार कर रही है। अकाली दल इसी पंथक मुद्दे पर सत्ताधारी आम आदमी पार्टी को घेरने की जुगत में दिख रहा है।
आतंकी जगतार सिंह हवारा की पैरोल की सिफारिश कोई पहला मामला नहीं, इससे पहले भी आम आदमी पार्टी पर खालिस्तानी तत्वों से सहयोग लेने के आरोप लग चुके हैं। पार्टी सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल 2017 के विधानसभा चुनावों के दौरान मोगा जिले के गांव घलकलां में पूर्व आतंकवादी गुरिंदर सिंह के घर में रात बिता चुके हैं। केवल इतना ही नहीं विदेशों में बैठे खालिस्तानी तत्व रह रह कर अपना संबंध झाड़ू वाली पार्टी से होना बताते रहे हैं। आतंकी हवारा वाले ताजा प्रकरण ने साबित कर दिया है कि चुनाव जीतने के लिए आम आदमी पार्टी अलगाववादियों व कट्टरपंथियों का साथ मांगने से भी गुरेज नहीं करती।