मक्का समझौता: आज ईरान के खिलाफ सुरक्षा कवच, कल किसके खिलाफ बड़ा रणनीतिक खेल?
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मक्का समझौता: आज ईरान के खिलाफ सुरक्षा कवच, कल किसके खिलाफ बड़ा रणनीतिक खेल?

सऊदी अरब लंबे समय से ईरान समर्थित हूती हमलों का सामना करता आया है और ऐसे में रियाद का अपनी सुरक्षा के लिए अतिरिक्त सैन्य गारंटी तलाशना स्वाभाविक है।

Written byसुबोध मिश्रासुबोध मिश्रा — edited by Mahak Singh
Aug 8, 2026, 03:00 pm IST
inविश्व
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मक्का में सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान के बीच हुआ संयुक्त रक्षा समझौता पहली नजर में ईरान और उसके समर्थित गुटों, विशेषकर यमन के हूती शासन, से उत्पन्न तत्काल सुरक्षा खतरे का जवाब दिखाई देता है। सऊदी अरब लंबे समय से ईरान समर्थित हूती हमलों का सामना करता आया है और ऐसे में रियाद का अपनी सुरक्षा के लिए अतिरिक्त सैन्य गारंटी तलाशना स्वाभाविक है। समझौते का मूल सिद्धांत एक सदस्य पर हमला तीनों पर हमला माना जाएगा।
निश्चित रूप से एक मजबूत प्रतिरोधक संदेश देता है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में किसी समझौते को केवल उसके तत्काल उद्देश्य से समझना अक्सर भूल साबित होता है। असली सवाल यह है कि यह समझौता आने वाले वर्षों में किस रूप में विकसित हो सकता है?

ईरान तत्काल कारण हो सकता है, अंतिम लक्ष्य नहीं

वर्तमान परिस्थितियों में ईरान को इस समझौते का सबसे तत्काल सुरक्षा-कारक मानना स्वाभाविक है। अमेरिका और इजरायल के साथ ईरान का जारी संघर्ष पूरे पश्चिम एशिया की सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावित कर रहा है। सऊदी अरब भी ईरानी मिसाइलों और हूती हमलों के खतरे से अनजान नहीं है। लेकिन एक महत्वपूर्ण विरोधाभास भी है। ईरान लगातार यह संदेश देता रहा है कि उसका संघर्ष मुस्लिम देशों के खिलाफ नहीं, बल्कि अमेरिका और इजरायल के खिलाफ है। तेहरान ने इस्लामी देशों से अपने संघर्ष से दूर रहने और कूटनीतिक समाधान की वकालत की है। यदि ऐसा है, तो मक्का समझौते को केवल ईरान विरोधी सैन्य गठबंधन मानना पर्याप्त नहीं होगा। यहीं से इसके दीर्घकालिक रणनीतिक अर्थ सामने आते हैं।

भारत के लिए तुर्किये की मौजूदगी कोई आश्चर्य नहीं

भारत के दृष्टिकोण से पाकिस्तान और तुर्किये का एक ही रक्षा मंच पर होना कोई अप्रत्याशित घटना नहीं है। भारत-पाकिस्तान के हालिया सैन्य टकराव के दौरान तुर्किये ने खुले तौर पर पाकिस्तान का समर्थन किया था और पाकिस्तान को ड्रोन तथा अन्य सैन्य उपकरण उपलब्ध कराने की खबरें भी सामने आई थीं। इसलिए नई दिल्ली के लिए पाकिस्तान और तुर्किये की बढ़ती सामरिक निकटता पहले से ही चिंता का विषय रही है। इस समीकरण में नया और अधिक महत्वपूर्ण तत्व है—सऊदी अरब का औपचारिक रूप से इस व्यवस्था में शामिल होना। इसका अर्थ यह कतई नहीं कि सऊदी अरब भारत विरोधी शक्ति बन गया है या पाकिस्तान के साथ संघर्ष की स्थिति में वह स्वतः भारत के विरुद्ध युद्ध करेगा। भारत और सऊदी अरब के आर्थिक, ऊर्जा और रणनीतिक संबंध अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। फिर भी नई दिल्ली को इस संभावना को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए कि पाकिस्तान भविष्य में इस सामूहिक रक्षा व्यवस्था का इस्तेमाल किसी भारत-पाकिस्तान संकट को व्यापक अंतरराष्ट्रीय या इस्लामी मंच देने के लिए कर सकता है।

इजरायल भी इस बदलते समीकरण का महत्वपूर्ण हिस्सा

तुर्किये और इजरायल के संबंधों में हाल के वर्षों में भारी गिरावट आई है। दूसरी ओर भारत और इजरायल के बीच रक्षा तथा रणनीतिक संबंध लगातार मजबूत हुए हैं। इसलिए एक तरफ भारत-इजरायल की निकटता और दूसरी तरफ पाकिस्तान-तुर्किये की बढ़ती सामरिक साझेदारी अपने आप में एक महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक विरोधाभास पैदा करती है। सऊदी अरब को इसमें शामिल कर लेने से यह समीकरण और जटिल हो जाता है। आज इसे भारत या इजरायल विरोधी गठबंधन कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन इतिहास बताता है कि रणनीतिक गठबंधन अक्सर अपने प्रारंभिक उद्देश्य से कहीं आगे निकल जाते हैं और फिर आता है चीन- इस पूरे समीकरण का सबसे महत्वपूर्ण खिलाड़ी

मक्का समझौते का सबसे बड़ा और शायद सबसे कम चर्चित पहलू चीन हो सकता है। बीजिंग पिछले कुछ वर्षों से पश्चिम एशिया में अपना आर्थिक और रणनीतिक प्रभाव तेजी से बढ़ा रहा है। पाकिस्तान तो लंबे समय से चीन का प्रमुख सामरिक साझेदार है। दूसरी ओर चीन और ईरान के बीच भी गहरे रणनीतिक संबंध हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अमेरिकी सरकार ने चीनी संस्थाओं पर ईरान को ऐसी उपग्रह तस्वीरें उपलब्ध कराने के आरोप में कार्रवाई की है, जिनका इस्तेमाल अमेरिकी ठिकानों के खिलाफ ईरानी सैन्य अभियानों में किया जा सकता था। इससे एक व्यापक रणनीतिक तस्वीर उभरती है। चीन को पश्चिम एशिया में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए स्वयं युद्ध में उतरने की आवश्यकता नहीं है। वह ईरान को तकनीकी और आर्थिक सहायता दे सकता है, पाकिस्तान को अपना विश्वसनीय सैन्य साझेदार बनाए रख सकता है और साथ ही सऊदी अरब के साथ अपने आर्थिक संबंधों को मजबूत कर सकता है। यानी बीजिंग सीधे युद्ध लड़ने के बजाय दूसरों के माध्यम से अमेरिकी प्रभाव को चुनौती देने वाली संरचना तैयार कर सकता है।

अमेरिका के लिए शायद भारत से भी बड़ी चिंता

इस समझौते का सबसे बड़ा दीर्घकालिक प्रभाव अमेरिका पर पड़ सकता है। अमेरिका दशकों से खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा का प्रमुख बाहरी संरक्षक रहा है। लेकिन सऊदी अरब अब अपनी सुरक्षा के लिए केवल वाशिंगटन पर निर्भर नहीं रहना चाहता। तुर्किये भी नाटो का सदस्य होते हुए स्वतंत्र विदेश नीति अपनाने की कोशिश कर रहा है। पाकिस्तान पहले से ही चीन पर सैन्य और आर्थिक रूप से काफी निर्भर है। यदि इन तीनों देशों की सामरिक निकटता बढ़ती है, तो अमेरिका के सामने एक असहज प्रश्न खड़ा होगा-

क्या उसके पारंपरिक सहयोगी धीरे-धीरे ऐसी वैकल्पिक सुरक्षा व्यवस्था तैयार कर रहे हैं, जिसमें अमेरिका की आवश्यकता कम होती जाए? यही मक्का समझौते का सबसे बड़ा भू-राजनीतिक प्रश्न हो सकता है।

भारत को घबराने की नहीं, दूरदर्शिता की जरूरत

नई दिल्ली के लिए इस घटनाक्रम का उत्तर न तो घबराहट है और न ही आत्मसंतोष। भारत को सऊदी अरब और खाड़ी देशों के साथ अपने संबंध और मजबूत करने चाहिए। संयुक्त अरब अमीरात के साथ उसकी रणनीतिक निकटता पहले ही महत्वपूर्ण आधार प्रदान करती है। इजरायल के साथ रक्षा सहयोग, ग्रीस के साथ बढ़ते संबंध और अमेरिका, यूरोप तथा इंडो-पैसिफिक साझेदारों के साथ सहयोग भारत को पर्याप्त रणनीतिक विकल्प देते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पाकिस्तान को मक्का समझौते को दक्षिण एशिया की राजनीति में इस्तेमाल करने का अवसर नहीं दिया जाना चाहिए।

असल शतरंज की बिसात

मक्का समझौते को तीन स्तरों पर देखना अधिक उचित होगा।

पहला- आज यह ईरान और उसके समर्थित गुटों के खिलाफ एक सुरक्षा कवच है।

दूसरा- यह सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान की अमेरिका से अपेक्षाकृत अधिक रणनीतिक स्वायत्तता की कोशिश हो सकती है।

तीसरा- यह चीन और अमेरिका के बीच चल रही व्यापक भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का एक नया मोर्चा बन सकता है।

भारत और इजरायल इस बड़ी शतरंज की बिसात पर महत्वपूर्ण मोहरे नहीं, बल्कि अपने-अपने हितों वाले स्वतंत्र खिलाड़ी हैं। इसलिए भारत को मक्का समझौते से भयभीत होने की नहीं, उसकी अगली चाल को समय रहते पढ़ने की जरूरत है। क्योंकि संभव है कि ईरान इस समझौते का तत्काल कारण हो, लेकिन चीन-अमेरिका की वैश्विक प्रतिस्पर्धा वह बड़ी शक्ति हो, जो इस नई पश्चिम एशियाई सुरक्षा संरचना को धीरे-धीरे एक बिल्कुल अलग दिशा दे
और भू-राजनीति में सबसे बड़ी भूल यही होती है- आज की चाल को देखकर कल की बिसात को नजरअंदाज कर देना।

Topics: USAIranisraelturkeyIndiageopoliticsChinaतुर्कियेHouthisMecca Defense AgreementWest AsiaPakistanDefense AgreementSaudi Arabia
सुबोध मिश्रा
सुबोध मिश्रा
वरिष्ठ पत्रकार (हिंदुस्तान टाइम्स और पीटीआई ) [Read more]
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