नई दिल्ली। राष्ट्रीय हाथकरघा दिवस के अवसर पर आज संसद भवन स्थित प्रधानमंत्री कार्यालय में खेती विरासत मिशन, पंजाब के 20 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी से भेंट कर उन्हें प्राकृतिक खेती से उगाई गई भारत की पारंपरिक देसी, गैर-बीटी कपास के हाथ से काते गए सूत और हथकरघे पर बुनी खादी से निर्मित भारतीय राष्ट्रीय ध्वज-तिरंगा समर्पित किया।
प्रतिनिधिमंडल में 10 बुनकर तथा 10 प्राकृतिक किसान, किसान-प्रशिक्षक एवं इस पहल से जुड़े कार्यकर्ता शामिल थे। बुनकरों में अधिकांश नव-त्रिंजन से जुड़ी ग्रामीण महिला कारीगर थीं, जिन्होंने अपने हाथों से कपास से सूत और सूत से खादी की इस यात्रा को साकार किया है। यह अवसर केवल राष्ट्रीय ध्वज भेंट करने का कार्यक्रम नहीं था, बल्कि “बीज से तिरंगे तक” की उस समग्र स्वदेशी यात्रा का राष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुतीकरण था, जिसमें प्राकृतिक खेती, देसी बीज, देसी कपास, खादी, हाथकताई, हाथकरघा, महिला सशक्तिकरण, कौशल विकास, ग्रामीण रोजगार, विकेन्द्रीकृत अर्थव्यवस्था और आत्मनिर्भर भारत की भावना एक ही सूत्र में जुड़ती है।
प्रधानमंत्री ने बुनकरों और किसानों का बढ़ाया उत्साह
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने प्रतिनिधिमंडल के साथ अत्यंत आत्मीय वातावरण में लगभग आधे घंटे तक खुलकर बातचीत की। उन्होंने प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों का परिचय जाना, उनके जीवन और काम के बारे में पूछा तथा विशेष रूप से महिला बुनकरों के श्रम, कौशल, धैर्य और समर्पण की प्रशंसा की। संवाद के दौरान प्रधानमंत्री जी ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा- “आज आप लोगों ने आकर मेरा राष्ट्रीय हाथकरघा दिवस सचमुच सार्थक बना दिया।” प्राकृतिक खेती के संदर्भ में उन्होंने कहा, “प्राकृतिक खेती के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है। यही करना है।” प्रतिनिधिमंडल का उत्साहवर्धन करते हुए प्रधानमंत्री जी ने कहा, “आप लोगों का आगे बढ़ना लाज़िमी है।”
प्रधानमंत्री जी ने संवाद के दौरान करुणा, संवेदनशीलता, सेवा-भाव और समाज के प्रति जिम्मेदारी के महत्व पर भी प्रेरक प्रसंग साझा किए। उनके इस आत्मीय संवाद ने विशेष रूप से ग्रामीण महिला बुनकरों और प्राकृतिक किसानों को अत्यंत प्रभावित एवं प्रेरित किया।
नव-त्रिंजन : खेत से करघे और करघे से तिरंगे तक
प्रतिनिधिमंडल ने प्रधानमंत्री जी को बताया कि खेती विरासत मिशन द्वारा विकसित नव-त्रिंजन केवल एक बुनकरी परियोजना नहीं है, बल्कि पंजाब में एक समग्र ग्रामीण पुनर्जागरण और Farm-to-Fabric मॉडल विकसित करने का प्रयास है। इस पूरी श्रृंखला की शुरुआत प्राकृतिक खेती करने वाले किसानों से होती है, जो भारत की पारंपरिक देसी, गैर-बीटी और जहर-मुक्त कपास उगाते हैं। इसके बाद ग्रामीण महिलाएँ कपास को तैयार करती हैं, चरखे पर सूत कातती हैं, हाथकरघे पर खादी बुनती हैं और फिर उसी वस्त्र को मूल्यवर्धित उत्पादों—खेस, शॉल, स्टोल, वस्त्र तथा राष्ट्रीय ध्वज—के रूप में तैयार किया जाता है।
इस प्रकार खेती विरासत मिशन और नव-त्रिंजन के प्रयास में किसान, बुनकर, महिला, युवा, कारीगर, उपभोक्ता और स्थानीय बाजार एक ही विकेन्द्रीकृत ग्रामीण अर्थव्यवस्था की श्रृंखला में जुड़ते हैं।
स्वदेशी, खादी और प्राकृतिक खेती- एक ही पहल में समाहित
खेती विरासत मिशन ने प्रधानमंत्री जी के समक्ष यह भी रखा कि वे वर्षों से स्वदेशी, खादी, प्राकृतिक खेती, आत्मनिर्भर भारत, वोकल फॉर लोकल और ग्रामीण उद्यमिता को राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के रूप में आगे बढ़ाते रहे हैं। नव-त्रिंजन इन सभी विचारों को एक ही धरातलीय मॉडल में समाहित करने का प्रयास है। यहाँ प्राकृतिक खेती से देसी कपास पैदा होती है; स्थानीय स्तर पर उसका मूल्य संवर्धन होता है; महिलाओं और युवाओं को कौशल व रोजगार मिलता है; परंपरागत कारीगरी पुनर्जीवित होती है; किसान को बाजार से बेहतर संबंध मिलता है; और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में धन एवं कौशल स्थानीय स्तर पर बने रहते हैं।
इस मॉडल में ग्राम स्वराज, स्वदेशी और विकेन्द्रीकृत अर्थव्यवस्था केवल विचार नहीं, बल्कि व्यवहार में उतरते दिखाई देते हैं।
रूपसी गर्ग ने प्रधानमंत्री को बताया नव-त्रिंजन का पूरा काम
खेती विरासत मिशन की निदेशक एवं नव-त्रिंजन ऑर्गेनिक हैंडलूम पहल की प्रमुख रूपसी गर्ग ने प्रधानमंत्री जी को नव-त्रिंजन की पूरी यात्रा और कार्यप्रणाली से परिचित कराया। उन्होंने बताया कि किस प्रकार गांव-गांव जाकर पुराने बुनकरों और कतिनों को खोजा गया, देशभर के खादी एवं हाथकरघा केंद्रों से सीख ली गई, नई पीढ़ी की महिलाओं एवं युवाओं को प्रशिक्षण दिया गया और प्राकृतिक खेती से देसी कपास को जोड़ते हुए एक पूर्ण Farm-to-Fabric value chain खड़ी की गई।
प्रधानमंत्री जी को यह भी बताया गया कि नव-त्रिंजन में महिलाएँ केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि कारीगर, उत्पादक, प्रशिक्षक, उद्यमी और पारंपरिक ज्ञान की संवाहक बन रही हैं।
प्राकृतिक रंगीन कपास ने आकर्षित किया ध्यान
नव-त्रिंजन समिति के अध्यक्ष एवं प्राकृतिक किसान श्री सुरिंदर पाल सिंह सियाग ने प्रधानमंत्री जी को प्राकृतिक रूप से रंगीन देसी कपास के बीज, उसकी रुई और उससे तैयार हाथकरघा वस्त्र दिखाए। उन्होंने प्रधानमंत्री जी को बताया कि भारत की पारंपरिक कपास विविधता में ऐसी किस्में भी मौजूद रही हैं जिनमें रंग प्राकृतिक रूप से आता है और जिनसे बिना कृत्रिम रंगाई के भी आकर्षक तथा पर्यावरण-अनुकूल वस्त्र तैयार किए जा सकते हैं।
रमनदीप कौर द्वारा अपने हाथों से बुना खेस भी प्रधानमंत्री को भेंट
इस अवसर पर राष्ट्रीय ध्वज के साथ प्राकृतिक खेती की देसी कपास से बने कुछ अन्य हाथकरघा उत्पाद भी प्रधानमंत्री जी को भेंट किए गए। गांव चैना की नव-त्रिंजन बुनकर रमनदीप कौर द्वारा अपने हाथों से बुना हुआ एक सुंदर खादी का खेस/शॉल भी प्रधानमंत्री जी को सप्रेम भेंट किया गया। प्रधानमंत्री जी ने उसे बड़े ध्यान और आत्मीयता से देखा।
यह भेंट उस ग्रामीण महिला की बदलती भूमिका का भी प्रतीक थी जो कभी सीमित आजीविका विकल्पों के बीच जीवन जी रही थी और आज अपने कौशल से देश के प्रधानमंत्री के लिए हस्तनिर्मित खादी तैयार कर रही है।
खेती विरासत मिशन की गतिविधियों से प्रधानमंत्री को अवगत कराया
इस अवसर पर खेती विरासत मिशन के कार्यकारी निदेशक उमेंद्र दत्त ने प्रधानमंत्री जी को मिशन के पिछले दो दशकों से अधिक समय से चल रहे विभिन्न कार्यों से अवगत कराया। उन्होंने पंजाब में प्राकृतिक खेती, देसी बीज संरक्षण, जैव-विविधता, पर्यावरणीय स्वास्थ्य, कीटनाशक-मुक्त खेती, कीट-साक्षरता, देसी कपास, मिलेट्स, ग्रामीण आजीविका और नव-त्रिंजन से जुड़े प्रयासों की जानकारी दी तथा मिशन का साहित्य एवं पंजाब में प्राकृतिक खेती और ग्रामीण पुनर्निर्माण से जुड़े कुछ सुझाव-पत्र भी प्रधानमंत्री जी को भेंट किए।
प्रतिनिधिमंडल में किसान, मास्टर किसान, महिला एवं युवा बुनकर
प्रतिनिधिमंडल में खेती विरासत मिशन के अध्यक्ष एवं प्राकृतिक किसान श्री मनबीर सिंह रेड्डू, नव-त्रिंजन समिति के अध्यक्ष श्री सुरिंदर पाल सिंह सियाग, वरिष्ठ एवं मास्टर प्राकृतिक किसान श्री विनोद ज्यानी, खेती विरासत मिशन के पूर्व अध्यक्ष एवं प्राकृतिक खेती के अग्रणी किसान श्री हरतेज सिंह मेहता, प्राकृतिक खेती प्रशिक्षण विशेषज्ञ डॉ. जगतार सिंह धालीवाल, प्राकृतिक किसान एवं ऑर्गेनिक कॉटन फील्ड कोऑर्डिनेटर श्री सुखदेव सिंह (गोरा सिंह), श्री पुलकित जैन, श्री गुरविंदर कुमार शर्मा तथा खेती विरासत मिशन के कार्यकारी निदेशक उमेंद्र दत्त शामिल थे।
बुनकरों एवं नव-त्रिंजन टीम में नव-त्रिंजन बुनकर पाठशाला की प्रधानाचार्या एवं मास्टर बुनकर शिंदर कौर, उप-प्रधानाचार्या गुरमीत कौर, अरुण कुमारी, रमनदीप कौर, रेखा रानी, सुनेहा देवी, रजनी कौर, मोना देवी, सोनू रानी, तथा 19 वर्षीय युवा बुनकर गुरसिमरन सिंह शामिल थे। नव-त्रिंजन की प्रमुख सुश्री रूपसी गर्ग ने पूरे प्रतिनिधिमंडल और इस पहल का समन्वय किया।
पंद्रह वर्षों की साधना को मिली राष्ट्रीय पहचान
खेती विरासत मिशन एवं नव-त्रिंजन परिवार ने इस अवसर को अपने लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि बताया है। पिछले लगभग पंद्रह वर्षों से जिस विचार पर लगातार कार्य किया जा रहा था—प्राकृतिक खेती से देसी कपास उगाना, उसे स्थानीय स्तर पर कातना और बुनना, गांव की महिलाओं को कौशल एवं सम्मानजनक आजीविका से जोड़ना, पारंपरिक ज्ञान को नई पीढ़ी तक पहुंचाना और एक विकेन्द्रीकृत स्वदेशी ग्रामीण अर्थव्यवस्था खड़ी करना—उस कार्य को राष्ट्रीय हाथकरघा दिवस के अवसर पर स्वयं प्रधानमंत्री के समक्ष प्रस्तुत करने का अवसर मिलना नव-त्रिंजन के लिए राष्ट्रीय स्तर की महत्वपूर्ण पहचान है।खेती विरासत मिशन ने कहा कि यह सम्मान किसी एक संगठन या व्यक्ति का नहीं, बल्कि उन सभी किसानों, महिला बुनकरों, युवा कारीगरों और ग्रामीण परिवारों का है जिन्होंने अपने श्रम और विश्वास से इस पूरी यात्रा को संभव बनाया।
प्रधानमंत्री की प्रेरणा से नव-त्रिंजन को मिला नया संबल
खेती विरासत मिशन के अनुसार प्रधानमंत्री जी की सराहना और उनके शब्दों ने नव-त्रिंजन परिवार को एक बड़ा नैतिक और प्रेरणात्मक संबल दिया है। इससे यह विश्वास और दृढ़ हुआ है कि प्राकृतिक खेती, स्वदेशी, खादी, हाथकरघा, ग्राम स्वराज, महिला सशक्तिकरण, जीवन-कौशल, ग्रामीण विकास और विकेन्द्रीकृत अर्थव्यवस्था अलग-अलग कार्यक्रम नहीं हैं, बल्कि भारत के समग्र एवं टिकाऊ विकास के परस्पर जुड़े हुए आधार हैं।
खेती विरासत मिशन ने विश्वास व्यक्त किया कि प्रधानमंत्री से मिला यह प्रोत्साहन पंजाब में प्राकृतिक खेती आधारित देसी कपास की खेती को बढ़ाने, नए किसानों को जोड़ने, हाथकताई एवं हाथकरघा को पुनर्जीवित करने, ग्रामीण महिलाओं व युवाओं को कौशल एवं रोजगार देने और स्थानीय स्तर पर मूल्य संवर्धन आधारित अर्थव्यवस्था विकसित करने के प्रयासों को नई गति देगा।
“बीज से तिरंगे तक” की यह यात्रा इस बात का प्रतीक है कि पंजाब की धरती में आज भी प्राकृतिक खेती, देसी कपास, खादी, ग्रामीण कारीगरी और स्वदेशी उद्यमिता के माध्यम से एक नई ग्रामीण अर्थव्यवस्था खड़ी करने की अपार संभावनाएँ मौजूद हैं। खेती विरासत मिशन और नव-त्रिंजन इस राष्ट्रीय मान्यता को उपलब्धि के साथ-साथ एक नई जिम्मेदारी के रूप में देखते हैं और प्राकृतिक खेती, खादी, स्वदेशी, ग्राम स्वराज तथा आत्मनिर्भर ग्रामीण भारत की दिशा में अपने प्रयासों को और अधिक व्यापक बनाने के लिए संकल्पबद्ध हैं।
















