अजयमेरु (अजमेर, राजस्थान)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रमों की निरंतर श्रृंखला में मंगलवार, 4 अगस्त 2026 को अजमेर स्थित जवाहरलाल नेहरू (JLN) मेडिकल कॉलेज के सभागार में युवा चिकित्सकों के साथ एक विशेष संवाद कार्यक्रम “राष्ट्र के पुनरुत्थान में युवाओं की भूमिका” का गरिमामय आयोजन किया गया.
कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ भारत माता के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलन कर किया गया. मुख्य वक्ता के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारिणी के वरिष्ठ सदस्य डॉ. मनमोहन वैद्य जी उपस्थित रहे, जबकि अध्यक्षता मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. अनिल सामरिया ने की. इस अवसर पर विभाग संघचालक मुकेश अग्रवाल और महानगर संघचालक खाजूलाल चौहान भी मंचस्थ रहे.
“विश्व में कोई ऐसा देश नहीं जिसके दो नाम हों”- डॉ. मनमोहन वैद्य
युवा चिकित्सकों और मेडिकल छात्रों को संबोधित करते हुए मुख्य वक्ता डॉ. मनमोहन वैद्य जी ने कहा कि विश्व के अन्य लोकतांत्रिक देशों जैसे जर्मनी, जापान, फ्रांस और अमेरिका में इस बात पर आम सहमति है कि उनके पूर्वज कौन थे और उनकी ऐतिहासिक पहचान क्या है. इसके विपरीत, भारत में अपनी सांस्कृतिक पहचान को लेकर अस्पष्टता बनी रही.
“दुनिया भर में ऐसा कोई देश नहीं है जिसके दो नाम हों। संविधान में लिखा है ‘India, that is Bharat’। भारत नाम हमारी प्राचीन सांस्कृतिक पहचान का परिचायक है। जैसे बर्मा ने गुलामी के नाम को छोड़कर पुनः ‘म्यांमार’ अपनाया, वैसे ही हमें भी अपने ‘स्व’ को पहचानना होगा। स्वतंत्रता आंदोलन के ‘स्वराज’, ‘स्वदेशी’ और ‘स्वतंत्रता’ का मूल आधार भारत का अध्यात्म ही है।” – डॉ. मनमोहन वैद्य, अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य, RSS
अजमेर संघ संवाद कार्यक्रम के मुख्य बिंदु
| विषय / पहलू | कार्यक्रम का मुख्य ब्योरा |
|---|---|
| आयोजन का अवसर | राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शताब्दी वर्ष श्रृंखला. |
| मुख्य वक्ता व अध्यक्ष | डॉ. मनमोहन वैद्य (RSS) एवं डॉ. अनिल सामरिया (प्रिंसिपल, JLN मेडिकल कॉलेज). |
| मुख्य विषय | “राष्ट्र के पुनरुत्थान में युवाओं की भूमिका” (युवा डॉक्टर संवाद). |
| संघ का आगामी लक्ष्य | शताब्दी वर्ष में ‘पंच परिवर्तन’ के माध्यम से समाज में कर्तव्यबोध और बदलाव. |
बंग-भंग, वंदे मातरम और रक्षाबंधन के ऐतिहासिक प्रसंग का स्मरण
डॉ. वैद्य ने अपने ओजस्वी वक्तव्य में वर्ष 1905 के बंगाल विभाजन (बंग-भंग) का उल्लेख करते हुए बताया कि कैसे अंग्रेजों की विभाजनकारी नीति के खिलाफ पूरा बंगाल एकजुट होकर खड़ा हुआ था. 16 अक्टूबर 1905 को सभी ने वंदे मातरम का उद्घोष करते हुए एक-दूसरे को रेशमी धागों की राखी बांधी थी.
उन्होंने कहा कि अंग्रेजों ने ‘वंदे मातरम’ के सार्वजनिक गायन पर रोक लगाई, लेकिन 1911 में उन्हें झुकना पड़ा और बंगाल विभाजन रद्द हुआ. वही ‘वंदे मातरम’ क्रांतिकारियों के लिए स्वाधीनता संग्राम का मुख्य मंत्र बना. उन्होंने बल दिया कि आज समाज में केवल अधिकारों की नहीं, बल्कि अपने नागरिक कर्तव्यों की बात होनी चाहिए.
प्रिंसिपल डॉ. अनिल सामरिया का संदेश:
- युवा शक्ति और दिशा: विश्व में सबसे अधिक युवा आबादी भारत के पास है। सही दिशा और संस्कार मिलने पर भारत को विश्वगुरु बनने से कोई नहीं रोक सकता।
- चरित्र और कर्तव्यबोध: राष्ट्र का पुनरुत्थान केवल तकनीकी या आर्थिक विकास से नहीं, बल्कि युवाओं के उज्ज्वल चरित्र और राष्ट्रभक्ति से होता है।
- रोजगार सृजनकर्ता बनें: आज के युवा चिकित्सकों और पेशेवरों को केवल नौकरी ढूंढने वाला नहीं, बल्कि रोजगार देने वाला और समस्या समाधानकर्ता बनना चाहिए।
कार्यक्रम के अंत में अजयमेरु महानगर संघचालक खाजूलाल चौहान ने सभी उपस्थित डॉक्टरों और चिकित्सा छात्रों का धन्यवाद व्यक्त किया. कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ. विजय पाल द्वारा किया गया.













