सोशल मीडिया और मीडिया ट्रायल पर भड़के जस्टिस बागची, बोले: 'लाइक्स की वेदी पर बलि चढ़ रहा निष्पक्ष न्याय'
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सोशल मीडिया और मीडिया ट्रायल पर भड़के जस्टिस बागची, बोले: ‘लाइक्स की वेदी पर बलि चढ़ रहा निष्पक्ष न्याय’

आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया की पहुंच, बड़ी टेक कंपनियों के एल्गोरिदम और तेजी से बढ़ते मीडिया ट्रायल ने देश की न्यायपालिका के सामने एक बहुत बड़ा संकट खड़ा कर दिया है।

Written byजय प्रकाश गुप्ताजय प्रकाश गुप्ता — edited by Mahak Singh
Aug 4, 2026, 01:10 pm IST
inभारत
न्यायाधीश न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची

न्यायाधीश न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची

आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया की पहुंच, बड़ी टेक कंपनियों के एल्गोरिदम और तेजी से बढ़ते मीडिया ट्रायल ने देश की न्यायपालिका के सामने एक बहुत बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। यह बात सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने कही है। उन्होंने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि सोशल मीडिया की वजह से आज न्याय ‘लाइक्स’ और ‘व्यूज’ के बाजार में तब्दील होता जा रहा है। 1 अगस्त को कैन (CAN) फाउंडेशन द्वारा आयोजित 5वें जस्टिस एचआर खन्ना मेमोरियल नेशनल सिम्पोजियम को संबोधित करते हुए उन्होंने ये बातें कही। उनका कहना है कि न्यायिक स्वतंत्रता के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती भ्रामक जानकारियां और एल्गोरिदम संचालित कंटेंट हैं।

‘लोकप्रियता के लालच में नीलाम हो रहा है निष्पक्ष न्याय’

न्यायमूर्ति बागची के अनुसार, डिजिटल स्पेस की ये चीजें किसी भी मामले में आधिकारिक और अंतिम फैसला आने से बहुत पहले ही जजों की मानसिक क्षमता और धैर्य की परीक्षा लेने लगती हैं तथा जनभावनाओं को अनुचित तरीके से प्रभावित करती हैं। कार्यक्रम के दौरान एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए न्यायमूर्ति बागची ने सोशल मीडिया पर न्यायाधीशों की व्यक्तिगत ट्रोलिंग की बात की। उन्होंने कहा, ‘आज निष्पक्ष और तटस्थ न्याय को लाइक्स की वेदी पर नीलाम किया जा रहा है। यदि कोई न्यायाधीश बिना किसी दबाव के अपनी स्वतंत्र कानूनी राय प्रस्तुत करता है जो बिना सोचे-समझे व्यवहार करने वाली ऑनलाइन भीड़ के एजेंडे से मेल नहीं खाती, तो सोशल मीडिया के इस खुले बाजार में उस जज को तुरंत खलनायक या राक्षस बनाकर पेश कर दिया जाता है।’

कोर्ट रूम की लाइव-स्ट्रीमिंग की चुनौतियों को किया उजागर

उन्होंने चेतावनी दी कि यह प्रवृत्ति अदालत की मर्यादा को समाप्त कर न्यायिक प्रक्रियाओं को एक सार्वजनिक तमाशे में बदल रही है। अदालती कार्यवाही के सीधे प्रसारण (लाइव-स्ट्रीमिंग) से जुड़ी चुनौतियों पर प्रकाश डालते हुए न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि पारदर्शिता बढ़ाने के उद्देश्य से शुरू की गई यह व्यवस्था अब कई अनचाही समस्याएं पैदा कर रही है। लाइव-स्ट्रीमिंग से वीडियो डाउनलोड कर 15 से 30 सेकंड के छोटे-छोटे क्लिप्स बिना किसी संदर्भ के सोशल मीडिया पर शेयर किए जाते हैं।

सुनवाई के दौरान मुकदमों की बारीकियों को समझने के लिए जजों द्वारा की गई शुरुआती या मौखिक टिप्पणियों को अंतिम निर्णय मानकर डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर ट्रोलिंग शुरू कर दी जाती है। लाइव-स्ट्रीमिंग के बहुत बड़े दर्शक वर्ग के कारण कोर्ट रूम एक बड़े थिएटर का रूप लेता जा रहा है। इससे जजों और अधिवक्ताओं दोनों में ही खुद को आकर्षक या आक्रामक तरीके से पेश करने की प्रवृत्ति विकसित हो रही है, जिससे सत्य और न्याय की मूल भावना पीछे छूट रही है।

जजों के लिए संन्यासी जीवन की वकालत

न्यायमूर्ति बागची ने इस सुझाव को पूरी तरह खारिज करते हुए कि न्यायाधीशों को भ्रामक खबरों का खंडन करने के लिए खुद सोशल मीडिया पर सक्रिय होना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारतीय न्यायिक संस्कृति के अनुसार, न्यायाधीशों को एक संन्यासी की तरह तटस्थ, शांत और एकांतप्रिय जीवन व्यतीत करना चाहिए। जज बागची ने संविधान का उल्लेख करते हुए ध्यान दिलाया कि अनुच्छेद 121 के तहत देश की संसद को भी किसी न्यायाधीश के आचरण पर चर्चा करने की अनुमति नहीं है। इसके विपरीत, डिजिटल दुनिया का पब्लिक स्क्वायर (सोशल मीडिया) हर रोज न्यायाधीशों की नीयत का ट्रायल करता है और संविधान के दायरे में रहकर फैसला सुनाने वाले जजों को भी रातों-रात ऑनलाइन दोषी करार दे देता है।

भय से ज्यादा खतरनाक है तारीफ और सहमति का लालच

न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि आधुनिक मीडिया जजों को सीधे तौर पर किसी सजा या धमकी से नहीं डराता बल्कि वह उन्हें पब्लिक अप्रूवल (जनता की तारीफ) का लालच देता है। किसी भी प्रकार की सीधी धमकी की तुलना में तारीफ पाने की यह इच्छा दीमक की तरह न्यायाधीशों की स्वतंत्रता को नष्ट कर देती है। सोशल मीडिया पर ट्रेंड करने वाले हैशटैग किसी मामले की औपचारिक सुनवाई से पहले ही जज के निष्पक्ष दृष्टिकोण पर दबाव बनाते हैं और एक वायरल वीडियो क्लिप पूरी कानूनी चर्चा को सनसनीखेज बना देती है।

बिग टेक एल्गोरिदम और अवमानना का दायरा

मीडिया की आजादी की सीमा तय करते हुए न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि स्वतंत्रता का अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि अदालत का फैसला आने से पहले ही किसी व्यक्ति को जन-अदालत में अपराधी साबित कर दिया जाए। समय से पहले मीडिया ट्रायल करना या अदालत के 30 सेकेंड के वीडियो को सनसनीखेज बनाकर फैलाना सीधे तौर पर न्यायिक प्रक्रिया में बाधा डालना है। इसे अदालत की अवमानना के दायरे में देखा जाना चाहिए।

उन्होंने यह गंभीर चेतावनी भी दी कि वर्तमान समय में न्यायिक स्वायत्तता के लिए सबसे बड़ा खतरा सरकार या उसकी संस्थाएं नहीं हैं बल्कि बिग टेक कंपनियों के मशीन लर्निंग एल्गोरिदम हैं। ये एल्गोरिदम विशुद्ध रूप से अपने वित्तीय लाभ और ट्रैफिक बढ़ाने के लिए जनता के गुस्से का इस्तेमाल करते हैं और जनता को न्यायपालिका के खिलाफ भड़काते हैं।

सुधार के लिए दिए ये सुझाव

लाइव-स्ट्रीमिंग के दुष्परिणामों को नियंत्रित करने के लिए न्यायमूर्ति बागची ने कुछ उपाए भी दिए। उन्होंने कहा कि लाइव-स्ट्रीमिंग को सभी मामलों के लिए अनिवार्य न बनाकर केवल न्यायाधीश के विवेक या संबंधित पक्षों के अनुरोध पर सीमित किया जाना चाहिए। उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों को कार्यवाहियों का एक सुरक्षित डिजिटल आर्काइव बनाना चाहिए। सुरक्षित रखी गई रिकॉर्डिंग्स को डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट के तहत सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए और सिर्फ आवश्यकता पड़ने पर सूचना के अधिकार (RTI) या ऊपरी अदालतों की समीक्षा के लिए उपलब्ध कराया जाना चाहिए।

Topics: Supreme CourtjusticeMedia TrialJustice Joymalya Bagchijudicial independenceSocial Media and JudiciaryLive StreamingBig Tech AlgorithmsArticle 121CAN Foundation SymposiumTrolling
जय प्रकाश गुप्ता
जय प्रकाश गुप्ता
लेखक करीब एक दशक से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। अभी स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर गहरी पकड़ है। [Read more]
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