रक्षा

DRDO ने विकसित किया भारत का पहला स्वदेशी 350 किलो थ्रस्ट एक्सपेंडेबल टर्बोजेट इंजन

DRDO के GTRE ने आजाद इंजीनियरिंग के साथ मिलकर भारत का पहला 350 kg थ्रस्ट क्लास एक्सपेंडेबल टर्बोजेट इंजन विकसित किया। क्रूज मिसाइल, जेट-पावर्ड ड्रोन और UAV के लिए गेम-चेंजर। आत्मनिर्भर रक्षा क्षेत्र की बड़ी उपलब्धि।

Published by
कुलदीप सिंह

भारत ने रक्षा क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) ने देश का पहला 350 किलोग्राम थ्रस्ट-क्लास एक्सपेंडेबल टर्बोजेट इंजन सफलतापूर्वक तैयार कर लिया है। इस इंजन को DRDO की बेंगलुरु स्थित गैस टर्बाइन रिसर्च इस्टैब्लिशमेंट (GTRE) ने डिजाइन किया है और हैदराबाद की निजी कंपनी आजाद इंजीनियरिंग ने इसे बनाया है।

इस उपलब्धि के साथ भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया है जो खुद ऐसे जेट इंजन बना सकते हैं।

इंजन किस काम आएगा?

यह इंजन मुख्य रूप से क्रूज मिसाइलों, जेट-पावर्ड सुसाइड ड्रोन (लोइटरिंग म्यूनिशन), टारगेट ड्रोन और अन्य मानव रहित विमानों (UAV) में इस्तेमाल होगा। यह एक बार इस्तेमाल होने वाला इंजन है। मिशन पूरा होने के बाद इसे नष्ट होने के लिए डिजाइन किया गया है।

टर्बोजेट इंजन क्या है?

जेट इंजन बनाना एयरोस्पेस इंजीनियरिंग का सबसे चुनौतीपूर्ण कामों में से एक है। यह लगातार हवा खींचता है, उसे संपीड़ित करता है, ईंधन जलाता है और इससे शक्ति पैदा करता है। इसमें उच्च स्तर की एयरोडायनामिक्स, गर्मी सहन करने वाले मटेरियल और बेहद सटीक मैन्युफैक्चरिंग की जरूरत पड़ती है।

सामान्य फाइटर जेट के इंजन हजारों घंटे चलने के लिए बनाए जाते हैं, लेकिन यह एक्सपेंडेबल इंजन सिर्फ एक मिशन के लिए होता है। इसलिए इसे सरल, भरोसेमंद, छोटा और कम लागत वाला रखा जाता है।

फायदे क्या हैं?

पहले भारत इस तरह के छोटे जेट इंजनों के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहता था। अब स्वदेशी तकनीक आने से मिसाइल और ड्रोन कार्यक्रमों में आपूर्ति संबंधी कोई रुकावट नहीं आएगी। इससे लागत भी कम होगी और बड़े पैमाने पर उत्पादन आसान हो जाएगा। यह प्रधानमंत्री के आत्मनिर्भर भारत अभियान को रक्षा क्षेत्र में मजबूती देगा। साथ ही, छोटे इंजन बनाने का यह अनुभव भविष्य में बड़े फाइटर जेट इंजन प्रोजेक्ट्स, जैसे कावेरी, के लिए हमारे वैज्ञानिकों का आत्मविश्वास बढ़ाएगा।

भविष्य में उपयोग

यह इंजन लंबी दूरी की क्रूज मिसाइलों को कम ऊंचाई पर तेज गति देने में मदद करेगा, जिससे लक्ष्य को सटीक तरीके से भेदा जा सकेगा। सामान्य प्रोपेलर ड्रोन की तुलना में जेट इंजन वाले ड्रोन 400 किलोमीटर प्रति घंटा या उससे ज्यादा रफ्तार पकड़ सकते हैं, जिन्हें दुश्मन के लिए रोकना मुश्किल होता है। इनका इस्तेमाल दुश्मन जैसे टारगेट ड्रोन बनाने में भी होगा, जो सेना के एयर डिफेंस सिस्टम की जांच के काम आएंगे। इसके अलावा जासूसी और खास अभियानों के लिए तेज मानवरहित विमानों में भी यह लगाया जा सकेगा।

कुल 6 देशों के पास ही है ये तकनीक

अभी तक यह क्षमता अमेरिका, रूस, फ्रांस, ब्रिटेन और चीन जैसे कुछ ही देशों के पास थी। अब भारत भी इस सूची में शामिल हो गया है। DRDO और आजाद इंजीनियरिंग की यह साझेदारी देश के एयरोस्पेस इकोसिस्टम को और मजबूत बनाती है।

 

Share