
डोनाल्ड ट्रंप, अमेरिका के राष्ट्रपति
इतिहास बार-बार सिद्ध करता है कि किसी भी युद्ध का परिणाम केवल सैन्य शक्ति से तय नहीं होता। निर्णायक भूमिका निभाती है राजनीतिक इच्छाशक्ति, रणनीतिक स्पष्टता और यह विश्वास दिलाने की क्षमता कि घोषित राष्ट्रीय लक्ष्य किसी भी परिस्थिति में नहीं बदलेंगे। जब कोई महाशक्ति एक दिन कठोर संदेश देती है और दूसरे दिन समझौते या नरमी का संकेत देती है, तो उसका विरोधी इसे सद्भावना नहीं, बल्कि कमजोरी के रूप में पढ़ता है। यही वह क्षण होता है जब संघर्ष समाप्त होने के बजाय और अधिक जटिल तथा लंबा हो जाता है।
यदि हाल के मीडिया प्रतिवेदनों में दम है कि चीन ईरान को बड़ी संख्या में वायु-रक्षा प्रणालियाँ उपलब्ध कराने की तैयारी कर रहा है, तो यह अत्यंत गंभीर संकेत है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक टेलीविजन साक्षात्कार में कहा कि यदि ऐसा हुआ तो उन्हें आश्चर्य होगा, क्योंकि राष्ट्रपति शी जिनपिंग और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने उन्हें आश्वासन दिया था कि वे ईरान को सैन्य सहायता नहीं देंगे। यह टिप्पणी अपने भीतर कई अनकहे प्रश्न छोड़ जाती है। यदि कूटनीतिक आश्वासनों के बावजूद घटनाक्रम विपरीत दिशा में बढ़ रहा है, तो स्पष्ट है कि केवल आश्वासनों के भरोसे राष्ट्रीय सुरक्षा नहीं चलाई जा सकती।
इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान को मध्यस्थ की भूमिका देना भी गंभीर रणनीतिक भूल प्रतीत होती है। जिस देश की विदेश और सुरक्षा नीति पर चीन का गहरा प्रभाव माना जाता हो, उससे निष्पक्ष मध्यस्थता की अपेक्षा करना यथार्थवादी नहीं कहा जा सकता। पाकिस्तान का इतिहास भी अवसरवाद से भरा रहा है। सोवियत-अफगान युद्ध के दौरान उसने अमेरिका का साथ दिया, लेकिन परिस्थितियाँ बदलते ही तालिबान का समर्थन करने लगा। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में उसकी निष्ठा सिद्धांतों से अधिक तत्कालीन रणनीतिक लाभों से संचालित होती रही है।
आज चीन स्वयं को अमेरिकी वैश्विक नेतृत्व का प्रमुख प्रतिद्वंद्वी मानता है। ऐसे में यदि कोई भी क्षेत्रीय संकट अमेरिका को लंबे समय तक उलझाए रखता है, तो उसका रणनीतिक लाभ अंततः बीजिंग को ही मिलता है। इसलिए पश्चिम एशिया की घटनाओं को केवल ईरान के दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि चीन की व्यापक भू-राजनीतिक रणनीति के संदर्भ में भी देखने की आवश्यकता है।
इतिहास का सबसे बड़ा सबक यही है कि कूटनीति तभी सफल होती है, जब उसके पीछे अटल राजनीतिक इच्छाशक्ति और विश्वसनीय प्रतिरोधक क्षमता खड़ी हो। जैसे ही विरोधी यह मान ले कि आपकी उदारता वास्तव में आपकी कमजोरी है, संघर्ष समाप्त नहीं होता—बल्कि और अधिक खतरनाक रूप ले लेता है। किसी भी महाशक्ति के लिए सबसे बड़ा जोखिम सैन्य कमजोरी नहीं, बल्कि रणनीतिक असंगति होती है।