
लोकतंत्र सेनानी कमला शंकर पांडेय
देश में संविधान सर्वोपरि है। भारत ने वह दौर भी देखा जब सत्ता के लिए इसे भी बंधक बना लिया गया। जो कांग्रेस आज संविधान की दुहाई देती है, उसी कांग्रेस की सरकार में देश में आपातकाल थोपा गया था। जनता को जेल में ठूंस दिया गया। हर जगह डर का माहौल था।
भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष कमला शंकर पांडेय कहते हैं कि आपातकाल लगने से पहले हम लोग जेपी आंदोलन में अपने जिले को लीड कर रहे थे। मैं विद्यार्थी परिषद का कार्यकर्ता था। पूर्वांचल के साकेत महाविद्यालय में परिषद के संगठन का काम देखता था। इंदिरा गांधी की तानाशाही के खिलाफ हम लोग विरोध-प्रदर्शन करते थे। इमरजेंसी में पहले मुकदमे में करीब 15 लोगों के नाम थे। उनमें मैं भी एक था।
आंदोलन को बढ़ाने के लिए हम लोग भूमिगत हो गए। विचार परिवार के द्वारा जो भी पत्रक आता था, उसे आगे बढ़ाते थे। इमरजेंसी के दौरान पर्चा बांटते थे। आगे चलकर गिरफ्तारी हो गई। जेल जाने से पहले लॉकअप में रखा गया। जब तक चालान नहीं हुआ, और सीजेएम के सामने नहीं पेश किया गया तब तक बहुत उत्पीड़न हुआ। न तो जलपान देते थे, न भोजन। मुझे सीजेएम के पास रात आठ से नौ बजे के बीच पेश किया गया। अदालत को वस्तुस्थिति के बारे में बताया तो उन्होंने पुलिस-प्रशासन को डांटा। प्रशासन रटे-रटाए शब्द बोल रहा था, वह भी झूठ। मैं करीब सात महीने जेल में रहा।
उस समय एबीवीपी का जिला संगठन मंत्री और प्रदेश कार्यसमिति का सदस्य था। उम्र 21 से 22 साल रही होगी। गिरफ्तारी का कारण था सत्ता का विरोध, लोकतंत्र को बचाने के लिए आवाज उठाना। इसके लिए हम इंदिरा गांधी के खिलाफ पर्चा बांट रहे थे। पुलिस-प्रशासन के लोगों ने बहुत मारा-पीटा। संगठन से जुड़े लोगों के नाम उगलवा रहे थे। उस समय जिला प्रचारक शायद जय प्रकाश जी थे, उनके बारे में पूछ रहे थे। जनसंघ के संगठन मंत्री वर्मा जी के बारे में सवाल कर रहे थे। उत्तर नहीं मिलने पर चिढ़ जाते थे। उस समय अंबेडकर नगर जिला और फैजाबाद एक था। राम प्रकाश यादव को बुरी तरह मारा। चटर्जी को तो थाने में ऊपर से लेकर नीचे तक लाठियों से मारा। नीचे गिरा दिया और फिर लाठियों की बौछार।
एक घटना और याद आ रही है। मैंने एक लेख पढ़ा था कि एक दर्जी था, उसका एक बेटा था, दोनों लोग दुकान पर काम कर रहे थे। आपातकाल के समय शाम को दुकान जल्द बंद करने का आदेश था। इस पर उन्होंने शटर गिराकर सिलाई का काम जारी रखा। लड़का कटिंग करने लगा तो पिता ने रोका। लड़का नहीं माना, दर्जी ने कहा कि कपड़ा खराब कर दोगे। कपड़े की जेब तुम ठीक करो और मैं गला काटूंगा। पुलिस गश्त कर रही थी। शोर बाहर आने पर पुलिसकर्मी दरवाजे पर कान लगाकर सुनने लगा। पुलिस ने दुकान को जबरन खुलवाया और दर्जी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। 36/43 डीआरआई में चालान कर मुकदमा किया गया। वह भी मेरे साथ फैजाबाद जेल में था। उन दिनों यह अफवाह उड़ाई गई कि जो जेल के अंदर है, वह जीवित नहीं बचेगा। शायद डराने के लिए ऐसा किया गया होगा। उस समय डर का ही माहौल था। इंदिरा इज इंडिया और इंडिया इज इंदिरा वाली बात थी।
आज जो लोग संविधान की दुहाई देते हैं और कहते हैं कि बोलने की स्वतंत्रता नहीं है, ऐसे लोगों की बात पर कौन यकीन करेगा। आज कोई दिक्कत नहीं है। प्रदेश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और यूपी के मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ को भी गाली दे रहे हैं। उस समय किसी की भी हैसियत नहीं थी कि वह सत्ता-शासन के खिलाफ कुछ भी बोल दे। भय और आतंक का माहौल था। जब शीर्ष नेता गिरफ्तार हो गए तो हताशा आई, लेकिन हम लोगों ने ठाना कि संघर्ष करेंगे। किसी भी दशा में लोकतंत्र रहना चाहिए, यह देश रहना चाहिए।