Explainer: भारत की पहली स्वदेशी हाइड्रोजन ट्रेन ‘नमो ग्रीन रेल’: तकनीक, स्वच्छ ऊर्जा और ऐतिहासिक परिवर्तन
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Explainer: भारत की पहली स्वदेशी हाइड्रोजन ट्रेन ‘नमो ग्रीन रेल’: तकनीक, स्वच्छ ऊर्जा और ऐतिहासिक परिवर्तन

PM मोदी 17 जुलाई को लॉन्च करेंगे देश की पहली स्वदेशी हाइड्रोजन ट्रेन। बिना डीजल-बिजली के चलने वाली यह ट्रेन केवल पानी छोड़ती है। हरित परिवहन की दिशा में ऐतिहासिक कदम।

Written byयोगेश कुमार गोयलयोगेश कुमार गोयल — edited by कुलदीप सिंह
Jul 13, 2026, 01:17 pm IST
in भारत, विश्लेषण
प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

भारतीय रेलवे के इतिहास में 17 जुलाई की तिथि एक स्वर्णिम और युगांतरकारी मील का पत्थर बनने जा रही है। इस दिन प्रधानमंत्री मोदी हरियाणा के जींद से भारत की पहली स्वदेशी हाइड्रोजन-पावर्ड ट्रेन ‘नमो ग्रीन रेल’ को हरी झंडी दिखाकर रवाना करेंगे। यह केवल एक नई ट्रेन का शुभारंभ नहीं बल्कि स्वच्छ ऊर्जा, अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी और आत्मनिर्भर भारत की दिशा में ऐतिहासिक परिवर्तन का उद्घोष है। जींद-सोनीपत रेलखंड पर दौड़ने वाली यह अत्याधुनिक ट्रेन बिना डीजल और बिना ओवरहेड विद्युत तारों के संचालित होगी। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि संचालन के दौरान यह कार्बन डाइऑक्साइड या जहरीले धुएं का उत्सर्जन नहीं करेगी बल्कि उप-उत्पाद के रूप में केवल जलवाष्प और पानी की बूंदें छोड़ेगी। हरित परिवहन मिशन, मेक इन इंडिया और भारत के स्वच्छ ऊर्जा विजन का सशक्त प्रतीक बनी यह परियोजना देश को वैश्विक हरित परिवहन क्रांति के अग्रणी राष्ट्रों की श्रेणी में स्थापित करने की दिशा में एक निर्णायक कदम सिद्ध होगी।

तकनीकी उत्कृष्टता और आधुनिकता का अद्भुत संगम

जींद-सोनीपत के बीच 89 किलोमीटर का यह सफर केवल एक नई रेल सेवा नहीं बल्कि भारतीय रेलवे के तकनीकी परिवर्तन और हरित भविष्य की दिशा में निर्णायक कदम है। हरियाणा के इस रेलखंड को देश की पहली स्वदेशी हाइड्रोजन ट्रेन के लिए पायलट कॉरिडोर के रूप में चुना गया है, जहां यह ट्रेन लगभग दो घंटे में अपनी यात्रा पूरी करेगी। मार्ग में 12 स्टेशनों पर रुकने वाली यह सेवा स्थानीय यात्रियों को विश्वस्तरीय, पर्यावरण-अनुकूल रेल परिवहन का नया अनुभव प्रदान करेगी। यह अत्याधुनिक ट्रेन 10 कोचों से सुसज्जित है, जिनमें 682 यात्रियों के बैठने की व्यवस्था है जबकि कुल यात्री क्षमता लगभग 2,600 है।

ब्रॉड गेज प्लेटफॉर्म पर निर्मित 10 कोचों वाली यह दुनिया की सबसे लंबी हाइड्रोजन-पावर्ड ट्रेन मानी जा रही है। इसकी डिजाइन गति 120 किमी/घंटा (कुछ परीक्षणों में 140 किमी/घंटा तक) रही है जबकि प्रारंभिक चरण में सुरक्षित एवं स्थिर संचालन सुनिश्चित करने के लिए रेलवे बोर्ड ने इसकी परिचालन गति 75 किमी/घंटा निर्धारित की है। ट्रेन में 2,400 किलोवाट की कुल शक्ति क्षमता है, जिसमें 1,200 किलोवाट का अत्याधुनिक हाइड्रोजन फ्यूल-सेल प्रोपल्शन सिस्टम लगाया गया है, जो स्वच्छ ऊर्जा से ट्रेन को संचालित करेगा। अभी इसका संचालन विशेष उद्घाटन सेवा के रूप में हो रहा है जबकि नियमित व्यावसायिक सेवा शुरू करने का निर्णय रेलवे बोर्ड परीक्षणों और परिचालन आंकड़ों के विस्तृत विश्लेषण के बाद करेगा।

कैसे काम करती है हाइड्रोजन फ्यूल सेल तकनीक?

हाइड्रोजन ट्रेन, जिसे ‘हाइड्रेल’ या ‘एच-ट्रेन’ भी कहा जाता है, रेल परिवहन की दुनिया में अगली पीढ़ी की हरित तकनीक मानी जा रही है। अब तक रेलगाड़ियों की पहचान डीजल इंजन के शोर, काले धुएं या ओवरहेड बिजली तारों से होती रही है लेकिन हाइड्रोजन ट्रेन इन दोनों पर निर्भर नहीं होती। यही इसकी सबसे बड़ी तकनीकी उपलब्धि है। यह बिना डीजल जलाए और बिना बिजली के तारों से ऊर्जा लिए केवल हाइड्रोजन और ऑक्सीजन की रासायनिक ऊर्जा से संचालित होती है। यही कारण है कि इसे ‘शून्य-उत्सर्जन परिवहन’ का भविष्य कहा जा रहा है। इस ट्रेन की शक्ति का स्रोत इसका अत्याधुनिक हाइड्रोजन फ्यूल-सेल प्रोपल्शन सिस्टम है। ट्रेन में विशेष रूप से डिजाइन किए गए उच्च-दाब (या क्रायोजेनिक) हाइड्रोजन टैंकों में ईंधन सुरक्षित रखा जाता है। आवश्यकता पड़ने पर यह हाइड्रोजन फ्यूल-सेल में भेजी जाती है, जहां इसका संपर्क वातावरण से प्राप्त ऑक्सीजन से कराया जाता है।

इसके बाद एक नियंत्रित इलैक्ट्रोकेमिकल प्रतिक्रिया होती है, जिसे सामान्य भाषा में पानी के इलैक्ट्रोलिसिस की उल्टी प्रक्रिया कहा जा सकता है। इस रासायनिक अभिक्रिया से बड़ी मात्रा में विद्युत ऊर्जा उत्पन्न होती है जबकि उप-उत्पाद के रूप में केवल पानी और जलवाष्प निकलते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में न धुआं पैदा होता है और न ही कार्बन डाइऑक्साइड जैसी ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है। फ्यूल-सेल से उत्पन्न बिजली सीधे ट्रेन की लिथियम-आयन बैटरियों में संग्रहीत की जाती है। यही बैटरियां तेज गति पकड़ने, चढ़ाई वाले मार्गों और अतिरिक्त ऊर्जा की आवश्यकता के समय महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसके बाद संग्रहित विद्युत ऊर्जा अत्याधुनिक ट्रैक्शन मोटरों तक पहुंचती है, जो पहियों को घुमाकर ट्रेन को गति देती हैं। परिणामस्वरूप, पूरी ट्रेन अत्यंत शांत, ऊर्जा-कुशल और पर्यावरण-अनुकूल तरीके से संचालित होती है। यही अत्याधुनिक तकनीक हाइड्रोजन ट्रेन को भविष्य के स्वच्छ, टिकाऊ और कार्बन-मुक्त रेल परिवहन का सबसे मजबूत विकल्प बनाती है।

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स्वदेशी तकनीक, आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर और वैश्विक सहयोग का संगम

भारत की पहली स्वदेशी हाइड्रोजन ट्रेन केवल एक नई रेल सेवा नहीं बल्कि आत्मनिर्भर भारत, मेक इन इंडिया और स्वदेशी तकनीकी क्षमता का सशक्त प्रमाण है। इस अत्याधुनिक ट्रेन का डिजाइन रेल मंत्रालय के अनुसंधान एवं विकास संस्थान अनुसंधान डिजाइन एवं मानक संगठन (आरडीएसओ) ने तैयार किया है जबकि इसका निर्माण चेन्नई स्थित ‘इंटीग्रल कोच फैक्ट्री’ (आईसीएफ) में किया गया है। यह उपलब्धि दर्शाती है कि भारत अब केवल आधुनिक रेल तकनीक का उपभोक्ता नहीं बल्कि उसका निर्माता और नवाचारकर्ता भी बन चुका है। हाइड्रोजन ट्रेन के सफल संचालन के लिए केवल ट्रेन विकसित करना पर्याप्त नहीं था बल्कि उसके अनुरूप सुरक्षित और विश्वस्तरीय हाइड्रोजन रीफ्यूलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना भी उतना ही आवश्यक था। इसी उद्देश्य से हरियाणा के जींद में अत्याधुनिक स्वदेशी हाइड्रोजन स्टोरेज एवं रीफ्यूलिंग सुविधा केंद्र स्थापित किया गया है।

इस केंद्र को भारत सरकार के पैट्रोलियम एंड एक्सप्लोसिव्स सेफ्टी ऑर्गनाइजेशन (पीईएसओ) से कंप्रेस्ड हाइड्रोजन गैस के सुरक्षित भंडारण और वितरण के लिए सभी आवश्यक स्वीकृतियां एवं लाइसेंस प्राप्त हो चुके हैं। यहां उच्च-दाब हाइड्रोजन कम्प्रेशन प्रणाली, आधुनिक सुरक्षा उपकरण, आवश्यक स्पेयर पार्ट्स तथा चौबीसों घंटे उपलब्ध स्टैंडबाय कम्प्रेसर यूनिट जैसी व्यवस्थाएं सुरक्षित और निर्बाध संचालन सुनिश्चित करती हैं। इस महत्वाकांक्षी परियोजना में वैश्विक तकनीकी सहयोग का भी समावेश किया गया है। ग्रीनएच इलैक्ट्रोलिसिस के अनुसार, हाइड्रोजन की निरंतर आपूर्ति के लिए 1 मेगावाट क्षमता वाले पॉलिमर इलेक्ट्रोलाइट मेम्ब्रेन इलेक्ट्रोलाइजर का उपयोग किया जा रहा है, जिसके विकास में जापानी तकनीकी सहयोग भी शामिल है। यह संयंत्र प्रतिदिन लगभग 430 किलोग्राम ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन करने में सक्षम है, जो भारत की हरित ऊर्जा यात्रा और भविष्य की स्वच्छ रेल व्यवस्था को नई गति प्रदान करेगा।

हरित रेल क्रांति में भारत की वैश्विक छलांग

हाइड्रोजन आधारित रेल परिवहन को आज विश्वभर में सस्टेनेबल मोबिलिटी का भविष्य माना जा रहा है। बढ़ते कार्बन उत्सर्जन, ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के बीच अनेक विकसित देश स्वच्छ ईंधन आधारित रेल प्रणालियों की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। भारत की पहली स्वदेशी हाइड्रोजन ट्रेन के शुभारंभ के साथ देश भी इस वैश्विक हरित क्रांति का महत्वपूर्ण भागीदार बन जाएगा। यह उपलब्धि केवल तकनीकी प्रगति नहीं बल्कि भारत की नवाचार क्षमता, इंजीनियरिंग दक्षता और हरित ऊर्जा के प्रति उसकी प्रतिबद्धता का भी सशक्त प्रमाण है। इस क्षेत्र में जर्मनी ने वर्ष 2018 में दुनिया की पहली व्यावसायिक हाइड्रोजन ट्रेन ‘कोराडिया आईलिंट’ का सफल संचालन शुरू कर इतिहास रचा। चीन ने 2023 में 160 किलोमीटर प्रति घंटे की गति वाली शहरी हाइड्रोजन ट्रेनों के साथ एशिया में नई मिसाल कायम की।

अमेरिका ने कैलिफोर्निया की ‘एरो’ लाइन पर अपनी पहली व्यावसायिक हाइड्रोजन रेल सेवा प्रारंभ की जबकि जापान ने अत्याधुनिक ‘ह्याबारी’ हाइब्रिड ट्रेन विकसित कर फ्यूल-सेल और बैटरी तकनीक का सफल समन्वय प्रस्तुत किया। कनाडा भी यात्री हाइड्रोजन ट्रेन के सफल परीक्षणों के साथ इस तकनीक को अपनाने वाले अग्रणी देशों में शामिल है। अब भारत ने पूरी तरह स्वदेशी ‘नमो ग्रीन रेल’ विकसित कर इस वैश्विक समूह में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई है। ब्रॉड गेज प्लेटफॉर्म पर निर्मित यह दुनिया की सबसे लंबी और सर्वाधिक शक्तिशाली हाइड्रोजन ट्रेनों में से एक है। इसके साथ भारत न केवल वैश्विक हरित रेल तकनीक के अग्रणी देशों की श्रेणी में शामिल हुआ है बल्कि स्वच्छ, आत्मनिर्भर और भविष्य उन्मुख परिवहन व्यवस्था की दिशा में भी एक ऐतिहासिक छलांग लगा चुका है।

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है हाइड्रोजन ट्रेन?

दुनिया के सबसे विशाल रेल नेटवर्कों में शामिल भारतीय रेलवे प्रतिदिन लाखों यात्रियों और विशाल माल परिवहन का दायित्व निभाता है। लंबे समय तक डीजल इंजनों पर निर्भर रहने के कारण न केवल ईंधन आयात पर भारी व्यय होता है बल्कि कार्बन उत्सर्जन और वायु प्रदूषण भी बढ़ता है। ऐसे समय में हाइड्रोजन ट्रेन का आगमन भारतीय रेल व्यवस्था के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है। यह केवल नई तकनीक नहीं बल्कि स्वच्छ ऊर्जा, ऊर्जा आत्मनिर्भरता और सतत विकास की दिशा में भारत की दीर्घकालिक रणनीति का महत्वपूर्ण आधार है। पारंपरिक डीजल इंजन कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और सूक्ष्म प्रदूषक कण (पीएम2.5) जैसे हानिकारक तत्व वातावरण में छोड़ते हैं, जो जलवायु परिवर्तन और स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्याओं का कारण बनते हैं। इसके विपरीत, हाइड्रोजन फ्यूल-सेल तकनीक में किसी प्रकार का दहन नहीं होता। हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के बीच होने वाली इलैक्ट्रोकेमिकल प्रक्रिया से बिजली उत्पन्न होती है तथा उप-उत्पाद के रूप में केवल पानी और जलवाष्प निकलते हैं। यही कारण है कि इसे ‘जीरो टेलपाइप एमिशन’ तकनीक और भविष्य की सबसे स्वच्छ रेल प्रणाली माना जाता है।

भारतीय रेलवे ने वर्ष 2030 तक स्वयं को नेट-जीरो कार्बन एमिशन संगठन बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया है जबकि भारत ने वर्ष 2070 तक राष्ट्रीय स्तर पर नेट-जीरो उत्सर्जन हासिल करने का संकल्प लिया है। हाइड्रोजन ट्रेन इन दोनों लक्ष्यों के बीच एक मजबूत सेतु का कार्य करेगी। यदि भविष्य में गैर-विद्युतीकृत रेलमार्गों पर डीजल इंजनों का स्थान हाइड्रोजन ट्रेनें लेने लगें तो रेलवे का कार्बन फुटप्रिंट उल्लेखनीय रूप से कम किया जा सकेगा और स्वच्छ ऊर्जा आधारित परिवहन को व्यापक गति मिलेगी। यद्यपि भारतीय रेलवे तेजी से विद्युतीकरण की दिशा में आगे बढ़ रहा है, फिर भी देश में अनेक ग्रामीण, दुर्गम और विरासत (हेरिटेज) रेलमार्ग ऐसे हैं, जहां ओवरहेड विद्युत लाइनें बिछाना तकनीकी, आर्थिक अथवा पर्यावरणीय दृष्टि से उपयुक्त नहीं है। कालका-शिमला, दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे और नीलगिरि माउंटेन रेलवे जैसे ऐतिहासिक मार्ग इसका प्रमुख उदाहरण हैं। वर्तमान में इन मार्गों पर डीजल इंजन ही विकल्प हैं जबकि हाइड्रोजन ट्रेनें बिना ओवरहेड तारों के स्वच्छ, शांत और पर्यावरण-अनुकूल संचालन संभव बनाती हैं। इस दृष्टि से यह तकनीक भारत के गैर-विद्युतीकृत और हेरिटेज रेल नेटवर्क के लिए भविष्य का सबसे उपयुक्त एवं टिकाऊ समाधान सिद्ध हो सकती है। हाइड्रोजन ट्रेन केवल रेल परिवहन में तकनीकी बदलाव नहीं बल्कि भारत की हरित विकास यात्रा को नई दिशा देने वाली ऐतिहासिक पहल है।

भारतीय रेलवे का ग्रीन ब्लूप्रिंट

जींद-सोनीपत रेलखंड पर शुरू हो रही देश की पहली स्वदेशी हाइड्रोजन ट्रेन केवल एक पायलट परियोजना है। भारतीय रेलवे का लक्ष्य इस तकनीक को देशभर में चरणबद्ध रूप से विस्तार देकर स्वच्छ और टिकाऊ रेल परिवहन की नई पहचान बनाना है। इसी उद्देश्य से रेल मंत्रालय ने ‘हाइड्रोजन फॉर हेरिटेज’ योजना तैयार की है, जिसके अंतर्गत देश के प्रमुख हेरिटेज, पहाड़ी और दर्शनीय रेलमार्गों पर लगभग 35 हाइड्रोजन ट्रेनों का संचालन प्रस्तावित है। रेलवे के अनुमान के अनुसार, एक हाइड्रोजन ट्रेन के निर्माण पर लगभग 80 करोड़ रुपये जबकि प्रति मार्ग हाइड्रोजन उत्पादन संयंत्र, रीफ्यूलिंग स्टेशन और सुरक्षा अवसंरचना विकसित करने पर लगभग 70 करोड़ रुपये का निवेश होगा। यद्यपि प्रारंभिक लागत अधिक है लेकिन दीर्घकाल में यह निवेश डीजल आयात पर निर्भरता घटाने, ईंधन व्यय कम करने, कार्बन उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी लाने और भारत को हरित, आत्मनिर्भर तथा भविष्य उन्मुख रेल व्यवस्था की दिशा में मजबूत आधार प्रदान करेगा।

नई तकनीक, नया विश्वास, नई दिशा

भारत की पहली स्वदेशी हाइड्रोजन ट्रेन केवल एक नई रेल सेवा नहीं बल्कि आत्मनिर्भर भारत, मेक इन इंडिया और विकसित भारत 2047 के संकल्प का सशक्त प्रतीक है। यह परियोजना साबित करती है कि भारत अब अत्याधुनिक तकनीकों का केवल उपभोक्ता नहीं बल्कि उनका नवोन्मेषी निर्माता और वैश्विक मानक तय करने वाला राष्ट्र बन चुका है। वैज्ञानिकों और भारतीय इंजीनियरों द्वारा विकसित हाइड्रोजन फ्यूल-सेल तकनीक देश की बढ़ती तकनीकी क्षमता, नवाचार और आत्मविश्वास की जीवंत मिसाल है। पर्यावरण संरक्षण, ऊर्जा आत्मनिर्भरता और आधुनिक परिवहन का यह अद्भुत संगम भारतीय रेलवे को स्वच्छ, सुरक्षित और भविष्य उन्मुख बनाने की दिशा में ऐतिहासिक कदम सिद्ध होगा। आने वाले वर्षों में यही हरित तकनीक भारत की विकास यात्रा को नई गति देगी और दुनिया के सामने यह संदेश देगी कि आर्थिक प्रगति तथा पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ चल सकते हैं।

(लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ पुस्तक के लेखक हैं)

Topics: PM मोदीनमो ग्रीन रेलभारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेनहाइड्रोजन पावर्ड ट्रेनस्वदेशी हाइड्रोजन ट्रेन
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