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विकास के साथ विरासत का भी संरक्षण कर रही मोदी सरकार, जानिए कैसे ?

ऑस्ट्रेलिया ने भारत को सौंपी प्राचीन कलाकृतियां - भद्रकाली त्रिशूल, नंदी और कार्तिकेय मूर्ति। मोदी सरकार विकास के साथ विरासत संरक्षण को भी दे रही है प्राथमिकता।

Written byअभय कुमारअभय कुमार — edited by कुलदीप सिंह
Jul 12, 2026, 11:35 am IST
inविश्लेषण

मोदी सरकार विकास के साथ विरासत को अपना मुख्य ध्येय बनाकर चल रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ऑस्ट्रेलिया दौरे से सिर्फ़ परमाणु ऊर्जा और रक्षा सौदे ही नहीं हुआ है, बल्कि सांस्कृतिक कूटनीति को भी अंजाम दिया गया है। भारत का अतीत काफी समृद्ध और गौरवशाली रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी ऑस्ट्रेलिया यात्रा के दौरान कई भारतीय धरोहरों को वापस लाने में सफल हुए हैं जो भारत से किसी भी कारण से ग़ुम हो गया था।

इन धरोहरों में देवी भद्रकाली का कांस्य त्रिशूल, नंदी की ग्रेनाइट मूर्ति और छह मुख वाले भगवान कार्तिकेय की प्रतिमा शामिल है। ये तीनों लगभग 1000 साल पुराने कलाकृतियां हैं, जो हमारी सभ्यता, संस्कृति और धर्म की आधार और पहचान थीं, जिन्हें कभी हमसे अलग कर दिया गया था। इन धरोहरों को कभी चोरी करके तो कभी गुम करके देश से बाहर कर दिया गया था और आज इतने दशकों बाद ये धरोहर वापस आ रहे हैं।

ऑस्ट्रेलिया वापस करेगा कलाकृतियां

ऑस्ट्रेलिया अपनी नेशनल गैलरी से कई कलाकृतियों को अपनी मर्ज़ी से भारत को वापस लौटाने वाला है। ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने तीन प्राचीन भारतीय कलाकृतियों तमिलनाडु से संबंधित देवी भद्राकाली का त्रिशूल, नंदी की मूर्ति और भगवान कार्तिकेय की मूर्ति) को भारत को वापस लौटाने की घोषणा की है। अल्बनीज ने इस वापसी को ऑस्ट्रेलिया की ‘एथिकल कलेक्शन प्रैक्टिस’ (नैतिक संग्रह प्रथाओं) के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का एक अहम हिस्सा बताया है। भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रिश्तों को मजबूत करने की दिशा में कलाकृतियों की वापसी एक महत्वपूर्ण और निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है।

मां भद्रकाली का कांस्य त्रिशूल

देवी भद्रकाली का कांस्य त्रिशूल एक पारंपरिक धार्मिक कलाकृति है। शैव-शक्ति परंपराओं में, यह उग्र देवी भद्रकाली की दैवीय शक्ति, सुरक्षा और बुराई के विनाश का प्रतीक है। शैव शक्ति परंपराओं में यह सुरक्षा बुराई के विनाश और दैय शक्ति का प्रतीक है। इसे धार्मिक पूजा के लिए दक्षिण भारतीय मंदिरों की पारंपरिक धातु कला शैली में बनाया गया है। तमिलनाडु के कोल्लमंगुडी स्थित श्री काशी विश्वनाथ स्वामी मंदिर का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व बहुत गहरा है। यह मंदिर 13वीं से 16वीं शताब्दी के बीच यानी चोल काल के अंतिम दौर से लेकर विजयनगर नायक काल के दौरान बनाया गया था।

नंदी की ग्रेनाइट की मूर्ति

नंदी की पत्थर की मूर्ति में भगवान शिव के पवित्र बैल और वाहन नंदी को दिखाया गया है। तमिल शैव मंदिर परंपरा के अनुसार गढ़ी गई नंदी की पत्थर की मूर्ति अपने विस्तृत अलंकरण और शांत भाव के लिए जानी जाती है। इसमें नंदी को घंटियों, हारों और साज़-सज्जा के साथ एक पारंपरिक, सुडौल रूप में दिखाया गया है जो उनके आध्यात्मिक महत्व और शिव के प्रति अटूट समर्पण को दर्शाती है। नंदी हिंदू पौराणिक कथाओं में नंदी भगवान शिव के पवित्र बैल और वाहन हैं। उन्हें पूर्ण समर्पण, ध्यान और शक्ति का प्रतीक माना जाता है। पारंपरिक शैव मंदिरों में नंदी की मूर्ति हमेशा मुख्य गर्भगृह या शिवलिंग की ओर मुख करके बैठी हुई मुद्रा में रखी जाती है। इसका अर्थ भक्त की दृष्टि हमेशा ईश्वर पर टिकी होना हैं। आमतौर पर इसे सजावटी घंटियों और मालाओं के साथ लेटी हुई मुद्रा में दिखाया जाता है। यह ऐतिहासिक मंदिर तमिलनाडु के तिरुवरूर जिले के कुल्लू मांगुडी गांव में स्थित है।

छ: सिर वाले कार्तिकेय

छह सिर वाले कार्तिकेय पत्थर की मूर्ति भगवान कार्तिक के छह सिरों के साथ दिखाती है जो ज्ञान, वीरता और दैव्य सुरक्षा का प्रतीक है। हिंदू पौराणिक कथाओं में भगवान कार्तिकेय (मुरुगन) के छह सिरों जिन्हें ‘षडानन’ भी कहा जाता है का बहुत गहरा आध्यात्मिक और प्रतीकात्मक महत्व है। ये छह चेहरे ज्ञान, वैराग्य, बल, कीर्ति, ऐश्वर्य और सौंदर्य का प्रतिनिधित्व करते हैं। कुछ मतों के अनुसार, ये योगियों को प्राप्त होने वाली छह सिद्धियों के प्रतीक हैं। आमतौर पर इन्हें 12 भुजाओं के साथ दिखाया जाता है। जिनमें भाला जैसे हथियार होता है। इसे चोल युग की मूर्तिकला शैली में तराशा गया है जो अपने बेहतरीन अनुपात और बारीक नक्काशी के लिए जानी जाती है। यह तमिलनाडु के तंजावुर जिले के मनमबाड़ी गांव में स्थित नागनाथ स्वामी मंदिर से संबंधित है। बता दें कि यह मंदिर 11वीं सदी की शुरुआत में राजेंद्र चोल प्रथम के शासनकाल में बनवाया गया था।

Topics: भद्रकाली त्रिशूलनंदी मूर्ति ऑस्ट्रेलियामोदी ऑस्ट्रेलिया यात्राभारतीय धरोहरें वापसविकास और विरासत
अभय कुमार
अभय कुमार
अभय कुमार, सीएसडीएस (CSDS ), इप्सोस (IPSOS) सहित कई रिसर्च और मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं। भारतीय राजनीति सामाजिक और अंतरराष्ट्रीय मामलो से जुड़े मुद्दों पर खास दिलचस्पी है और इसके लिए लिखते रहते हैं। [Read more]
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