भारत सरकार खाद्य प्रसंस्करण से जुड़े उद्योगों में नई जान फूंकने की तैयारी में है। इसके तहत केंद्र ने विस्तारित प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (पीएलआई) योजना का अगला चरण तैयार करने के लिए उद्योग के लोगों से बातचीत शुरू कर दी है। इसको लेकर एक बैठक भी हुई है, जिसमें योजना के डिजाइन दायरे, लागू करने के तरीके और इंसेंटिव की संरचना कैसी रखी जाए इसको लेकर चर्चा हुई है।
बीते दिन बुधवार को हुई इस बैठक में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय के सचिव अविनाश जोशी ने बैठक में कहा कि सरकार इस बार सबूतों पर आधारित और उद्योग के नेतृत्व वाली रूपरेखा बनाना चाहती है। नई नीति का मकसद घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देना, भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धा मजबूत करना, नवाचार और टेक्नोलॉजी को बढ़ावा देना, वैल्यू एडिशन को प्रोत्साहित करना और किसानों, एमएसएमई तथा कृषि मूल्य श्रृंखला को ज्यादा फायदा पहुंचाना है।
वर्तमान पीएलआई योजना का रिकॉर्ड
बैठक की शुरुआत में दी गई प्रस्तुति में बताया गया कि अब तक योजना कैसी चली है। योजना के तहत 7,722 करोड़ रुपये के निवेश की प्रतिबद्धता थी, लेकिन कंपनियों ने 9,207 करोड़ रुपये से ज्यादा का निवेश कर दिया। यह लक्ष्य से करीब 20% ज्यादा है। इन निवेशों से 22 राज्यों में 212 विनिर्माण इकाइयां स्थापित हुईं।
पीएलआई से जुड़े उत्पादों की बिक्री में सालाना 10.82% की कंपाउंड ग्रोथ रही है। वित्त वर्ष 2020 में यह 58,758 करोड़ रुपये थी, जो वित्त वर्ष 2026 में बढ़कर 1,08,854 करोड़ रुपये हो गई। निर्यात भी 11.05% की सालाना दर से बढ़ा और 20,840 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। योजना से करीब 3.35 लाख प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष नौकरियां पैदा हुईं। वनवासी क्षेत्रों में 3,265 करोड़ रुपये से ज्यादा निवेश आया। मिलेट आधारित प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों में सबसे अच्छा प्रदर्शन रहा—बिक्री में 104% की सालाना ग्रोथ और मिलेट खरीद में 97% की सालाना बढ़ोतरी दर्ज की गई।
उद्योग की मांगें और सुझाव
हालांकि, उद्योग जगत की सरकार से अभी भी कुछ मांगें है और वो ये कि अगले चरण को और अधिक लचीला और नतीजों पर आधारित बनाया जाए। इनकी मांग है कि योजना का दायरा बढ़ाया जाए ताकि नई उभरती खाद्य श्रेणियां भी शामिल हो सकें। इंसेंटिव को अलग-अलग लक्ष्यों के हिसाब से अलग-अलग रखा जाए—जैसे निर्यात, आयात प्रतिस्थापन, आरएंडडी, नवाचार, रोजगार सृजन और पूंजी निवेश।
उद्योग ने ये सुझाव दिए:
- विदेशी ब्रांडिंग और मार्केटिंग को ज्यादा सपोर्ट
- क्लेम और रीइंबर्समेंट की प्रक्रिया आसान हो
- जरूरी कच्चे माल की बैकवर्ड इंटीग्रेशन मजबूत हो
- कंप्लायंस आसान बने
- पात्रता के नियमों को तर्कसंगत बनाया जाए
- ऑटोमेशन और क्वालिटी अपग्रेडेशन को बढ़ावा
संभावित नई श्रेणियां
प्रतिभागियों ने न्यूट्रास्यूटिकल्स, फंक्शनल फूड्स, प्लांट-बेस्ड प्रोटीन, डेयरी इंग्रीडिएंट्स, समुद्री मूल्यवर्धित उत्पाद, एनिमल फीड और पेट फूड जैसी उभरती श्रेणियों को “सनराइज” कैटेगरी बताया। इनमें घरेलू और निर्यात दोनों बाजारों में अच्छी संभावनाएं हैं। उन्होंने इनोवेशन इकोसिस्टम को मजबूत करने की मांग की—जिसमें समर्पित रिसर्च इंफ्रास्ट्रक्चर, क्लिनिकल वैलिडेशन सुविधाएं, सेंटर्स ऑफ एक्सीलेंस और निर्यात प्रोत्साहन शामिल हों। साथ ही स्वदेशी सामग्री विकास, आयात प्रतिस्थापन और मजबूत भारतीय ब्रांड बनाने पर जोर दिया।











