भारत को अपने हुनर से संवारने वाले गिरीश भारद्वाज का मंगलवार को कर्नाटक में निधन हो गया। 76 वर्ष की आयु में उन्होंने दक्षिण कन्नड़ जिले के सुल्लिया के एक निजी अस्पताल में अंतिम सांस ली। बताया जा रहा है कि, वे पिछले कुछ समय से दिल से जुड़ी बीमारियों से जूझ रहे थे।
बिना किसी सरकारी मदद के सिर्फ अपनी लगन और ग्रामीणों के सहयोग से उन्होंने 300 से अधिक पुलों का निर्माण किया था। इसलिए गिरीश भारद्वाज को पूरा देश ‘ब्रिज मैन ऑफ इंडिया’ कहता था। देश की तरक्की में उनके अद्वितीय और निस्वार्थ योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया था। कौन थे नीतीश भारद्वाज और क्यों उन्हे ब्रिज मैं ऑफ इंडिया चलिए जानते हैं।
मोटी सैलरी वाली नौकरी छोड़ चुना गांव
गिरीश भारद्वाज का जन्म कर्नाटक के एक साधारण परिवार में हुआ था। उन्होंने साल 1973 में मैकेनिकल इंजीनियरिंग में अपनी ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की थी। उस दौर में एक इंजीनियर के लिए किसी भी बड़े शहर या बहुराष्ट्रीय कंपनी में मोटी सैलरी वाली नौकरी पाना बेहद आसान था। लेकिन गिरीश भारद्वाज का दिल अपने ग्रामीण परिवेश के लिए धड़कता था। उन्होंने शहरों की चकाचौंध को ठुकराकर अपने पैतृक क्षेत्र सुल्लिया में ही रहने का फैसला किया और वहां एक छोटी सी मेटल वर्कशॉप की शुरुआत की।
क्यों शुरू किया पुल बनाना?
दरअसल, कर्नाटक का दक्षिण कन्नड़ जिला अपनी भारी बारिश और भौगोलिक विषमताओं के लिए जाना जाता है। मॉनसून के महीनों में यहां की नदियां और बरसाती नाले रौद्र रूप अख्तियार कर लेते हैं। युवा गिरीश भारद्वाज ने देखा कि कैसे हर साल बारिश के दिनों में दर्जनों गांवों का संपर्क बाकी दुनिया से पूरी तरह कट जाता और इससे लोगों को कितनी परेशानियों का सामना करना पड़ता।
ग्रामीण लोग उफनती नदियों को पार करने के लिए जान जोखिम में डालकर छोटी नावों का सहारा लेते थे या तैरकर नदी पार करते थे। इसके चलते आए दिन दर्दनाक हादसे होते थे और लोगों की जानें जाती थीं।
सबसे ज्यादा नुकसान बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को होता था। कनेक्टिविटी न होने के कारण गांवों के बच्चों को मजबूरी में अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ती थी और बीमार लोगों को समय पर अस्पताल पहुंचाना नामुमकिन हो जाता था।
1989 में शुरू हुई ब्रिज बनाने की क्रांति
ग्रामीणों की इस लाचारी और बेबसी ने गिरीश भारद्वाज को झकझोर कर रख दिया। एक इंजीनियर होने के नाते उन्होंने बेहद कम लागत (लो कॉस्ट) में एक व्यावहारिक और मजबूत समाधान निकालने की ठानी। उन्होंने पारंपरिक महंगे पुलों के बजाय अपनी खुद की तकनीक विकसित की और ‘लो-कॉस्ट सस्पेंशन फुटब्रिज’ डिजाइन करना शुरू किया।
साल 1989 में उन्होंने सुल्लिया के अरामबुर में पायस्विनी नदी पर अपना पहला सस्पेंशन पुल बनाया। यह पुल न केवल कम बजट में बनकर तैयार हुआ बल्कि बहुत मजबूत और सुरक्षित भी साबित हुआ। इस पहले पुल की सफलता ने भारद्वाज के जीवन का रास्ता हमेशा के लिए तय कर दिया। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
पिछले 3-4 दशकों में गिरीश भारद्वाज ने अपनी टीम और स्थानीय ग्रामीणों के श्रमदान व सहयोग से एक के बाद एक कई पुल बनाए और रिकॉर्ड स्थापित किए। बता दें कि उन्होंने अकेले दम पर कर्नाटक, केरल, आंध्र प्रदेश और ओडिशा के सबसे सुदूर, वनवासी और मुख्यधारा से कटे हुए इलाकों में 300 से अधिक सस्पेंशन ब्रिज का निर्माण कराया था। इससे लाखों लोगों के जीवन सुगम हुआ। उनका जाना देश के लिए एक अपूर्णीय क्षति है।












