मिनी ब्राजील 'विचारपुर'- एक फुटबॉल गांव जिसने भारत को नई खेल-दृष्टि दी
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होम खेल फ़ुटबॉल

मिनी ब्राजील ‘विचारपुर’- एक फुटबॉल गांव जिसने भारत को नई खेल-दृष्टि दी

मध्य प्रदेश का छोटा सा गांव विचारपुर, जिसे मिनी ब्राजील कहते हैं। जहां फुटबॉल चार पीढ़ियों से खेला जा रहा है, लड़कियां राष्ट्रीय स्तर पर खेल रही हैं और अब जर्मनी तक पहुंच चुके हैं।

Written byदीपक द्विवेदीदीपक द्विवेदी — edited by कुलदीप सिंह
Jul 7, 2026, 01:07 pm IST
in फ़ुटबॉल

अमेरिका कनाडा और मेक्सिको की धरती पर चल रहे फीफा विश्व कप के साथ पूरा विश्व फुटबॉल के उत्सव में डूबा हुआ है। कहीं ब्राजील की कलात्मक खेल की चर्चा है, कहीं अर्जेंटीना के जज्बे की कहानी, तो कहीं जर्मनी के अनुशासन की, तो कोई फुटबॉल के महान सितारे मैसी, एम्बापे और रोनाल्डो को याद कर रहा है। विश्व कप केवल ट्रॉफी जीतने की प्रतियोगिता नहीं है, यह सपनों का वैश्विक मंच है, जहां करोड़ों आंखें मैदान पर टिकी हैं और करोड़ों दिल अपनी टीम के साथ धड़क रहे हैं।

कल्पना कीजिए विश्व कप का फाइनल समाप्त हो चुका है, स्टेडियम की लाइट बंद हो चुकी है, करोड़ों दर्शक अपने घर लौट चुके हैं, तभी कोई सहज पूछ बैठता है क्या कभी भारत भी विश्व कप फीफा विश्व कप खेलेगा? कुछ क्षणों का मौन फिर वहीं से उत्तर आता है -उत्तर ढूंढना है तो पहले विचारपुर पर विचार करिए।

क्या है विचारपुर

पहली नजर में ये केवल एक गांव प्रतीत होता है। न कोई विशाल स्टेडियम, न करोड़ रुपए की खेल अकादमी और न विदेशी सुविधा लेकिन, जैसे ही आप गलियों में प्रवेश करते हैं आपको एहसास होने लगता है कि यहाँ फुटबॉल का खेल खेला नहीं जाता वास्तव में फुटबॉल जिया जाता है। विचारपुर एक ऐसा ही गांव है जो यह बताता है कि विश्व मंच तक पहुंचाने का रास्ता महानगरों से नहीं, गांव की धूल भरी पगडंडियों से होकर गुजरता है।
कभी

शराब के लिए बदनाम, आज खेल के लिए सम्मानित

यह क्षेत्र कभी बेरोजगारी, सीमित अवसर, सामाजिक चुनौतियां से भरा हुआ था। अनेक समाचार रिपोर्ट्स में उल्लेख मिलता था कि यह क्षेत्र कभी महुआ से बनने वाली शराब के कारण भी चर्चित था। उस समय किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि यह गांव देश भर में खेल संस्कृति का उदाहरण बनेगा। लेकिन एक व्यक्ति सुरेश कुंडे ने सब बदल दिया।

एक व्यक्ति जिसने केवल खिलाड़ी नहीं, पीढ़ियाँ तैयार कीं

सुरेश कुंडे स्वयं उत्कृष्ट खिलाड़ी थे। उनके बड़े भाई मुरलीधर कुंडे रेलवे में रहते हुए अंग्रेज अधिकारियों और खिलाड़ी के साथ फुटबॉल खेलते थे। उन्होंने ही विचारपुर के इतिहास को बदलने सपना देखा। पूरे गांव में अभ्यास के लिए फुटबॉल होती थी, जूते नहीं थे, जर्सी नहीं थे, मैदान समतल नहीं था लेकिन बस एक चीज थी जज्बा। सुरेश कुंड बच्चों को फूटबाल के साथ-साथ समय का महत्व, अनुशासन, टीम भावना समझते थे। धीरे-धीरे बच्चे बड़े होते गए और बच्चे भी बढ़ते गए, परिवार जुड़ते गए फिर पूरा गांव और देखते-देखते फुटबॉल का खेल विचारपुर की संस्कृति बन गया।

केतराम सिंह गोंड – जिन्होंने बेटियों के लिए मैदान का दरवाज़ा खोला

यदि सुरेश कुंडे ने विचार बोया तो केतराम सिंह गोंड ने उसे एक बड़े पौधे में बदल कर समाज तक पहुंचा दिया। जब उनकी बेटी रजनी पहली बार मैदान में पहुंची तो लोगों ने आश्चर्य किया। उन्होंने कहा जब बेटा खेल सकता है, तो बेटी क्यों नहीं। उनका ही विश्वास था कि रजनी आगे चलकर राष्ट्रीय स्तर तक पहुंची। आज विचारपुर की पहचान जितनी लड़कों से है उतनी लड़कियों से है।

सफदर हुसैन – जिन्होंने अपनी जमीन, अपना विश्वास दिया

जब खिलाड़ियों की संख्या बढ़ने लगी,तो मैदान की समस्या सामने आ गई थी। ऐसे समय में स्थानीय फुटबॉल खिलाड़ी सफदर हुसैन सामने आये और उन्होंने अपनी निजी भूमि खिलाड़ियों के लिए अभ्यास के लिए दे दी। विचारपुर का पहला आधुनिक मैदान किसी सरकारी योजना से नहीं, बल्कि एक नागरिक के विश्वास से बना था।

प्रगति फुटबॉल क्लब : जहाँ फीस नहीं, केवल समर्पण

समय के साथ स्पष्ट हो गया यदि इस मुहिम को स्थाई बनाना है, तो उसे संस्थागत रूप देना होगा। इसी सोच से जन्म हुआ प्रगति फुटबॉल क्लब जो 1999 पंजीकृत हुआ। कोई प्रवेश शुक्ल नहीं, कोई व्यावसायिक मॉडल नहीं। केवल एक नियम जो मेहनत करेगा वही खेलेगा। यह क्लब आज फुटबॉल की नर्सरी बन गया है।

रईस अहमद – जिन्होंने प्रतिभा को तकनीक दी

किसी भी खिलाड़ी में केवल उत्साह जरूरी नहीं होता, उसे तकनीक आनी चाहिए, फिटनेस चाहिए, रणनीति चाहिए और वैज्ञानिक प्रशिक्षण चाहिए और यही से विचारपुर की कहानी में प्रवेश होता रईस अहमद का। राष्ट्रीय खेल संस्थान से प्रशिक्षित रईस अहमद ने बच्चों को आधुनिक फुटबॉल सिखाना शुरू कर दिया।

चार पीढ़ियों से जारी है परम्परा

विश्व में बहुत ही कम ऐसे गांव होंगे, जहां खेल लगातार चार पीढ़ियों तक जीवित रहा हो। विचारपुर में मुरलीधर कुंडे फिर सुरेश कुंडे फिर नीलेंद्र कुंडे और अब नई पीढ़ी इस परंपरा को आगे बढ़ा रही है। यही कारण है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बच्चों से पूछा मिनी ब्राज़ील क्यों? उत्तर केवल एक वाक्य नहीं था वह पूरे गांव का इतिहास था। विचारपुर ने भारत को सिखाया कि खेल मैदान शुरू होता, लेकिन समाप्त समाज में होता है। यह समाज खेल को अपना ले तो खिलाड़ी अपने आप तैयार होने लगते हैं।

मिनी ब्राजील है विचारपुर

विचारपुर केवल गांव नहीं रहा अब सुरेश कुंडे द्वारा लगाया गए बीज से वृक्ष बन चुका है। प्रगति फुटबॉल क्लब लगातार खिलाड़ी को तैयार कर रहा है। गांव की बेटियां भी राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने लगी हैं। जुलाई 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शहडोल के दौरे पर थे उनकी मुलाकात फुटबॉल की पोशाक पहने बच्चों से हुई, प्रधानमंत्री जी ने पूछा तुम लोग कहां से आए हो ? बच्चों ने बिना झिझक उत्तर दिया मिनी ब्राजील से। बच्चों ने गर्व से बताया कि गांव में चार पीढ़ी से फुटबॉल खेली जा रही है। गांव से अनेक राष्ट्रीय खिलाड़ी निकले हैं। पूरा गांव फुटबॉल को अपना जीवन मानता है। प्रधानमंत्री जी इस अनुभव को दिल्ली ले गए।

मन की बात से पूरी दुनिया तक विचारपुर

प्रधानमंत्री जी ने मन की बात में विचारपुर का उल्लेख किया और विचारपुर पूरी दुनिया तक पहुंच गया। उन्होंने कहा कि भारत के जनजाति क्षेत्र में एक ऐसा गांव जहां फुटबॉल खेल ही नहीं, जीवन का हिस्सा बन चुका है। इसके बाद 2025 में अमेरिकी पॉडकास्टर लेक्स फ्रिडमैन के साथ बातचीत में प्रधानमंत्री जी ने एक बार फिर विचारपुर की चर्चा की। अब विचारपुर को एक अंतरराष्ट्रीय पहचान मिल गई।

विचारपुर की कहानी में और हैं किरदार

लक्ष्मी सहीस जो राष्ट्रीय स्तर पर खेल चुकी हैं। 2023 में खेलो इंडिया के सहयोग से विचारपुर में खेलो इंडिया फीडर केंद्र बना और प्रशिक्षक के रूप में लक्ष्मी सहीस का चयन हुआ। सुहानी कॉल ने गोलकीपर के रूप में जगह बनाई और उनका चयन राष्ट्रीय विद्यालय प्रतियोगिता के लिए हुआ। विचारपुर की नई पीढ़ी में प्रीतम कुमार। वीरेंद्र बैगा, मनीष घसिया, सपना गुप्ता और अनेक खिलाड़ी हैं जिन्होंने कम आयु में सिद्ध कर दिया कि प्रतिभा किसी महानगर की मोहताज नहीं होती।

खेलो इंडिया-सरकार ने समाज के प्रयास को पहचाना

विचारपुर में सरकार तब आई जब समाज स्वयं आगे बढ़ चुका था। फुटबॉल क्रांति से एक गांव से पूरा संभाग प्रेरित हुआ। विचारपुर की सफलता ने प्रशासन को भी सोचने पर मजबूर किया तत्कालीन शहडोल संभागायुक्त राजीव शर्मा ने इस मॉडल को पूरे संभाग में लागू करने का निर्णय लिया। इसी से जन्म हुआ फुटबॉल क्रांति का जिसका उद्देश्य था हर गांव में फुटबॉल, हर स्कूल में फुटबॉल, हर बच्चे तक फुटबॉल। वर्ष 2003 में तत्कालीन शहडोल कलेक्टर राघवेन्द्र सिंह ने विचारपुर की अनूठी फुटबॉल संस्कृति को देखकर इसे पहली बार उन्हें यह मिनी ब्राज़ील लगा।

विचारपुर की कहानी बनी अंतरराष्ट्रीय कहानी

जर्मनी के प्रसिद्ध फुटबॉल क्लब एफसी इंगोलश्टाट की मुख्य कार्यकारी अधिकारी और जर्मनी के पूर्व अंतरराष्ट्रीय फुटबॉलर डिटमार डीडी बेयर्सडॉर्फर की टीम ने विचारपुर में रुचि दिखाई उनके साथ क्लब के अंतरराष्ट्रीय मामलों के निदेशक मैन्युअल शेफर भी इसी पहल से जुड़ गए और अब निर्णय किया गया कि विचारपुर के प्रतिभाशाली खिलाड़ी को जर्मनी में प्रशिक्षण का अवसर दिया जाएगा। यह ग्रामीण प्रतिभा पर अंतरराष्ट्रीय विश्वास की अभिव्यक्ति थी। विचारपुर के जिन बच्चों ने कभी नंगे पैर मिट्टी के मैदान में खेलना शुरू किया था, अब वे जर्मनी की यात्रा की तैयारी कर रहे थे। जहां फुटबॉल खेल नहीं एक सुव्यवस्थित उद्योग एवं जीवन शैली था।

पांच प्रतिभाशाली खिलाड़ियों सुहानी कोल, प्रीतम कुमार, वीरेंद्र बैगा, मनीष घसिया आदि को शामिल किया गया। उनके साथ प्रशिक्षक लक्ष्मी सहीस भी गई। जर्मनी ने इन खिलाड़ियों ने पूरी फुटबॉल की पूरी प्रणाली को निकट से देखा। फिटनेस, खेल विज्ञान, पोषण, वीडियो विश्लेषण, मानसिक तैयारी मैच विश्लेषण और पेशेवर क्लब संस्कृति सब उनके अनुभव थे।

वास्तव में केवल पांच खिलाड़ियों का प्रशिक्षण नहीं था यह पूरे विचारपुर के भविष्य में किया गया निवेश था। विचारपुर की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि यहां से अनेक राष्ट्रीय खिलाड़ी निकले या बच्चों को विदेश में प्रशिक्षण का अवसर मिला। यहां फुटबॉल की सबसे बड़ी उपलब्धि यह फुटबॉल ने समाज को बदल दिया, खेल संस्कृति का विकास किया, फुटबॉल ने बच्चों को लक्ष्य दिया, युवाओं को दिशा दी, बेटियों को आत्मविश्वास दिया और परिवारों को जोड़ दिया और पूरे गांव को एक पहचान दी।

क्या यही भारत का भविष्य हो सकता है

भारत विश्व की सबसे युवा आबादी वाले देश में है। करोड़ों प्रतिभा वाले बच्चे गांव, कस्बा एवं छोटे शहरों में रहते हैं।  समस्या प्रतिभा की नहीं अवसर की है, विचारपुर बताता है कि समर्पित प्रशिक्षक मिले, समाज साथ खड़ा हो, मैदान सुरक्षित रहे, बच्चों को नियमित अभ्यास  मिले, बेटियों को समान अवसर मिले और सरकार सही समय पर सहयोग करें तो किसी भी गांव से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी निकाल सकते हैं।

भारत 2047 और विचारपुर मॉडल

यदि भारत 2036 ओलंपिक खेलों की मेजबानों की एवं विश्व खेल शक्ति बनने का सपना देखा है तो विचारपुर मॉडल एक प्रेरणादाई कहानी बन सकता, नहीं तो हर विश्व कप के बाद एक प्रश्न उठेगा क्या भारत भी कभी फीफा विश्व कप में दावेदार बनेगा ? इस प्रश्न का उत्तर किसी खिलाड़ी, किसी कोच में नहीं है। इसका उत्तर भारत के हजारों गांव में छुपा है। यदि इस उत्तर का जीवंत उदाहरण देखना है तो विचारपुर पर विचार करिए दुनिया ने पहली बार महसूस किया कि भारत की फुटबॉल कहानी केवल महानगरों में नहीं लिखी जा रही है, वह शहडोल के छोटे से गांव में लिखी जा रही है। जहां हर सुबह बच्चों के पैर से टकराती फुटबॉल एक ही संदेश देती है – सपने बड़े देखो क्योंकि मैदान छोटा हो सकता है ,लेकिन मंजिल नहीं। हमें उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में जब भारत विश्व फुटबॉल में अपनी नई पहचान बनाएगा तब इतिहास अवश्य लिखेगा कि इस  यात्रा की शुरुआत किसी चमचमाते  स्टेडियम में नहीं, मध्य प्रदेश के छोटे से जनजाति गांव विचारपुर यानि भारत के मिनी ब्राजील से हुई थी।

Topics: फुटबॉलविचारपुरभारत का मिनी ब्राजीलविचारपुर मिनी ब्राजीलविचारपुर फुटबॉल
दीपक द्विवेदी
दीपक द्विवेदी
सिविल सेवा विशेषज्ञ , इतिहास संकलन समिति, जनजाति कल्याण केंद्र। इतिहास , भारतीय ज्ञान परम्परा एवं विभिन्न विमर्श पर वैचारिक लेखन और उद्बोधन। [Read more]
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