नागपुर। नागपुर में समर्पण वेलनेस सेंटर के लोकार्पण कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने मानसिक स्वास्थ्य, भारतीय मनोविज्ञान और परिवार की भूमिका पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी में बढ़ते अकेलेपन और मानसिक अस्थिरता को रोकने के लिए परिवार में संवाद बढ़ाना आवश्यक है। आज बच्चा रोता है तो उसके हाथ में मोबाइल थमा दिया जाता है, जबकि उससे सुयोग्य संवाद करने की आवश्यकता है।
परिवार में संवाद और संस्कारों की आवश्यकता पर दिया जोर
उन्होंने कहा कि पहले ग्रंथ पढ़ने और परिवार में कहानियां सुनने-सुनाने की परंपरा से मानसिक मजबूती मिलती थी। आज बारहवीं में असफल होने या घर में डांट पड़ने जैसी छोटी घटनाओं पर भी युवा आत्महत्या जैसे कदम उठा रहे हैं। पहले दादी-नानी बच्चों को कहानियां सुनाती थीं, लेकिन अब संयुक्त परिवार कम हो गए हैं। माता-पिता भी बच्चों को टीवी या गूगल बाबा के भरोसे छोड़ देते हैं। बच्चा रोता है तो उसे बचपन से ही मोबाइल दे दिया जाता है। नई पीढ़ी में ऐसा मन विकसित करना होगा, जो जीवन की चुनौतियों का सामना कर सके। इसके लिए परिवार और समाज दोनों को मिलकर काम करना होगा। बच्चों और युवाओं में अकेलापन न आने देना तथा संवाद बढ़ाना समय की आवश्यकता है।
मानसिक स्वास्थ्य के साथ मन की मजबूती भी जरूरी
सरसंघचालक जी ने कहा कि स्वास्थ्य के लिए केवल शरीर का स्वस्थ होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि मन का स्वस्थ होना भी उतना ही आवश्यक है। शरीर अस्वस्थ होता है तो वह शरीर के साथ मन को भी कमजोर करता है। जो व्यक्ति अस्वस्थ होता है, वह जल्दी क्रोधित भी हो जाता है। मन ही मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण है। मनुष्य या किसी भी जीव के जन्म के साथ मन का निर्माण प्रारंभ होता है। मन अनुभवों से बनता है। अच्छे अनुभव मिलते हैं तो मन सकारात्मक बनता है, जबकि नकारात्मक अनुभव और विचार मन को कमजोर करते हैं। इसलिए मनुष्य के विकास में प्रारंभ से अंत तक मन की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।
भारतीय मनोविज्ञान और मन की चिकित्सा की समृद्ध परंपरा
उन्होंने कहा कि भारत में मन की चिकित्सा और उसके अध्ययन की समृद्ध परंपरा रही है, जिसका अध्ययन किया जाना चाहिए। किसी भी शास्त्र का विकास और उसमें पूर्णता आने से मानव का कल्याण होता है। ज्ञान पूर्ण होने पर ही समाज का व्यापक हित संभव है।













