दया याचिका से नहीं, जन-दबाव से रिहा हुए थे सावरकर: परिजनों का बड़ा दावा- "कांग्रेस चाहती तो बच जाती भगत सिंह की फांसी"
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दया याचिका से नहीं, जन-दबाव से रिहा हुए थे सावरकर: परिजनों का बड़ा दावा- “कांग्रेस चाहती तो बच जाती भगत सिंह की फांसी”

वीर सावरकर मानहानि मामले में राहुल गांधी के खिलाफ पुणे कोर्ट में जिरह के दौरान सावरकर के प्रपौत्र सात्यकि सावरकर ने बड़ा दावा किया है। उन्होंने कहा कि सावरकर दया याचिका से नहीं बल्कि जन-दबाव से रिहा हुए थे।

Written byShivam DixitShivam Dixit
Jul 3, 2026, 12:44 am IST
in भारत, महाराष्ट्र
स्वातंत्र्य वीर सावरकर

स्वातंत्र्य वीर सावरकर

पुणे, महाराष्ट्र। हिंदुत्व विचारक विनायक दामोदर सावरकर (Veer Savarkar)  द्वारा अंग्रेजों को दी गई कथित ‘दया याचिकाओं’ (Mercy Petitions) के दावों को उनके परिजनों ने सिरे से खारिज कर दिया है।

कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के खिलाफ दायर आपराधिक मानहानि मामले में बुधवार को सावरकर के भाई के प्रपौत्र सात्यकि सावरकर ने पुणे की एक विशेष अदालत में बड़ी गवाही दी।

उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वीर सावरकर को अंग्रेजों ने किसी दया याचिका के आधार पर नहीं, बल्कि देश में उनके प्रति बढ़ रहे भारी जन-दबाव और कांग्रेस के ऐतिहासिक काकीनाडा अधिवेशन के प्रस्ताव के कारण रिहा किया था।

एक नज़र में समझें सावरकर मानहानि केस और कोर्ट रूम की बड़ी बातें

अदालती एवं ऐतिहासिक आयामकोर्ट रूम का आधिकारिक विवरण / तथ्य
सुनवाई करने वाली अदालतएमपी/एमएलए विशेष अदालत (न्यायाधीश अमोल शिंदे), पुणे
शिकायतकर्ता (Complainant)सात्यकि सावरकर (वीर सावरकर के भाई के प्रपौत्र)
किसके खिलाफ है मामला?कांग्रेस नेता राहुल गांधी (लंदन में दिए विवादित भाषण को लेकर)
सावरकर की रिहाई का मूल कारणजनता का बढ़ता दबाव और 1923 का काकीनाडा कांग्रेस अधिवेशन प्रस्ताव।
शहीद भगत सिंह पर बड़ा बयान“अगर कांग्रेस ऐसा ही प्रस्ताव पास करती, तो भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फांसी टल सकती थी।”

“कांग्रेस चाहती तो टल सकती थी भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फांसी”

सात्यकि सावरकर ने सुनवाई के दौरान इतिहास का एक बेहद संवेदनशील संदर्भ अदालत के सामने रखा। उन्होंने वर्ष 1923 में मौलाना मोहम्मद अली जौहर की अध्यक्षता में हुए कांग्रेस के काकीनाडा अधिवेशन का विशेष जिक्र किया, जिसमें सावरकर की रिहाई की मांग का आधिकारिक प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हुआ था।

“1923 में सावरकर की लोकप्रियता दिन-ब-दिन देश भर में बढ़ रही थी और ब्रिटिश हुकूमत पर उनकी विमुक्ति के लिए जनता का दबाव चरम पर था, यही कारण था कि कांग्रेस को भी प्रस्ताव पास करना पड़ा। यदि कांग्रेस ने इसी प्रकार की राजनीतिक दृढ़ता दिखाते हुए अमर शहीद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दिए जाने से पहले भी ऐसा ही कोई मजबूत प्रस्ताव अपनाया होता, तो शायद देश के उन महान क्रांतिकारियों को भी फांसी के फंदे से बचाया जा सकता था।” – सात्यकि सावरकर, अदालत में दिए बयान के अंश

सात्यकि ने याचिकाओं की सत्यता पर उठाए सवाल

एमपी/एमएलए विशेष अदालत के न्यायाधीश अमोल शिंदे के समक्ष सुनवाई के दौरान राहुल गांधी की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता मिलिंद पवार ने शिकायतकर्ता सात्यकि सावरकर से बेहद तीखे सवाल किए और लंबी जिरह की।

जिरह के दौरान ब्रिटिश सरकार को कथित तौर पर सावरकर द्वारा भेजी गई दया याचिकाओं के कुछ चुनिंदा अंश सात्यकि के सामने पढ़कर सुनाए गए और उनसे पूछा गया कि क्या सावरकर ने किसी शर्त पर रिहाई मांगी थी?

जिरह के दौरान सात्यकि सावरकर के मुख्य विधिक तर्क:

  • लेखन की प्रामाणिकता पर संदेह: सात्यकि ने कोर्ट में साफ कहा, “मुझे इस बात की कोई विधिक जानकारी नहीं है कि अदालत में पेश की जा रही उपरोक्त कथित याचिका की सामग्री स्वयं वीर सावरकर ने ही लिखी थी या नहीं।”
  • शर्तों के दावों को नकारा: उन्होंने आगे कहा कि वे यह बिल्कुल नहीं कह सकते कि सावरकर ने अपनी रिहाई के लिए अंग्रेजों के सामने कोई शर्त रखी थी या ब्रिटिश सरकार से इस वचन पर रिहाई मांगी थी कि वे भविष्य में किसी राजनीतिक या क्रांतिकारी आंदोलन में हिस्सा नहीं लेंगे।
  • स्वेच्छा से जोड़ा पक्ष: सात्यकि ने स्वेच्छा से अदालत के रिकॉर्ड पर यह बात दर्ज कराई कि सावरकर की सेल्युलर जेल से रिहाई किसी भी रूप में ब्रिटिश हुकूमत के सामने गिड़गिड़ाने या तथाकथित दया याचिकाओं का परिणाम नहीं थी, बल्कि यह पूरी तरह राष्ट्रीय जनाक्रोश का नतीजा था।

क्या है पूरा विवाद? राहुल गांधी के लंदन वाले भाषण से जुड़ी है कड़ी

यह पूरा कानूनी मामला साल 2023 में सात्यकि सावरकर द्वारा दर्ज कराई गई एक आपराधिक मानहानि की शिकायत पर आधारित है। शिकायत के अनुसार, राहुल गांधी ने मार्च 2023 में लंदन (यूके) की अपनी यात्रा के दौरान एक सार्वजनिक मंच को संबोधित करते हुए विनायक दामोदर सावरकर के खिलाफ घोर अपमानजनक और मनगढ़ंत टिप्पणी की थी।

राहुल गांधी ने अपने भाषण में कथित तौर पर यह दावा किया था कि हिंदुत्व विचारक सावरकर ने खुद अपनी एक किताब में लिखा है कि उन्होंने एक बार अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर एक मुस्लिम व्यक्ति की बेरहमी से पिटाई की थी और ऐसा करने से उन्हें आत्मिक खुशी मिली थी।

शिकायतकर्ता सात्यकि सावरकर का कोर्ट में कड़ा स्टैंड है कि वीर सावरकर ने अपने पूरे जीवनकाल में अपनी किसी भी पुस्तक, निबंध, डायरी या रचना में ऐसा कोई भी सांप्रदायिक या हिंसक बयान कभी नहीं लिखा था।

राहुल गांधी ने केवल राजनीतिक लाभ और सावरकर की वैश्विक छवि को धूमिल करने के उद्देश्य से अंतरराष्ट्रीय धरती पर यह झूठ फैलाया, जो कि पूरी तरह मानहानि की श्रेणी में आता है।


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Shivam Dixit
Shivam Dixit
अनुभवी भारतीय पत्रकार, मीडिया एवं सोशल मीडिया विशेषज्ञ, राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार विजेता, और डिजिटल रणनीतिकार। वर्ष 2015 में पत्रकारिता की शुरुआत। प्रिंट, TV और डिजिटल मीडिया संस्थानों में विभिन्न भूमिकाओं में कार्य किया। भारत की प्रथम SMS समाचार एजेंसी "न्यूज़ नेटवर्क ऑफ इंडिया" (NNI) में रिपोर्टर कोऑर्डिनेटर के रूप में काम किया, डिजिटल मीडिया के अनोखे प्रोजेक्ट "इंडियाज़ पेपर" का नेतृत्व करते हुए 500 समाचार वेबसाइटों का प्रबंधन किया। भारत के अलग अलग राज्यों के लगभग 1000 स्थानीय पत्रकारों से जुड़ा यह प्रोजेक्ट "लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स" में दर्ज है। वर्ष 2022 से राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका पाञ्चजन्य (1948 में स्थापित) में उपसंपादक के रूप में कार्यरत हैं। शिवम् की पत्रकारिता में राष्ट्रीयता, सामाजिक मुद्दों और तथ्यपरक रिपोर्टिंग पर जोर रहा है। उनकी कई रिपोर्ट्स, जैसे- नूंह (मेवात) हिंसा, हल्द्वानी वनभूलपुरा हिंसा, जम्मू-कश्मीर पर "बदलता कश्मीर", "नए भारत का नया कश्मीर", "370 के बाद कश्मीर", "टेररिज्म से टूरिज्म", और अयोध्या राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से पहले के बदलाव जैसे "कितनी बदली अयोध्या", "अयोध्या का विकास", और "अयोध्या का अर्थ चक्र", कई राष्ट्रीय मंचों पर सराही गई हैं। उपलब्धियों में देवऋषि नारद पत्रकार सम्मान (2023) शामिल है, जिसे उन्होंने जहांगीरपुरी हिंसा के मुख्य आरोपी "अंसार खान" की साजिश को उजागर करने के लिए प्राप्त किया। [Read more]
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