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सुरों की संगिनी प्रकृति: ऋतु चक्र, प्रहर और शास्त्रीय संगीत का शाश्वत नाता

संगीत के बिना जीवन ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ही अधूरा है

Written byइली मिश्राइली मिश्रा
Jun 28, 2026, 08:15 pm IST
in कला-साहित्य
सुरों की साधना

सुरों की साधना

हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के अनुसार मां सरस्वती वाणी की शक्ति हैं। अलग-अलग मंत्रों की तरह चौबीस घंटों को अलग- अलग प्रहरों में और वर्ष को छह ऋतुओं (वसंत, ग्रीष्म,वर्षा,शरद, हेमंत और शिशिर) में विभाजित किया गया है। संगीतज्ञों का मानना है कि विशेष मौसम में विशेष राग गाने से मन का सुकून, गायन क्रिया ही नहीं बल्कि सुनने वालों के मन पर भी उसका अनुकूल प्रभाव पड़ता है। ग्रीष्म ऋतु के रागों की तासीर ऐसी होती है कि वे तन की तपिश को भुला कर मन में संगीत की ठंडक घोल देती है।

संगीत के बिना जीवन ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ही अधूरा है। उजली स्वच्छ आंगन में चमकती हुई चन्द्र आभा,सूर्य की तेज़ प्रभा की झलक, गंगा की अविरल धारा जो सदियों से बहती हुई आई है, ऐसी ही संगीत कला भारत की प्राण चेतना और शक्ति है। ऐसी कला जो अपने राग के गायन प्रहर से मौसम बदल देती है। अतीत की अवधि से प्रेरणादायी, शुभारंभ की प्रतीक रही है।

संगीत साधना निजी जीवन की कथा का आधार है। जीवन के सम्पूर्ण रूप का चित्र रेखांकित होता है। संगीत का दीप अंधकार के बीच अकेला जलता हुआ आलोक बिखेरता है। सांस दृग पलक प्राण उर अधर अर्थात तन और मन की पूजा और साधना है संगीत। अंधकार से प्रकाश की यात्रा है। आत्मा और परमात्मा से सम्बंधों को व्यक्त करने वाली शब्दावली है संगीत। शास्त्रीय संगीत का गायन या वादन प्रहर और मौसम के नियमानुसार होता है। संगीत की चिरसंगिनी है प्रकृति, एक दूसरे के साथ तारतम्य भाव है।अपनी अनुभूति की सूक्ष्मता,चिन्तन की गंभीरता, करुणा, प्रेम और गीतात्मक चेतना के कारण विशिष्ट और घनिष्ठ संबंध है। सभी ऋतुओं के राग वर्गीकृत है।

वैशाख और ज्येष्ठ नये गायक के समान एक से एक लम्बा आलाप लेकर अग्नि के अक्षरों को भर-भरकर अपनी अग्नि वीणा से इस संसार को विस्मित कर देते हैं। भूरे, पीले, हरे पत्तों की चादर बिछ जाती है,शाखाओं के सूखे पत्तों को पुकारती वायु। इनके बीच बेहद सहृदय से आते हैं हमारे शास्त्रीय संगीत के राग।

वसंत के बाद जब ग्रीष्म ऋतु का आगमन होता है तब मौसम का मिज़ाज बदल जाता है। सूर्य की तपिश और लू चरम पर होती है। यह समय तब शुरू होता है जब सूर्य देव रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करते हैं। तपिश की ज्वाला में शीतलता की छाया का आभास होना ही ग्रीष्म कालीन राग है। इन रागों में ऐसे स्वर समूह होते हैं… “पकड़”किसी राग के स्वरों का छोटा समूह।यह पकड़ मुख्य भूमिका,पहचान या उसका मूल स्वरूप होती है।रागों के “थाट” एक सैद्धांतिक अवधारणा है जो हमें समान सुर और प्रकृति वाले रागों को समूह बद्ध करने में मदद करती है। अपने मूल रूप में राग हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के सुरों का एक क्रम है।

ग्रीष्म ऋतु के प्रमुख राग:-

1.राग-सारंग

यह राग विशेष रूप से ग्रीष्म ऋतु के लिए ही जाना जाता है। जब सूर्य की किरणें अपनी चरम उड़ान पर होती हैं, तब इस राग को गाने की परम्परा है। इसकी मधुर और शीतल धुन,मन और मस्तिष्क को भीषण तपिश में भी एक अद्भुत शान्ति और सुकून प्रदान करती है।

2.राग मारवा

यह एक अत्यंत गंभीर और विराट भावपूर्ण राग है। इसे दिन के उत्तरार्ध अर्थात दोपहर बाद से लेकर सूर्यास्त के समय तक गाया जाता है। यह राग दिन की थकावट और गर्मी को कम करके एक शान्त और ध्यान मग्न वातावरण तैयार करता है,जिससे शीतलता का आभास होता रहता है।

3.राग हिंदोल

यह राग मुख्य रूप से वसंत ऋतु से संबंधित है। इसकी ऊर्जा और ताज़गी शुरुआती गर्मी के महीनों के लिए भी उपयुक्त बनाती है। यह राग दिन के प्रथम प्रहर में गाया जाता है। हल्की तपिश में यह राग उमंग और ताज़गी का संचार करता है, गर्मियों की शुरुआत में एक खुशनुमा माहौल बनता है। तपिश की ज्वाला में शीतलता की छाया का आभास ही ग्रीष्म कालीन राग हैं।

संगीत मात्र आवाज को स्वरों के साथ उतारना नहीं बल्कि एक सुव्यवस्थित, कलात्मक संचार,जो प्रकृति से मनुष्य तक के अन्त:करण को आलोकित करता है। मां सरस्वती एक देवी ही नहीं बल्कि ज्ञान,संगीत की पवित्रता का प्रवाह हैं। वाणी की अधिष्ठात्री देवी, बुद्धिप्रदाता,सत्य वचनों से प्रेरित करने वाली हैं। ऋग्वेद की तरह सामवेद में भी मां सरस्वती का वर्णन एक दिव्य और शक्तिशाली नदी के रूप में है। जिसमें देवत्व भाव की प्रेरणा होती है।

संगीत कला में विशेष अभिरुचि प्रत्येक मानव में होती है। पीत वर्ण धूप के चरण-चिन्हों पर संगीत के आवरण से विशेष प्रभाव होता है। संगीत के रागों से ग्रीष्म ऋतु की आंखों पर आर्द्र नीलिमामयी आकाश की अनुभूति होती है। कण्ठ के सरल स्वरों से भीगी नीली दीवार पर सुरों की कुशल रेखाकृति आ जाती है। एक एक स्वर से,नन्हे फूलों की पंखुड़ियां की तरह धुन निकलती है। स्वरों की वर्णमाला से शीतलता की तेज़ धार निकलने लगती है। मनुष्य को संसार बांधने वाला विधाता ही संगीत है। करुण होती करुणा की भाषा में भी उमंग होती है। संगीत कला अटूट श्रद्धा की साधना है। मनुष्य ऐसे संगीतोपयी नाद से ईश्वरीय संबंध स्थापित करते हैं। ईश्वर के सिवा और किसी को जानना बाकी नहीं रहता।

हृदयों को जोड़ता संगीत

भारतीय संगीत एक संस्कृति है। जैसे कथाएं हृदय को बांध देती है, वैसे ही संगीत हृदयों को जोड़ देता है। प्रसन्नता की उजली किरण उठते ही, हर प्रहर, हर ऋतु में विश्वास की दीप शिखा प्रज्वलित हो जाती है। संगीत कला से स्वाभाविक लगाव, गहरी रुचि, हृदय कौशल की साधना, ये क्षमता जन्मजात ही आती है। यह वह योग्यता है,जो यह दर्शाती है कि यदि मानव को उचित प्रशिक्षण और वातावरण मिले तो शास्त्रीय संगीत के अविरल आचमन अर्थात अभ्यास से, किसी हद तक सफलता मिल सकती है।

 

Topics: भारतीय संगीतहिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीतप्रकृति संगीतग्रीष्मकाल और संगीतऋतु और संगीत
इली मिश्रा
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