विधानसभा का चुनाव बिहार के 2005 के चुनाव की तर्ज़ पर आगे बढ़ता दिख रहा है। बिहार में 2005 में दो बार विधानसभा का चुनाव हुआ था और यह देश का पहला राज्य था जहाँ एक साल में दो बार विधानसभा के चुनाव हुए थे। इन चुनावों का सबसे महत्वपूर्ण तथ्य था कि लालू यादव और उनकी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल के खिलाफ उनके तात्कालिक गठबंधन सहयोगी लोजपा के रामविलास पासवान ने मुस्लिम मुख्यमंत्री का मुद्दा उठाया था।
इस मुद्दे ने राजनीतिक तौर पर बहुत बड़ा काम किया था और लालू यादव और उनके परिवार के 15 सालों के सत्ता का अंत कर दिया था। उस समय लालू यादव और रामविलास पासवान दोनों कांग्रेस पार्टी नीत यूनाइटेड प्रोग्रेसिव गठबंधन सरकार जिसका नेतृत्व मनमोहन सिंह कर रहे थे। इस सरकार पर पीछे से मुखिया सोनिया गांधी का नियंत्रण था। दोनों यूपीए सरकार में मंत्री थे मगर बिहार की राजनीति में ये दोनों एक दूसरे के खिलाफ थे। ऐसा कहा जाता है कि लालू यादव के कद को छोटा करने के लिए सोनिया गांधी के इशारे पर रामविलास पासवान इस मुद्दे को उठाया था। इसका प्रमाण मिलता है कि सोनिया गांधी ने इन दोनों के बीच गठबंधन करवाने का कोई भी प्रयास नहीं किया था, तब जबकि लालू यादव यूपीए सरकार में रेल मंत्री थे वहीं रामविलास पासवान खान मंत्री की भूमिका में थे। अगर सोनिया गांधी चाहतीं तो राजद और लोजपा की सरकार आसानी से बन सकती थी। मगर सोनिया गांधी लालू यादव के कद को छोटा करने के लिए ऐसा नहीं किया था।
2027 का यूपी चुनाव बिहार जैसा होता दिख रहा
उत्तर प्रदेश के 2027 का चुनाव भी बिहार के 2005 के समानांतर होता दिख रहा है, सिर्फ राजनीतिक दल हैं। उत्तर प्रदेश में भी मुस्लिम मुख्यमंत्री बनाने की मांग शुरू कर दी गई है। यह मांग उत्तर प्रदेश में किसी राजनीतिक दल या नेता के द्वारा नहीं, बल्कि मुस्लिम समाज के लोगों के द्वारा उठाया जा रहा है। यह मुद्दा आने वाले समय में और बढ़ेगा। क्योंकि हिंदी भाषी प्रदेशों में सबसे अधिक मुस्लिम मतदाता उत्तर प्रदेश में ही हैं। प्रदेश के कुल 403 विधानसभा सीटों में से लगभग 143 पर मुसलमान मतदाताओं की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। इनमें से 73 सीटें ऐसी है, जहाँ मुसलमानों की आबादी 30% से अधिक है। वहीं लगभग 70 सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं की संख्या 20% से 30% के बीच है।
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यूपी में असमान है मुस्लिम मतदाताओं का रुख
उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाताओं का रुख एक समान नहीं रहा है। उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाता 1989 के लोकसभा चुनाव में जनता दल और उसके बाद उसके नए अवतार समाजवादी पार्टी के पक्ष में मतदान करते रहे हैं। 2007 के विधानसभा चुनाव में राज्य के मुस्लिम मतदाताओं ने सपा से अधिक में मायावती की बहुजन समाज पार्टी का समर्थन किया था। 2009 के लोकसभा के चुनाव में मुस्लिम मतदाताओं ने कांग्रेस पार्टी को समर्थन किया था। 1999 के लोकसभा के चुनाव में मुस्लिम मतदाताओं के रुख से खुद मुलायम सिंह यादव इतना अधिक भयभीत हो गए थे कि उन्होंने संभल के अलावा कन्नौज लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा था। 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के एक वोट से गिरने के बाद सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री पद के लिए समर्थन नहीं देने के कारण मुलायम सिंह यादव को भय था कि संभल के मुस्लिम मतदाता उनके लिए मतदान नहीं कर सकते हैं। संभल सीट मुस्लिम बाहुल्य मानी जाती है।अतएव उन्होंने अपनी परम्परागत सीट संभल के अलावा कन्नौज से भी चुनाव लड़ना पड़ा था।
वर्तमान में उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाताओं का समीकरण पूरी तरह से बदल गया है। असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन भी इस बार पूरे दमखम के साथ चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है। 2022 के उत्तर प्रदेश विधनसभा के चुनाव में ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन 95 सीटों पर चुनाव लड़ी थी और 58 सीटों पर कांग्रेस पार्टी से आगे रही थी। इसके अलावा बिहार में लगातार दो विधानसभा के चुनाव में ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन ने मुस्लिम बाहुल्य सीमांचल इलाके में उम्मीद से अच्छा प्रदर्शन किया है। आश्चर्यजनक तथ्य है कि ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन ने राजद और कांग्रेस पार्टी को किनारे करके मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में ऐसा प्रदर्शन किया है।
अखिलेश से मुस्लिमों का मोहभंग
अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी पहले की तरह ही मुस्लिम मतों को अपनी ओर आकर्षित कर सकेगी, इसमें बड़ा संशय है। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस पार्टी ने 2024 लोकसभा का चुनाव में गठबंधन में लड़कर अच्छा प्रदर्शन अवश्य किया था। मगर उसके बाद इन दलों ने कोई भी जनसरोकार से संबंधित कार्य या आंदोलन नहीं किया, जिससे कि वैसी ही स्थिति 2027 तक बनी रहे। इसके अलावा भाजपा और एनडीए का महाराष्ट्र, बिहार, पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में 2024 के लोकसभा चुनाव में अपेक्षाकृत कमजोर प्रदर्शन रहा था। मगर विधानसभा के चुनाव में भाजपा और एनडीए ने शानदार वापसी करते हुए विपक्षी दलों से लोकसभा के चुनाव का हिसाब चुकता कर लिया है। भाजपा अपने सहयोगी दलों के साथ इन प्रदेशों में मुस्लिम वोटबैंक के वीटों को पूरी तरह से तोड़ दिया है। भाजपा ऐसी ही स्थिति उत्तर प्रदेश में भी 2027 के चुनाव में करती दिख रही है।
लोकसभा चुनाव के बाद के विधानसभा चुनावों के प्रदर्शन ने मुस्लिम मतदाताओं को अब दोबारा सोचने पर मजबूर कर दिया है कि पुरानी मतदान रणनीति अब उनके लिए पहले की तरह उपयोगी नहीं रह गया है। इस कारण अब सपा, कांग्रेस पार्टी और अन्य छोटे दल भी मुस्लिम मतदाताओं के रुख को लेकर संशय की स्थिति में है। मायावती द्वारा मजबूती से चुनाव लड़ने की सुगबुगाहट भी इन दलों के लिए एक और खतरे की घंटी बजती दिख रही है।











