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अडानी के खिलाफ अमेरिकी केस खारिज करने से जज ने इनकार किया, DOJ को 13 जुलाई तक कारण बताने का आदेश

अमेरिकी जज निकोलस गारौफिस ने गौतम अडानी और उनके सहयोगियों के खिलाफ लगे आपराधिक मामलों को खारिज करने से इनकार कर दिया। न्याय विभाग को 13 जुलाई तक केस छोड़ने के विस्तृत कारण बताने का आदेश।

Published by
कुलदीप सिंह

दो साल पुराने मामले में अमेरिका में एक जज ने अडानी ग्रुप के चेयरमैन गौतम अडानी के खिलाफ लगे आपराधिक मामलों खारिज करने से इनकार कर दिया है। उन्होंने न्याय विभाग से इस फैसले की वजह बताने को कहा है।

मामला क्या है?

2024 में गौतम अडानी और उनके कुछ सहयोगियों पर अमेरिकी अदालत में आरोप लगाए गए थे। आरोप यह था कि उन्होंने भारतीय सरकारी अधिकारियों को रिश्वत देने की साजिश रची, ताकि अडानी ग्रुप की एक कंपनी को सोलर प्लांट विकसित करने की मंजूरी मिल सके। साथ ही, अमेरिकी निवेशकों को कंपनी की एंटी-करप्शन प्रैक्टिसेस के बारे में गलत आश्वासन देकर उन्हें धोखा दिया गया। अडानी ग्रुप ने इन सभी आरोपों से इनकार किया है और लगातार कहा है कि वे कुछ गलत नहीं किया।

क्या हुआ हाल में?

पिछले महीने मई में अमेरिकी न्याय विभाग ने कहा कि वह अब इस मुकदमे को आगे नहीं बढ़ाएगा। इसके बाद अडानी के वकीलों ने 24 जून को ब्रुकलिन की अदालत में जज निकोलस गारौफिस से औपचारिक रूप से केस खारिज करने की मांग की। लेकिन 26 जून को जज ने इस पर तुरंत फैसला नहीं सुनाया। उन्होंने न्याय विभाग को लिखित में आदेश दिया कि उन्हें अपने फैसले की पूरी वजह बतानी होगी। जज ने कहा कि विभाग का बयान बहुत संक्षिप्त, सामान्य और बिना किसी ठोस आधार का था। इससे अदालत को कोई ठोस जानकारी नहीं मिली कि आखिर उन्होंने केस क्यों छोड़ना चाहते हैं।

जज ने न्याय विभाग को 13 जुलाई तक समय दिया है कि वे हर वजह को विस्तार से और तथ्यों के साथ लिखकर दें। तब तक आरोप आधिकारिक रूप से बने हुए हैं।

जज का रुख

जज निकोलस गारौफिस ने साफ कहा कि सरकार का छोटा-सा बयान अदालत को न तो कोई निष्कर्ष निकालने की गुंजाइश देता है और न ही विश्लेषण करने का मौका। उन्होंने सभी आठ आरोपियों के खिलाफ इंडिक्टमेंट (आरोप पत्र) को खारिज करने के हर आधार पर पर्याप्त जानकारी मांगी है। अडानी के वकीलों ने अपनी याचिका में कहा था कि यह मामला अमेरिकी कानून की पहुंच से बाहर है और भारत में कथित रिश्वतखोरी साबित करना संभव नहीं होगा। लेकिन जज ने अभी इस पर कोई फैसला नहीं दिया है।

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