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पाकिस्तान में तानाशाही हावी: बलूच एक्टिविस्ट डॉ. महरंग बलोच को उम्रकैद, उबाल पर बलूचिस्तान, सड़कों पर उतरा जनसैलाब!

पाकिस्तान की एक अदालत ने बलूच मानवाधिकार कार्यकर्ता डॉ. महरंग बलोच को देश के खिलाफ काम करने के आरोपों में उम्रकैद की सजा सुनाई है। इस फैसले के बाद बलूचिस्तान प्रांत में विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं।

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सोनाली मिश्रा

पाकिस्तान में बलूच मानवाधिकार कार्यकर्ता महरंग बलोच को देश के खिलाफ काम करने को लेकर उम्रकैद की सजा सुनाए जाने को लेकर अब विरोध के स्वर तेज हो गए हैं। महरंग बलोच पेशे से डॉक्टर हैं और उन्हें बलूचिस्तान प्रांत की राजधानी क्वेटा में आतंकवाद विरोधी अदालत के जज मोहम्मद अली मोबिन ने 22 जून 2026 को यह सजा सुनाई गई।

अब इसे लेकर बलूचिस्तान में जहां सड़कों पर प्रदर्शन हो रहे हैं तो वहीं अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं भी इस निर्णय के खिलाफ आवाज उठा रही हैं। बलूचिस्तान की शेरनी के नाम से प्रख्यात डॉक्टर महरंग बलोच से पाकिस्तान के नेता भी डरते हैं और यही कारण है कि जल्दबाजी में यह फैसला सुनाया गया। यह फैसला उस समय आया है, जब महरंग बलोच और अन्य बलोच नेताओ को हिरासत मे लिए जाने के कारण अदालत की कार्यवाही का बहिष्कार कर रखा था।

पाकिस्तान अपने मुल्क में अल्पसंख्यकों के खिलाफ ही नहीं बल्कि बलूच मुसलमानों के खिलाफ भी हिंसा करता रहता है। बलूचिस्तान के लोग खुद को पाकिस्तान का हिस्सा नहीं मानते हैं। पाकिस्तान ने जबरन बलूचिस्तान को 1948 में पाकिस्तान में मिलाया था और इस अवैध कब्जे के खिलाफ बलूचिस्तान के लोग हमेशा ही पाकिस्तान का विरोध करते रहते हैं।

क्योंकि बलूच लोगों की अपनी एक संस्कृति और परंपरा है, और अपनी अलग भाषा है, इसलिए वे खुद को पाकिस्तान का हिस्सा नहीं मानते हैं। पाकिस्तान बलूचिस्तान के संसाधनों के लिए बलूचिस्तान पर कब्जा जमाए हुए है और वहाँ के लोगों के साथ दुर्व्यवहार और अन्याय करता रहता है।

महरंग बलोच बलूचिस्तान के लोगों के लिए लड़ती हैं। वे वहाँ पर लोगों के अपहरण और हत्याओं पर आवाज उठाती हैं। वे पूरी दुनिया के सामने पाकिस्तान का काल चेहरा रखती हैं। पाकिस्तान जो हमेशा ही मानवीय चेहरा बनाकर रखता है, वह किस सीमा तक बलूचिस्तान के प्रति निर्दयी है, उसे महरंग और अन्य बलूच नेता बताते रहते हैं। यही कारण है कि पाकिस्तान बलूचिस्तान के नेताओं से चिढ़ता है और वहाँ पर दमनचक्र चलता रहता है।

बीबीसी ने वर्ष 2024 में सबसे प्रभावी सौ महिलाओं में गिना था

बीबीसी ने वर्ष 2024 में जब पूरे विश्व से 100 प्रभावी और प्रेरक महिलाओं की सूची जारी की थी। उसमें महरंग बलोच का भी नाम था। महरंग के परिचय में बीबीसी ने उनके साहस की प्रशंसा की है। बीबीसी ने लिखा है कि कैसे एक सरल सी लड़की का जीवन उसके पिता के अपहरण और फिर दो सालों के अत्याचारों के बाद हत्या के कारण पूरी तरह से बदल गया। वैसे तो उन्होनें बचपन से ही अपने समुदाय का दमन देखा था।

उन्होनें उन सैकड़ों महिलाओं का नेतृत्व किया था, जो अपने परिजनों के विषय में पता करने के लिए पाकिस्तान कि राजधानी इस्लामाबाद गई थीं। महरंग को उस यात्रा में दो बार गिरफ्तार किया गया था।

महरंग पेशे से एमबीबीएस डॉक्टर हैं, जो अब बलोच याकजेहती कमेटी की प्रमुख हैं। मानवाधिकार के क्षेत्र में उनके काम को उभरते हुए नेताओं की ‘TIME100 Next 2024’ सूची में भी स्थान दिया गया था।

फेमिनिस्ट और प्रगतिशील लोगों की वाल पर सन्नाटा

महरंग बलोच की इस गिरफ़्तारी को लेकर सोशल मीडिया से लेकर जमीन पर मानवाधिकार संगठनों और आम लोगों में गुस्सा है और लोगों का कहना है कि जब उन्होनें इस पूरी एकतरफा कार्यवाही का बहिष्कार कर रखा था तो फिर सजा कैसे सुना दी गई? दरअसल महरंग जिस संगठन की प्रमुख हैं, उसी के विरोध प्रदर्शन के दौरान 2024 में ग्वादर में एक सुरक्षा अधिकारी की मौत हो गई थी, जिसका उन्हें दोषी ठहराया गया है। उन्हें वर्ष 2025 में मार्च में गिरफ्तार किया गया था और वे तब से क्वेटा की जेल में बंद थी।

उन पर लगे हुए आरोपों को भी लोगों ने राजनीति से प्रेरित बताया था।

अब प्रशन यह उठता है कि इतनी बड़ी नेता और महिला व्यक्तित्व होने के बाद भी उनकी गिरफ़्तारी का समाचार या विमर्श न ही भारत के कथित प्रगतिशील और फेमिनिस्ट महिलाओं तक पहुँच रहा है और न ही पूरे विश्व में महिलाओं की आवाज उठाने वाली मलाला तक।

हालांकि ग्रेटा ने इस गिरफ़्तारी के खिलाफ आवाज उठाई है और टिकटोक पर उसने एक वीडियो में महरंग बलोच के लिए कहा है कि यह मामला व्यक्तिगत विरोध का नहीं है, बल्कि यह मामला है कि जब शांतिपूर्ण विरोध को एक अपराध माना जाता है और जो आवाज उठाता है उसे शांत कराया जाता है। ग्रेटा ने कहा कि दबाव से आप सच को नहीं दबा सकते हैं।

मगर ग्रेटा के इस वीडियो के साथ ही लोग यह प्रश्न कर रहे हैं कि पाकिस्तान की ही मलाला कब अपनी आवाज महरंग के लिए उठाएंगी। हालांकि जब महरंग को हिरासत में लिया गया था, तब मलाला ने इस हिरासत का विरोध किया था। मगर यह भी प्रश्न उठता है कि मलाला अपने मुल्क पाकिस्तान में बलूच, हिन्दू, सिख और ईसाई लड़कियों पर हो रहे अत्याचारों पर आवाज क्यों नहीं उठाती हैं? मलाला की सिलेक्टिव चुप्पी को लेकर अक्सर ही प्रश्न उठते रहते हैं और अब यह और भी अधिक हैं।

बहरहाल, यह प्रश्न तो भारत की फेमिनिस्ट महिलाओं से भी पूछा जाना चाहिए कि आखिर भारत में महरंग बलोच को लेकर आवाज क्यों नहीं उठ रही है?

 

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