सभी संवैधानिक अधिकारों को कुचलते हुए 25 जून, 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश पर आपातकाल थोपा था। यह आपातकाल 21 मार्च, 1977 तक रहा। इस दौरान लोगों को घरों से उठा-उठा कर कारागृहों में बंद किया गया। पुलिस की पकड़ में आने वालों को ऐसी-ऐसी यातनाएं दी गईं कि उन्हें सुनकर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की नीतियों और भ्रष्टाचार के विरोध में व्यापक जन-आंदोलन चलाने के लिए लोकनायक जयप्रकाश नारायण (जेपी) ने ‘लोक संघर्ष समिति’ का गठन किया था। इसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जनसंघ और अन्य विपक्षी दल शामिल थे। आपातकाल लगने के बाद इन सब संगठनों ने मिलकर सत्याग्रह शुरू किया। सत्याग्रह करने वाले कुल 1,30,000 सत्याग्रहियों में से 1,00,000 से अधिक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक थे। मीसा के अधीन जो 30,000 लोग बंदी बनाए गए, उनमें से 25,000 से अधिक संघ-संवर्ग के थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 कार्यकर्ता अधिकांशतः बंदीगृहों और कुछ बाहर आपातकाल के दौरान बलिदान हो गए। उनमें संघ के अखिल भारतीय व्यवस्था प्रमुख श्री पांडुरंग क्षीरसागर भी थे। आपातकाल में उन्हें ठाणे जेल में रखा गया। ठाणे का मौसम उनके लिए अनुकूल नहीं था। इस कारण वे बीमार हो गए। उन्होंने शासन को अपना स्थान बदलने का आवेदन दिया, जो व्यर्थ गया और अंततः 23 सितंबर, 1976 को उसी जेल में उनका देहांत हो गया।
सबसे आगे स्वयंसेवक
पुस्तक ‘जनसंहार बनाम आपातकाल : संघर्ष की गाथा’ के अनुसार, “आपातकाल के दौरान मीसा के अंतर्गत गिरफ्तार किए गए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों की संख्या 23,015 थी, जिनमें 22,938 पुरुष एवं 77 महिला कार्यकर्ता शामिल थे। आपातकाल के दौरान सत्याग्रह करने के कारण गिरफ्तार किए गए संघ कार्यकर्ताओं की संख्या 44,965 थी, जबकि अन्य दलों के केवल 9,655 लोगों ने सत्याग्रह किया था।
संघ ने अपनी संगठनात्मक व्यवस्था की दृष्टि से महाराष्ट्र राज्य को नागपुर, विदर्भ और महाराष्ट्र, इन तीन प्रांतों में बांटा हुआ है। चूंकि लोक-संघर्ष का मुख्य उत्तरदायित्व संघ को ही निभाना था इसलिए लोक संघर्ष समिति ने संघर्ष चलाने हेतु इसी रचना को मान्य कर लिया था। नागपुर और विदर्भ, दोनों को मिलाकर सत्याग्रह के दौरान कुल 2,378 लोग गिरफ्तार हुए, जिनमें से 34 को छोड़ कर सभी संघ परिवार के थे। जिन 2044 कार्यकर्ताओं ने सत्याग्रह करके अपनी गिरफ्तारी दी उनमें 1767 पुरुष व 328 महिलाएं थीं। इस क्षेत्र के 166 गांवों से आए सत्याग्रहियों ने 215 जत्थों में 69 केंद्रों पर सत्याग्रह कर अपनी गिरफ्तारी दी। सत्याग्रह सभी आठ जिलों में निरंतर चलता रहा। इस संख्या में नागपुर नगर के 550 सत्याग्रही भी शामिल थे। नागपुर में 45 जत्थों में 40 केंद्रों पर सत्याग्रह हुआ।
सरसंघचालक जी का मार्गदर्शन आपातकाल की घोषणा होते ही संघ नेतृत्व ने श्रीमती गांधी के इरादों को भांप लिया था। इसलिए अपनी गिरफ्तारी (30 जून) के पूर्व ही सरसंघचालक श्री बालासाहब देवरस ने आवाहन किया, “प्रयाग उच्च न्यायालय के निर्णय के कारण दुर्भाग्य से प्रधानमंत्री अपना संतुलन खो बैठी हैं। परिणामस्वरूप आपातस्थिति की घोषणा कर दी गई है। जन नेताओं को बंदी बनाया गया है तथा समाचार पत्रों पर बंधन लगाए गए हैं। इन कार्यवाहियों से लोकतंत्रात्मक पद्धति पर आघात हुआ है और जनता के मूलभूत अधिकारों का हनन हुआ है। इस असाधारण परिस्थिति में स्वयंसेवकों का दायित्व है कि वे अपना संतुलन न खोयें। सरकार्यवाह माधवराव जी मुले तथा उनके द्वारा नियुक्त अधिकारी के आदेशानुसार संघ-कार्य जारी रखें तथा यथापूर्व जनसंपर्क, जनजागृति और जनशिक्षा का कार्य करते हुए अपने राष्ट्रीय कर्तव्य का पालन करने की क्षमता जनसाधारण में निर्माण करें।’’
निशाने पर संघ 27 जून, 1975 को श्रीमती गांधी ने केंद्रीय सचिवालय के अधिकारियों की विशेष बैठक में कहा, “इन सब मामलों की जड़ संघ है।’’ दूसरी ओर कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने युवा कांग्रेस के पदाधिकारियों के सम्मेलन में कहा था, “हम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को पूर्णतः नष्ट करना चाहते हैं। इन लोगों को पुनः संगठित होने का अवसर नहीं देना चाहिए।’’ इन बयानों से यह स्पष्ट हो जाता है कि वे लोग संघ को अपने मार्ग की सबसे बड़ी बाधा मानते थे। यही कारण है कि 4 जुलाई, 1975 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ऊपर प्रतिबंध लगा दिया गया। देशभर में, आपातकाल की घोषणा के साथ ही जहां आंदोलनकारी राजनीतिक दलों के प्रमुख नेताओं को ही पकड़ा गया था, वहां संघ के छोटे से छोटे स्तर के कार्यकर्ताओं को भी हजारों की संख्या में बंदी बनाया गया। जिन 26 संस्थाओं को प्रतिबंधित किया गया था, उनमें संघ ही एकमात्र देशव्यापी प्रभावी संगठन था। बाकी सभी संस्थाएं सीमित क्षेत्रों में कार्यरत थीं। ये सभी तथ्य हमें इसी निर्णय पर पहुंचाते हैं कि श्रीमती गांधी का मुख्य निशाना संघ था। संघ के अधिकारियों ने इंदिरा जी की चाल का रहस्य समझ लिया था। उन्होंने यह विचार किया कि यह संघर्ष केवल राजनीतिक ही नहीं है, वरन् यह तो जीवन—मूल्यों की रक्षा का संघर्ष है। इसलिए उन्होंने अपना पूर्ण बल लगाकर देश पर छाये महासंकट का सामना करने का निश्चय किया।
आपातकाल के दौरान एक बैठक में श्री बालासाहब देवरस और श्री जयप्रकाश नारायण
बालासाहब जी के पत्र
आपातकाल लागू होने के दो महीने बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक श्री बालासाहब ने तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को एक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने कहा कि संघ पर लगाए गए सभी आरोप असत्य हैं और संघ पर लगा प्रतिबंध हटाने का अनुरोध किया। उस पत्र का कोई उत्तर नहीं मिला। इसके लगभग तीन महीने बाद उन्होंने दूसरा पत्र लिखा। इस पत्र में उन्होंने श्रीमती गांधी के निर्वाचन की वैधता सिद्ध होने पर उन्हें बधाई दी, साथ ही यह भी दोहराया कि समाज के उत्थान का कार्य आपसी विभाजन के वातावरण में नहीं किया जा सकता। उन्होंने पुनः आग्रह किया कि वे संघ के प्रति अपने पूर्वाग्रह त्यागें और प्रतिबंध हटा दें। इसके अतिरिक्त दो अन्य पत्र विनोबा भावे को लिखे गए, जिनमें उनसे अनुरोध किया गया कि वे श्रीमती गांधी को वास्तविक स्थिति समझाएं और संघ पर लगा प्रतिबंध हटवाने का प्रयास करें।
समाधान के लिए संवाद
लेकिन इन पत्रों को लेकर भारतीय लोक दल (बीएलडी) के कुछ सदस्यों ने भ्रम फैलाने की कोशिश की। इन लोगों ने इन लंबे पत्रों के केवल पहले और अंतिम अनुच्छेदों को प्रचारित किया, ताकि यह आभास दिया जा सके कि संघ ने ‘समझौता’ कर लिया था। कुछ लोगों ने बालासाहब जी द्वारा श्रीमती गांधी को उनके विवादास्पद निर्वाचन-वैधीकरण पर बधाई देने की आलोचना भी की। परंतु तथ्य यह है कि लोक संघर्ष समिति, जिसमें बीएलडी भी सम्मिलित थी, पहले ही श्रीमती गांधी के निर्वाचन की वैधता को स्वीकार कर चुकी थी और औपचारिक रूप से उनके इस्तीफे की मांग वापस ले चुकी थी।
इन पत्रों को लिखने के कारण की व्याख्या करते हुए बालासाहब जी ने कहा कि इसमें कुछ भी गलत नहीं था। उन्होंने कहा, “आपातकाल के सभी बंदियों में से 80 प्रतिशत संघ के स्वयंसेवक थे। क्या मेरा उनके और उनके परिवारों के प्रति कोई दायित्व नहीं था? यदि मैंने सम्मानजनक समाधान के लिए सरकार से संवाद स्थापित करने का प्रयास किया, तो उसमें गलत क्या था?’’ तथ्य यह है कि महात्मा गांधी भी किसी आंदोलन की शुरुआत के तुरंत बाद वायसराय को पत्र लिखते थे, ताकि संवाद का मार्ग खुला रहे।
बालासाहब जी का दूसरा पत्र 10 नवंबर, 1975 का था, और केवल चार दिन बाद संघ ने ऐसा सत्याग्रह प्रारंभ किया जिसमें पूरे देश में 80,000 स्वयंसेवक जेल गए और जिसने आपातकालीन सरकार को झकझोर दिया। स्पष्टतः बालासाहब किसी व्यक्ति या सिद्धांत से समझौता नहीं कर रहे थे। वे केवल सरकार को सम्मानजनक ढंग से पीछे हटने का अवसर दे रहे थे।
नानाजी को मिला दायित्व
लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने अपनी गिरफ्तारी के पूर्व लोक संघर्ष समिति को चलाने का उत्तरदायित्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक नानाजी देशमुख के कंधों पर सौंपा।
संघ के प्रति पूर्वाग्रह रखने वाले किसी नेता या दल ने इसका विरोध नहीं किया था। सबने उसे सहर्ष स्वीकारा था। इंदिरा गांधी द्वारा किए गए अनर्गल प्रचार के बाद भी किसी ने इस नेतृत्व के औचित्य पर अंगुली नहीं उठायी थी। यही नहीं, नानाजी की गिरफ्तारी के बाद जब नेतृत्व का प्रश्न उपस्थित हुआ तब सभी दलों के नेताओं का यह आग्रह था कि चूंकि संघर्ष का मुख्य भार संघ को निभाना है इसलिए यह उत्तरदायित्व ऐसे व्यक्ति को सौंपना चाहिए जो संघ से जुड़ा हुआ हो।
नानाजी की गिरफ्तारी
नानाजी देशमुख के नेतृत्व में ही नवंबर मास से प्रारंभ होने वाले विशाल सत्याग्रह का निर्णय लिया जा चुका था और उस दृष्टि से सारे देश में तैयारियां शुरू हो गई थीं। किंतु इसी बीच में लोक संघर्ष समिति को एक बड़ा धक्का लगा। 15 अगस्त के सत्याग्रह के कार्यक्रम के बाद जब लोक संघर्ष समिति आगामी योजना पर विचार कर रही थी, तभी 29 अगस्त को नानाजी को गिरफ्तार कर लिया गया। नानाजी का पुलिस की गिरफ्त में न आना सरकार के लिए एक सिरदर्द बना हुआ था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का जीवनव्रती प्रचारक, लोक संघर्ष समिति का नेतृत्व कर रहा है, यह बात ही इंदिरा जी को परेशान कर रही थी। नानाजी गिरफ्तार हुए और शासन ने सोचा कि अब यह आंदोलन ठप हो जाएगा, किंतु आंदोलन अबाध गति से चलता रहा।
अभाविप की भूमिका
आपातकाल का विरोध करने में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् (अभाविप) की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण थी। पुणे में विनय सहस्रबुद्धे उनके सचिव थे। उन्होंने अपने वृत्त में लिखा है, “विद्यालय-महाविद्यालयों में, मध्याह्न में जो छुट्टी रहती है ठीक उसी समय सत्याग्रह किया जाता था।
बहुधा पटाखों की तेज आवाज से वह प्रारंभ होता था। फिर नारे लगते थे, पर्चे बंटते थे और भाषण होते थे। भाषणों में कहा जाता था, “आइए संघर्ष में सहभागी होइए। अन्याय और अत्याचार से लड़ना हर किसी का कर्तव्य है। आज हमारे देश में जनतंत्र को खतरा पैदा हुआ है। तानाशाही का नंगा नाच हो रहा है। कल आप पर बीतेगी, तब पश्चात्ताप करना पड़ेगा। अतः हे युवक वीरो, हमारा साथ देकर देश की सेवा कीजिए।’’ इस तरह आपातकाल की विदाई में संघ के स्वयंसेवकों की सबसे बड़ी भूमिका रही। कल्पना कीजिए कि यदि आपातकाल का विरोध संघ परिवार नहीं करता तो आज भारत में लोकतंत्र की क्या स्थिति रहती!
उल्टा लटकाया, बिजली के झटके दिए
इंदौर नगर के एक सत्याग्रही जत्थे का नेतृत्व विष्णुपंत खाम्बेटे ने किया था। गोविंद चौरसिया, रतन वैष्णव और यशोधर जैन उनके साथी थे। पहले उन्हें बुरी तरह पीटा गया। वे बेहोश हो गए। भयंकर सर्दी में नंगे शरीर उन्हें फर्श पर पटक दिया गया। साथ ही बाल नोचना, करेंट लगाना भी चालू रहा। ठंडे पानी के हौज में लिटाकर उस पानी में बिजली का करेंट छोड़ा गया। इन सारी यातनाओं के मध्य वे अनेक बार बेहोश हुए। होश में आने के बाद फिर उन पर अत्याचार किए गए। बेहोशी की अवस्था में ही उन्हें मीसा बंदी बनाकर जेल में भेज दिया गया।
मध्य प्रदेश विद्यार्थी परिषद् के संगठन मंत्री तथा लोक संघर्ष समिति, इंदौर के सचिव चंपालाल यादव को पहले सामान्य पिटाई के द्वारा अधमरा कर दिया गया। बाद में उन्हें रस्सी से बांध कर निर्वस्त्र अवस्था में छत से उल्टा लटकाया गया। उनके चेहरे पर सूजन आने पर उन्हें उतारा गया। इसके बाद हाथ-पैर व गुप्तांगों में बिजली के झटके दिए गए। यह क्रम कई दिनों तक चलता रहा। इसके बाद उन्हें जेल भेजा गया। वहां वे महीनों तक अपने हाथों से कुछ भी काम नहीं कर पाते थे, इतने वे दुर्बल हो गए थे।
होशंगाबाद जिला विद्यार्थी परिषद् के संगठन मंत्री शंभू सोनकिया ने अपनी आपबीती में बताया है, “हम 6 कार्यकर्ताओं ने 20 जनवरी, 1976 को भोपाल में सत्याग्रह किया। हमें पकड़कर सर्राफा बाजार पुलिस चौकी ले जाया गया। रात को हमें नंगा कर एक अंधेरी कोठरी में बंद कर दिया। कड़ाके की ठंड और उस पर सीमेंट का फर्श। न कुछ ओढ़ने को न बिछाने को। भोजन व पानी का तो प्रश्न ही नहीं।’’
भारतीय युवा संघ के प्रादेशिक सचिव तेज सिंह सेंधव ने पांच साथियों के साथ सत्याग्रह किया। इन सभी को बिजली के झटके लगाने से लेकर उल्टे टांगने तक की यातनाओं में से तो गुजरना ही पड़ा, गीले कंबल से ढककर दम घोंटने की भयानक यातनाओं का भी उन्हें सामना करना पड़ा। कड़ाके की सर्दी में उन्हें बर्फ की सिल्ली पर लिटाया गया।
उज्जैन में अभाविप के 18 वर्षीय कार्यकर्ता राजेंद्र कुमार कड़ेल को 19 जुलाई, 1975 को सत्याग्रही के रूप में गिरफ्तार किया गया। रात भर वह पीटा जाता रहा। संगीनों की नोकें उसकी देह में चुभोयी गईं। उसे बिजली का करंट लगाया गया। इन यातनाओं के कारण वह बेहोश हो गया। उसी हालत में उसे अति प्रभात में घर पर पहुंचाया गया। घर वालों को चेतावनी दी गई कि इसे आठ बजे तक कोतवाली पहुंचा देना। राजेंद्र के दो बड़े भाई विजय और अशोक मीसा के अंतर्गत पहले ही बंद किए जा चुके थे। राजेंद्र को पुलिस की सूचना के अनुसार आठ बजे कोतवाली पहुंचा दिया गया। वहां लगातार सात दिन तक उसे कठोर यातनाएं दी जाती रहीं। सात दिन में केवल दो बार उसे भोजन मिला। उसे सोने नहीं दिया गया। बस बेहोशी की अवस्था ही उसे नींद का सुख देती थी। आपातकाल के दौरान इस किशोर छात्र को पंद्रह बार अलग-अलग आरोपों में गिरफ्तार किया गया और हर बार उसे इन्हीं यातनाओं से गुजरना पड़ा।
उज्जैन के स्वयंसेवक राजेंद्र शिंदे पर हुए अत्याचारों की कहानी भी रोंगटे खड़े करने वाली है। 14 नवंबर को राजेंद्र ने सत्याग्रह किया। गिरफ्तारी के बाद उन्हें बुरी तरह पीटा गया। बेहोशी की अवस्था में उन्हें कोठरी में पटक दिया गया। न भोजन दिया गया, न पानी। अर्ध बेहोशी की अवस्था में उन्हें भैरागढ़ जेल भेज दिया गया। मीसा बंदियों द्वारा भूख हड़ताल करने पर उन्हें अस्पताल में भर्ती किया गया, किंतु बिना इलाज ही उन्हें जेल में वापस ले आया गया। ऐसा कई बार हुआ।
छात्र सुबोध गोयल ने ग्वालियर के तानसेन समारोह के अवसर पर मुख्यमंत्री सेठी की उपस्थिति में मंच पर चढ़कर नारे लगाए थे। उसे तत्काल बंदी बनाया गया। उसके पिताजी एक प्रख्यात वकील हैं। उन्होंने पुलिस अधिकारी को कहा, “इसकी पिटाई जितनी भी करो, परंतु इसे मीसा में मत भेजो।’’ उस बालक की इतनी भयंकर पिटाई की गई कि वह पागल होकर ही हवालात से बाहर आया और उसी अवस्था में दो वर्ष की जिंदगी बिताकर भगवान को प्यारा हो गया। वह अपने पिता का इकलौता पुत्र था। मध्य प्रदेश पुलिस ने लगभग 700 लोगों को यातनाओं का शिकार बनाया।
27 सितंबर, 1975 को मोतीलाल जालान को गिरफ्तार कर गुवाहाटी के पूछताछ-केंद्र पर लाया गया। हाथ ऊपर बाँध कर उसी स्थिति में घंटों रखा गया, घंटों तक मुर्गा बनाया गया। नाक में पाइप घुसेड़ कर यातना दी गयी। उसके हाथ के नाखूनों में पिनें चुभोयी गयीं। इन यातनाओं के कारण तथा अन्न-जल न मिलने के कारण वह कई बार बेहोश हो गया। वह बहादुर बालक सब कुछ सहता रहा, परंतु उसने किसी प्रकार का भेद पुलिस को नहीं बताया।
बिहार प्रदेश लोक संघर्ष समिति के आदेश के अनुसार 9 अगस्त, 1975 को क्रांति-दिवस के रूप में मनाने के लिए बंद का आह्वान किया गया। बिहार बंद आंशिक रूप से सफल रहा। समूचे प्रांत में लगभग 500 व्यक्ति गिरफ्तार किए गए। पटना में संघ के सह-प्रांत संघचालक भोलानाथ झा 7 स्वयंसेवकों के साथ दमन विरोधी पर्चे बांटते हुए बंदी बनाए गए। जमशेदपुर में मजदूर नेता दीनानाथ पांडेय ने कचहरी में खड़े होकर तानाशाही शासन के खिलाफ भाषण देकर आतंक को चुनौती दी। जब भारी भीड़ में उनका भाषण समाप्त हुआ, तब पुलिस उनके पास जा सकी और डी.आई.आर. में वे गिरफ्तार किए गए।
बांका में जनसंघ, विद्यार्थी परिषद् तथा संघर्ष समिति के 14 कार्यकर्ताओं ने जुलूस निकाला। चौक पर नुक्कड़ सभा की। रात्रि को मशाल जुलूस निकाला और तब जनार्दन प्रसाद यादव के नेतृत्व में तीन कार्यकर्ता बंदी बने।
आपातकाल के दौरान तत्कालीन सरकार्यवाह श्री माधवराव मुले ने स्वयंसेवकों से इसका विरोध करने का आह्वान किया था-

प्रिय बंधुगण,
संघ पर प्रतिबंध गत चार माह के राष्ट्रीय घटनाचक्र से आप सब परिचित हैं। 26 जून को आपातस्थिति की घोषणा की गई। इसके पहले ही 25 जून को देश के सर्वमान्य जन नेताओं की अंधाधुंध गिरफ्तारियां प्रारंभ की गईं। समाचार पत्रों की स्वतंत्रता समाप्त कर दी गयी। 30 जून को हमारे सरसंघचालक को बंदी बना लिया गया। 4 जुलाई को संघ पर प्रतिबंध लगाकर उसके लगभग 10,000 कार्यकर्ता गिरफ्तार कर लिए गए। यह सारा घटनाक्रम स्पष्ट करता है कि संघ पर लगाया प्रतिबंध लोकतंत्र की हत्या के षड्यंत्र की श्रृंखला की एक कड़ी है…. वास्तव में तानाशाही लादने की बृहत योजना का अंग है।……. देश की लोकतांत्रिक शक्तियां इस स्थिति से व्यग्र हैं। शासन ने जानबूझकर जनता पर संघर्ष थोपा है। जनता ने भी सरकार की इस चुनौती को स्वीकार किया है। घोर दमन के बावजूद स्थान-स्थान पर संवैधानिक प्रतिकार भी प्रारंभ कर दिया है। लोकतंत्र में आस्था रखने वाले सभी भारतीयों का यह पवित्र कर्तव्य है कि देशव्यापी जनसंघर्ष के राष्ट्रीय यज्ञ में वे भी आहुति डालें।. …
धर्मक्षेत्र की ओर प्रस्थान करने वाले वीरव्रती बनकर सफलता का पूर्ण विश्वास लेकर हम आगे बढ़ें। ईश्वरीय कार्य की ध्वजा हमारे कंधों पर है। असंख्य ऋषियों की तपस्या का तथा बलिदानी वीरों के हौतात्म्य का पुण्यबल हमारे पीछे है। मदांध आसुरी सत्ता से पीड़ित कोटि-कोटि देशबंधुूओं की सद्भावना हमारे साथ है। भारत माता को परम वैभव तक पहुंचाने का प.पू.डा. जी का दिया हुआ उदात्त ध्येय हमारे सामने है और हमारे हृदयों में अंकित हैं प.पू. श्री गुरुजी के अन्तिम आशीर्वचन। अब इसके पश्चात् विजय ही विजय है।
भारत माता की जय।
मातृसेवा में आपका ही
-माधवराव मुले
संविधान हत्या दिवस
विश्नोई के उखाड़े नाखून
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता हेमंत कुमार विश्नोई के साथ क्रूरता की सारी हदें पार कर दी गई थीं। उन्हें दिल्ली में मीसा के अंतर्गत गिरफ्तार किया गया था। बुरी तरह पीटने के बाद उनके हाथ के नाखून तक उखाड़ लिए गए थे। इतनी क्रूरता के बाद भी पुलिस उनके मनोबल को तोड़ नहीं पाई। वे ‘भारत माता की जय’ के नारे के साथ यातनाएं सहते रहे। जेल से बाहर आने के बाद वे पत्रकार बने और वर्षों तक राष्ट्रीय विचारों को फैलाया। अब वे इस दुनिया में नहीं हैं।
जॉर्ज फर्नांडिस की गिरफ्तारी
आपातकाल का विरोध करने वालों में एक प्रमुख नेता थे जॉर्ज फर्नांडिस। आपातकाल लगते ही वे भूमिगत होकर जनजागरण में लग गए। 10 जून, 1976 को उन्हें ‘बड़ौदा डायनामाइट कांड’ में कथित संलिप्तता के लिए गिरफ्तार किया गया। सरकार का कहना था कि यह कांड आपातकाल के विरुद्ध केंद्र सरकार को अस्थिर करने का एक कथित षड्यंत्र था।
गिरफ्तार करने के बाद जॉर्ज फर्नांडिस के एक हाथ में हथकड़ी लगा दी गई थी। जब पुलिस उन्हें अपनी गाड़ी में बैठा रही थी, तभी उन्होंने हथकड़ी बंधे हाथ की मुट्ठी को बांधकर हवा में लहराया। उनका यह चित्र आज भी लोगों को आकर्षित करता है।

नानाजी देशमुख, जिन्होंने जेपी के बाद लाेक संघर्ष समिति की कमान संभाली
लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने अपनी गिरफ्तारी के पूर्व लोक संघर्ष समिति को चलाने का उत्तरदायित्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक नानाजी देशमुख के कंधों पर सौंपा।

















