मौलाना सज्जाद नोमानी द्वारा हिन्दुओं के अल्पसंख्यक और मुस्लिमों के बहुसंख्यक होने का दिया गया बयान पूरी तरह से उनकी हताशा को प्रदर्शित करता है। मौलाना सज्जाद नोमानी ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य हैं। हाल ही में पश्चिम बंगाल और असम के विधानसभा चुनाव परिणाम के बाद उन जैसे लोगों के पैरों तले जमीन खिसक गई है। उन्हें पश्चिम बंगाल पर बहुत विश्वास था कि वहां पर ममता बनर्जी की सरकार बनी रहेगी लेकिन 2026 के बंगाल विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी की बुरी हार और भाजपा की बड़ी जीत ने इन जैसे लोगो के इरादों पर पानी फेर दिया है।
नोमानी जैसे लोगों को इसलिए है परेशानी
नोमानी जैसे लोगों को पश्चिम बंगाल में सुवेंदु अधिकारी और असम में हिमंत बिस्वा सरमा द्वारा उठाये जाने वाले कदमों से ज्यादा परेशानी हो रही है, लेकिन वह खुलकर विरोध करने या कुछ भी बोलने की स्थिति में नहीं हैं। उन्हें इससे भी परेशानी है कि भाजपा एक बार जहां भी सत्ता संभालती है वहां वह लम्बे समय के लिए रहती है। गुजरात इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। इसके अलावा भाजपा असम, हरियाणा में लगातार तीसरी बार सरकार बनाने के साथ ही उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड जैसे महत्वपर्ण प्रदेशो में लगातार दो बार चुनाव जीत चुकी है। तीसरी बार बिना किसी रुकावट के चुनाव जीतने की ओर बढ़ रही है। भाजपा त्रिपुरा, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश जैसे पूर्वोत्तर राज्यों में अपनी सरकार बार-बार बनाकर नोमानी जैसे लोगों की चिंता की लकीर को लम्बी करती जा रही है। भाजपा ने ओडिशा और दिल्ली में भी सरकार बनाने में सफलता प्राप्त की है। भाजपा जहां अपना दायरा बढ़ाती जा रही है वही कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों का कुनबा सिमटता जा रहा है।
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के मौलाना सज्जाद नोमानी का हिंदुओं को भारतवर्ष में अल्पसंख्यक घोषित करने के पीछे का मकसद मजहबी है। मजहबी इस हिसाब से कि इस्लाम में अकलियत को कोई अधिकार नहीं है।
नोमानी के फतवे से वातावरण हुआ था विषाक्त
भारत में नोमानी ने हिंदुओं को संकुचित करने वाला बयान दिया है। उन्होंने महाराष्ट्र चुनाव के समय एक फतवा जारी किया था और कहा था कि सारे मुसलमानों को शरद पवार वाली एनसीपी, उद्धव ठाकरे वाली शिवसेना और कांग्रेस के पक्ष में मतदान करना चाहिए। यह भी कहा था कि जो मुस्लिम कार्यकर्ता भाजपा के साथ संबंधित है उन सबका बहिष्कार करना चाहिए। नोमानी के वक्तव्य के कारण वातावरण विषाक्त हो गया था। इसके कारण भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा के जमाल सिद्दीकी ने एक क्रिमिनल शिकायत भी कराई थी।
सज्जाद नोमानी का वक्तव्य आज के परिप्रेक्ष्य में बहुत महत्वपूर्ण है। पश्चिम बंगाल में हिंदू एकता का एक व्यापक दृश्य देख लिया है और हिंदू एकता से कट्टरपंथी मुसलमानों में और खासकर अशराफ वर्ग को काफी परेशानी होती है।
पश्चिम बंगाल कट्टरपंथियों के लिए था अनुकूल
पश्चिम बंगाल कट्टरपंथी इस्लामियों के लिए एक दुःस्वप्न की तरह है, क्योंकि उनका अंतिम उद्देश्य पश्चिम बंगाल और सम्पूर्ण पूर्वोत्तर भारत के राज्यों पर अपना वर्चस्व स्थापित करना था। इसमें इन लोगों को पश्चिम बंगाल की जनसांख्यिकी काफी सहयोगात्मक लग रही थी। पश्चिम बंगाल में उनके बहुत सारे प्रयोग सफल हो रहे थे। इन लोगों ने पश्चिम बंगाल के साथ ही असम और पूर्वोत्तर के कई अन्य राज्यों की जनसांख्यिकी को अपने पक्ष में बदलने में बहुत हद तक सफलता प्राप्त कर ली थी। पश्चिम बंगाल में विभाजन के समय मुसलमानो की आबादी 14% थी जो अब बढ़कर लगभग दुगुनी 27% तक पहुंच गई है। कुल आबादी के हिसाब से मुस्लिमों की जनसंख्या 1952 के अपेक्षा लगभग पांच गुना हो चुका है। इस जनसांख्यिकी परिवर्तन में बांग्लादेशियों का बड़ा योगदान था। बहुत बड़ा नेटवर्क बांग्लादेशियों को बंगाल और देश के अन्य हिस्सों में बसा रहा था, जिससे न सिर्फ मतदाताओ का समीकरण बदल रहा था बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा पर भी गंभीर सवाल उठ रहा था।
नोमानी जैसे लोगों को विश्वास था कि जिन भी प्रदेशों में मुसलमानों की जनसंख्या 25% हो जाएगी तो मुस्लिम मतदाता ही सरकार का स्वरूप तय करेगा। इन लोगों का यह प्रयोग यद्यपि असम में असफल हो चुका था जहां 35% मुसलमान होने के बावजूद भाजपा स्पष्ट बहुमत के साथ सरकार बनाने में सफल हुई।
जैसे-जैसे हिंदुओं में चेतना जागृत होती जा रही हैं वैसे वैसे नोमानी जैसो की परेशानी बढ़ती जा रही है। पश्चिम बंगाल और असम राज्यों ने इन जैसे की रातो की नींद हराम कर दी है। उन्हें लग रहा था की हमेशा राजनीतिक दल मुसलमान वोट के लिए उनके शर्तों पर चलने को मजबूर होगा। मगर अब इन सभी को पुनर्विचार करना पड़ रहा है क्योंकि हिंदू वर्ग अब वोट और अन्य तरीको से कट्टरपंथियों का प्रतिकार कर रहा है।














