
रूस से कच्चा तेल खरीदने के फैसले के लिए पश्चिमी मीडिया अक्सर भारत को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश करता रहता है। इसकी क्या वजह है और इस पर भारत का क्या रुख है इसका जवाब हाल ही में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने दिया है।
उन्होंने यह जवाब फिनलैंड में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान दिया जब यूरोपीय पत्रकारों ने यूक्रेन युद्ध और रूसी तेल आयात को लेकर भारत की नैतिकता पर सवाल उठाने की कोशिश की। तब विदेश मंत्री ने न केवल भारत के रुख को दृढ़ता से सही ठहराया बल्कि पश्चिमी देशों के दोहरे चरित्र और पाखंड को बेनकाब कर दिया।
दरअसल, फिनलैंड में गुरुवार को आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान एक पश्चिमी पत्रकार ने भारत पर रूस के प्रति जरूरत से ज्यादा सहानुभूति रखने और युद्ध के बावजूद रूसी तेल खरीदने के लिए उतावला होने जैसे गंभीर और एकतरफा आरोप लगाए। जैसा कि अक्सर विदेशी मीडिया करता रहता है, लेकिन हर बार की तरह इस बार भी भारत ने दृढ़ता से अपना पक्ष सामने रखा। इन आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हुए विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने बेहद कड़े और नपे-तुले शब्दों में यूरोप और अमेरिका को आईना दिखाया।
रूस और यूक्रेन युद्ध में भारत की नैतिकता और मानवीय दृष्टिकोण पर सवाल उठाने वालों को जवाब देते हुए जयशंकर ने कहा, ‘मैं यहां एक बात पूरी तरह साफ कर देना चाहता हूं। आज तक के इतिहास में किसी भी यूरोपीय देश पर भारतीय हथियारों से कोई हमला नहीं हुआ है। काश, मैं यही बात भारत के संदर्भ में यूरोप के हथियारों को लेकर भी कह पाता।’
उन्होंने आगे बिना किसी झिझक के पश्चिमी देशों पर प्रहार करते हुए कहा कि सच तो यह है कि यूरोप पिछले कई दशकों से दुनिया के ऐसे देशों और ताकतों को आधुनिक हथियार बेचता आया है, जिनका इस्तेमाल सीधे तौर पर भारत की संप्रभुता को नुकसान पहुंचाने और भारत पर आतंकवादी व सैन्य हमलों के लिए किया जाता रहा है। जयशंकर ने जोर देकर कहा कि हम भारतीयों ने कभी भी यूरोप की सुरक्षा और शांति को खतरे में डालने वाला कोई काम नहीं किया, इसलिए भारत की नैतिकता पर सवाल उठाने का हक किसी भी देश को नहीं है।
रूसी तेल खरीदने के भारत के रणनीतिक रुख पर बात करते हुए विदेश मंत्री ने उन परिस्थितियों का खुलासा किया, जिन्होंने भारत को यह कदम उठाने पर मजबूर किया था। उन्होंने मीडिया को समझाया कि भारत का यह फैसला किसी राजनीतिक झुकाव का नतीजा नहीं बल्कि पूरी तरह से देश की आर्थिक और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा हुआ था।
उन्होंने बताया कि जब साल 2022 में रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध शुरू हुआ तब यूरोपीय देशों ने रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाने की घोषणा कर दी। इन प्रतिबंधों के बाद यूरोप ने अचानक रूस से तेल लेना बंद कर दिया और अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए मिडिल ईस्ट (जैसे सऊदी अरब और यूएई) की ओर चले गए।
यहां पेंच यह था कि मिडिल ईस्ट के ये देश हमेशा से भारत के पारंपरिक और मुख्य तेल सप्लायर रहे थे। जब यूरोप के अमीर देशों ने वहां से भारी मात्रा में तेल खरीदना शुरू किया तो वैश्विक बाजार में तेल की उपलब्धता कम हो गई और कीमतें आसमान छूने लगीं। ऐसी स्थिति में भारत के सामने अपनी 140 करोड़ से अधिक की आबादी को सस्ती और निर्बाध बिजली व ईंधन मुहैया कराने का बड़ा संकट खड़ा हो गया। बाजार के इसी गणित के कारण भारत को तेल की कीमत और उपलब्धता के आधार पर दूसरे विकल्प तलाशने पड़े और उस समय बाजार में रूस का तेल ही सबसे व्यावहारिक विकल्प के रूप में उपलब्ध था।
इस पूरे विवाद का सबसे दिलचस्प और हैरान करने वाला पहलू यह है कि एक तरफ जहां पश्चिमी मीडिया भारत की आलोचना कर रहा था, वहीं दूसरी तरफ अमेरिका खुद परदे के पीछे से चाहता था कि भारत रूस से तेल खरीदना जारी रखे। भारत पहले भी इस कूटनीतिक सच्चाई का खुलासा कर चुका है। जब 2022 में यूरोप ने रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाए, तब वैश्विक तेल बाजार में हाहाकार मचने और कच्चे तेल की कीमतें प्रति बैरल रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने का खतरा पैदा हो गया था। अगर भारत और चीन जैसे बड़े उपभोक्ता देश भी रूसी तेल खरीदना पूरी तरह बंद कर देते तो दुनिया भर में पेट्रोल-डीजल की कमी हो जाती और महंगाई पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को तबाह कर देती।
जयशंकर ने इस राज से पर्दा उठाते हुए बताया कि उस बेहद संवेदनशील वक्त में अमेरिका ने ही भारत से रूसी तेल खरीदने के लिए कहा था ताकि वैश्विक तेल बाजार को स्थिर रखा जा सके और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ईंधन की कीमतों को बेलगाम होने से रोका जा सके। इसका मतलब यह है कि एक तरफ जहां अमेरिका वैश्विक मंच पर प्रतिबंधों का नाटक कर रहा था, वहीं अपनी घरेलू अर्थव्यवस्था को महंगाई से बचाने के लिए वह भारत के जरिए रूसी तेल की सप्लाई चेन को बनाए रखना चाहता था।
पश्चिमी देश और अमेरिका कई बार भारत पर यह बेबुनियाद आरोप लगा चुके हैं कि भारत रूस से सस्ता तेल खरीदकर उसके युद्ध फंड (वॉर फंडिंग) को मजबूत कर रहा है। अमेरिका ने पिछले साल इसी तरह के भू-राजनीतिक दबाव बनाने के उद्देश्य से भारत के कुछ उत्पादों पर 50 फीसदी तक टैरिफ (अतिरिक्त शुल्क) भी लगा दिया था।
इसके बावजूद भारत सरकार ने बार-बार यह स्पष्ट किया है कि भारत एक संप्रभु राष्ट्र है और उसकी विदेश नीति किसी तीसरे देश के इशारे पर तय नहीं होगी। भारत अपनी विशाल आबादी की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने और देश के आर्थिक विकास को गति देने के लिए हर वो कदम उठाएगा जो उसके राष्ट्रीय हित में हो।