सामने आ रहा इतिहास का सच, कैसे मंदिर को ध्‍वस्‍त करके भारत में मस्‍जिदें बनाई गईं?
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सामने आ रहा इतिहास का सच, कैसे मंदिर को ध्‍वस्‍त करके भारत में मस्‍जिदें बनाई गईं?

गुजरात के भरूच जिले में स्थित ऐतिहासिक जामा (जुम्मा) मस्जिद एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में है।

Written byडाॅ. मयंक चतुर्वेदीडाॅ. मयंक चतुर्वेदी — edited by Mahak Singh
Jun 11, 2026, 04:03 pm IST
in भारत

गुजरात के भरूच जिले में स्थित ऐतिहासिक जामा (जुम्मा) मस्जिद एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में है। हाल ही में सामने आए एक वीडियो ने उस बहस को नया आयाम दे दिया है, जो वर्षों से इतिहासकारों, धार्मिक संगठनों और स्थानीय समुदायों के बीच चलती रही है। वीडियो में मस्जिद के तहखाने में भगवान गणेश, हनुमान और जैन धर्म के 19वें तीर्थंकर भगवान मल्लिनाथ से जुड़ी मूर्तियां मिली हैं।

भरूच के नवचौकी ओवारा स्थित शंकराचार्य मठ के महंत स्वामी मुक्तानंद ने वीडियो जारी करते हुए कहा कि जामा मस्जिद वास्तव में एक प्राचीन जैन समरी विहार थी, जिसे मध्यकालीन इस्लामिक आक्रमणों के दौरान मस्जिद में परिवर्तित कर दिया गया। 13वीं शताब्दी में अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के दौरान मूल जैन समरी विहार मंदिर को मस्जिद में परिवर्तित कर दिया गया था। उनका दावा है कि मस्जिद के स्तंभों पर आज भी जैन परंपरा की प्राचीन नक्काशी देखी जा सकती है। उनका दावा है कि लंबे संघर्ष और प्रस्तुतियों के बाद जब लगभग 700 वर्ष पुराना तहखाना खोला गया, तब वहाँ से विक्रम संवत 1213 की भगवान मल्लिनाथ की प्रतिमाएँ प्राप्त हुईं।

हिंदू-जैन पक्ष का दावा

हिंदू और जैन संगठनों का दावा है कि वर्तमान जामा मस्जिद का मूल स्वरूप एक भव्य जैन मंदिर था। उनके अनुसार 13वीं शताब्दी में अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल के दौरान हुए आक्रमणों में इस मंदिर को क्षतिग्रस्त कर मस्जिद में परिवर्तित कर दिया गया। वरिष्‍ठ पत्रकार हर्ष शाह का कहना है कि मस्जिद के स्तंभों और स्थापत्य में आज भी जैन एवं हिंदू कला की झलक दिखाई देती है। स्तंभों पर बनी नक्काशी, कमल आकृतियाँ और अन्य स्थापत्य तत्व इस दावे के समर्थन में प्रस्तुत किए जाते हैं।

इसे लेकर वहीं, स्वामी मुक्तानंद का कहना है कि इतिहास को लंबे समय तक दबाया जा सकता है, मिटाया नहीं जा सकता और तहखाने से सामने आई सामग्री उनके दावों को पुष्ट करती है, जिसके अनुसार ये प्राचीन मंदिर है और जिसे इस्‍लामिक आक्रान्‍ताओं ने जबरन मस्‍जिद में बदला है। दूसरी ओर मुस्लिम समुदाय इन दावों को अस्वीकार करता है। जामा मस्जिद ट्रस्ट से जुड़े अब्दुल कामठी का कहना है कि यह मस्जिद वर्ष 1907 से भारत सरकार के गजट में दर्ज है तथा वक्फ बोर्ड के अंतर्गत पंजीकृत ट्रस्ट द्वारा संचालित होती है। उनका कहना है कि यहाँ सदियों से नियमित रूप से जुमे की नमाज अदा की जाती रही है और कुछ लोग जानबूझकर विवाद उत्पन्न कर रहे हैं। उनके अनुसार यदि कोई ऐतिहासिक अथवा कानूनी विवाद है तो उसका समाधान न्यायालय और संबंधित संस्थाओं के माध्यम से होना चाहिए। ट्रस्ट ने इस मामले में कानूनी सलाह लेने की बात भी कही है।

एएसआई की कार्रवाई और बढ़ती चर्चा

उल्‍लेखनीय है कि हाल ही में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने इस संरक्षित स्मारक क्षेत्र में बने एक अनधिकृत निर्माण को ध्वस्त किया। प्रशासन ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए तहखाने की ओर जाने वाले एक प्रमुख प्रवेश द्वार को भी बंद कर दिया है। इस कार्रवाई के बाद तहखाने और वहाँ मौजूद कथित मूर्तियों को लेकर चर्चा और तेज हो गई। हिंदू संगठनों की मांग है कि स्मारक का प्रबंधन पूरी तरह एएसआई के नियमों के अनुसार किया जाए तथा सभी ऐतिहासिक तथ्यों की निष्पक्ष जाँच कराई जाए।

इतिहास की वह बहस जो दशकों से जारी है

भरूच का विवाद भारत में लंबे समय से चल रही उस ऐतिहासिक बहस का हिस्सा बन गया है, जिसमें यह प्रश्न उठाया जाता रहा है कि क्या मध्यकालीन इस्लामिक आक्रमणों के दौरान बड़ी संख्या में हिंदू, बौद्ध और जैन मंदिरों को ध्वस्त कर उनके स्थान पर मस्जिदें बनाई गईं।

इतिहासकार प्रोफेसर आनन्‍द सिंह राणा का स्‍पष्‍ट मानना है कि  देश में ऐसे अनेकों उदाहरण उपलब्ध हैं, जहाँ समय-समय पर अरब से भारत आए इस्‍लामिक आक्रान्‍ताओं ने राजनीतिक और अपना मजहबी (धार्मिक) वर्चस्व स्थापित करने के लिए मंदिरों को निशाना बनाया, ये सभी घटनाक्रम विभिन्न क्षेत्रों तथा कालखंडों के अनुसार अलग-अलग परिस्थितियों की ओर संकेत करते हैं। अब यहां सामने आया यह भरूच का मामला भी इसी प्रकार का है। जो स्‍पष्‍ट कर रहा है कि अतीत में यहां भयंकर संघर्ष हुआ होगा और इस हिन्‍दू-जैन संयुक्‍त मंदिर को बलात मस्‍जिद में बदल दिया गया होगा। भरूच का मामला भी अब इसी व्यापक राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनता दिखाई दे रहा है।

न्यायिक और पुरातात्विक निष्कर्षों का इंतजार

भरूच जामा मस्जिद को लेकर सामने आए वीडियो और दावों ने एक बार फिर इतिहास के उन प्रश्नों को जीवित कर दिया है जो लंबे समय से भारतीय समाज में चर्चा का विषय रहे हैं। हालांकि किसी भी ऐतिहासिक स्थल के मूल स्वरूप को लेकर अंतिम निष्कर्ष न्यायालय, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और प्रमाणित ऐतिहासिक अनुसंधान के आधार पर ही निकाले जा सकते हैं। फिलहाल भरूच की जामा मस्जिद का तहखाना केवल एक स्थानीय विवाद नहीं रह गया है, बल्कि वह भारतीय इतिहास, सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक स्मृति से जुड़े व्यापक विमर्श का नया केंद्र बन चुका है। आने वाले समय में कानूनी प्रक्रिया, पुरातात्विक अध्ययन और ऐतिहासिक प्रमाण ही तय करेंगे कि इस विवाद की वास्तविक सच्चाई क्या है।

हिंदू टेम्पल्स: व्हाट हैपन्ड टू देम, पुस्‍तक में कई मंदिरों का लिखा है सच

मंदिर-विध्वंस के विषय पर सबसे चर्चित पुस्तकों में लेखक और इतिहास शोधकर्ता सीताराम गोयल की दो खंडों में प्रकाशित पुस्तक “हिन्दू टेम्पल्स: व्हाट हैपन्ड टू देम” प्रमुख मानी जाती है। इस पुस्तक में देशभर के अनेक मंदिरों का उल्लेख किया गया है जिनके बारे में लेखक का दावा है कि उन्हें मुस्लिम शासकों के काल में नष्ट या परिवर्तित किया गया। गोयल ने फारसी इतिहास ग्रंथों, शिलालेखों और समकालीन अभिलेखों का संदर्भ देते हुए “हिन्दू मंदिर : उनके साथ क्या हुआ?” पुस्‍तक में यह तर्क रखा कि मंदिर-विध्वंस केवल राजनीतिक कार्रवाई नहीं बल्कि कई मामलों में धार्मिक उद्देश्य से भी किया गया था।

के.एस. लाल और अन्य इतिहासकारों के निष्कर्ष

इतिहासकार के.एस. लाल ने अपनी पुस्तक “ग्रोथ ऑफ मुस्लिम पॉपुलेशन इन मीडीवल इंडिया” तथा अन्य लेखन में मध्यकालीन भारत के सामाजिक और धार्मिक परिवर्तनों पर चर्चा की है। वहीं बेल्जियम के इतिहासकार कोएनराड एल्स्ट ने भी कई पुस्तकों में मंदिर-विध्वंस और धार्मिक संघर्षों के ऐतिहासिक दस्तावेजों का उल्लेख किया है। इसके साथ ही इतिहासकार आर.सी. मजूमदार ने भी भारतीय इतिहास के विभिन्न खंडों में ऐसे प्रसंगों का उल्लेख किया है जहाँ मंदिरों पर आक्रमण हुए। दूसरी ओर इतिहासकार रिचर्ड ईटन जैसे विद्वान स्वीकार करते हैं कि मंदिर-विध्वंस की घटनाएँ हुईं।

सोमनाथ से काशी तक अनेक विवाद

भारत में सोमनाथ मंदिर, काशी विश्वनाथ-ज्ञानवापी परिसर, मथुरा श्रीकृष्ण जन्मभूमि, अयोध्‍या-रामजन्‍म भूमि, भोजशाला तथा अन्य कई स्थलों को लेकर समय-समय पर विवाद सामने आते रहे हैं। इन मामलों में विभिन्न पक्ष ऐतिहासिक दस्तावेजों, स्थापत्य साक्ष्यों और पुरातात्विक निष्कर्षों के आधार पर अपने-अपने दावे प्रस्तुत करते रहे हैं। जिसमें से अयोध्‍या स्‍थ‍ित श्रीराम जन्‍म भूमि का विवाद एवं मध्‍य प्रदेश में धार स्‍थ‍ित वाग्‍देवी मंदिर-भोजशाला विवाद का न्‍यायालयीन निर्णय हिन्‍दू पक्ष में आ चुका है।

Topics: Archaeological Survey of IndiaTemple-to-Mosque disputebhojshala disputeASI actionIndian Cultural HeritageHistory of medieval IndiaGyanvapi disputeTemple demolitionAlauddin KhiljiBharuch Jama Masjid disputeBharuch Jama Masjid basementGujarat Jama MasjidShri Krishna JanmabhoomiIdol of Lord GaneshaSomnath templeIdol of Lord HanumanKashi VishwanathIdol of Lord Mallinath
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और हिंदुस्थान समाचार से संबद्ध हैं। [Read more]
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