देश-दुनिया पर मंडरा रहे पर्यावरण संकट के घने बादल बात इस बात की चेतावनी दे रहे हैं कि अब इस दिशा में बरती गयी थोड़ी भी लापरवाही बहुत भारी पड़ सकती है। पर्यावरण की सुरक्षा आज हम सबका सबसे बड़ा राष्ट्रीय कर्त्तव्य है। ग्लोल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन और विश्व युद्ध की भयावह परिस्थितियों से जूझ रही आज की दुनिया में कुदरत का रौद्र रूप बार-बार हमें आगाह कर रहा है कि यदि हमने अपनी आदतें न बदलीं तो जल्द ही हमारा अस्तित्व खत्म हो जाएगा।
अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए हमें प्रकृति की आचार संहिता का अनुपालन करना ही होगा। निःसंदेह; हम सनातन धर्मावलम्बी बहुत ही सौभाग्यशाली हैं कि हमारे महान वैदिक ऋषियों ने सदियों पूर्व हमें प्रकृति संरक्षण की जो नियमावली सौंपी थी, उसके सूत्र आज भी पर्यावरण को सुरक्षित रखने में पूर्ण समर्थ हैं।
यजुर्वेद के शान्तिपाठ में माँ प्रकृति का नमन वंदन
भारत की सनातन हिन्दू संस्कृति में पर्यावरण का वही महत्व है जो मानव शरीर में आत्मा का होता है। इसीलिए वैदिक ऋषियों ने यजुर्वेद के शान्ति पाठ में माँ प्रकृति के पंचतत्वों (धरती,आकाश, जल, वायु और अग्नि) का वंदन करते हुए गया है – ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षं शान्ति: पृथिवी शान्ति राप: शान्ति रौषधय: शान्ति। वनस्पतय: शान्तिर्विश्वेदेवा शान्तिर्ब्रह्मं शान्ति: सर्वशान्तिदेव शान्ति: सामा शान्तिरेधि। अर्थात तीनो लोकों में, जल में, धरती में, आकाश में, अन्तरिक्ष में, अग्नि में, पवन में, औषधि में तथा वृक्ष-वनस्पति में विराजमान सम्पूर्ण जगत के स्वामी परब्रह्म परमेश्वर विश्व के सारे जीवमात्र के ह्रदय में, मुझमें, तुझमें सर्वत्र शांति स्थापित करें। वैदिक साहित्य में मनुष्य जीवन में पर्यावरण संरक्षण की महत्ता को भी गहराई से स्वीकार किया गया है। ऋषि मनीषा कहती है कि यदि प्रकृति के जीवनदायी पांच तत्त्वों की शुद्धता सुरक्षित रहे तभी धरती के प्राणियों का जीवन शुद्ध और सुरक्षित रह सकता है। इन पांच तत्त्वों का सम्मिलित स्वरूप ही पर्यावरण है। पर्यावरण का संतुलन ही जीवनचक्र को नियंत्रित करता है और इसमें गतिरोध आते ही जीवन संकट में पड़ जाता है।
वैदिक साहित्य में प्राकृतिक घटकों से कल्याण की अभिलाषा
भारतीय वैदिक साहित्य में प्राकृतिक घटकों से कल्याण की अभिलाषा को स्वस्ति कहा गया है। आचार्य सायण का विचार है कि अप्राप्य वस्तु की प्राप्ति योग है एवं प्राप्ति का संरक्षण क्षेम है (ऋग्वेद, 5/51/11)। इसलिए सहज-सुलभ व सरल प्राकृतिक घटकों का सुरक्षित रहना स्वस्ति है। इस प्रकार पर्यावरण को संरक्षित रखने की उदात्त भावनाएं ऋग्वेद में अनेक स्थलों पर देखने को मिलती हैं। वैदिक ऋषियों ने पर्यावरण को संतुलित रखने के लिए जिन देवताओं की महत्वपूर्ण भूमिका बतायी है उनमें- सूर्य, वायु, वरुण (जल) एवं अग्नि देव प्रमुख हैं। ऋग्वेद (1/158/1, 7/35/11) के अनुसार पर्यावरण के घटकों में समन्वय होना ही सुख, शांति व समृद्धि का आधार है। लोकमंगल गायक गोस्वामी तुलसीदास भी रामचरितमानस में ‘’क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा, पंचतत्व यह रचित सरीरा‘’ लिखकर पंचभूत सृष्टि से निर्मित मानव को प्रकृति के संरक्षण का मर्म सूत्र रूप में समझा गये थे। लेकिन हम हतबुद्धि प्रगतिशीलता के नाम पर भौतिक चकाचौंध से भरी पाश्चात्य सभ्यता के अंधानुकरण में इस कदर डूबते चले गये कि आज खुद के विनाश के कगार आ खड़े हुए। खेद की बात है कि लम्बी गुलामी के उपरांत आजाद देश के नीति नियंता भी अपनी विरासत के प्रकृति संरक्षण के इन दिव्य सूत्रों के अनुपालन के प्रति उदासीन ही बने रहे।
पर्यावरण संरक्षण के प्रति जनचेतना जगाने में जुटी ‘लोकभारती’
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का अनुषांगिक संगठन ‘लोकभारती’ बीते तीन दशकों से देशवासियों के मन में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जनचेतना जगाने के अभियान में जुटा हुआ है। संगठन के अखिल भारतीय संगठन मंत्री बृजेंद्रपाल सिंह कहते हैं कि उनके संगठन का मूल लक्ष्य देशवासियों को भारतीय संस्कृति के उन उन्नत जीवनमूल्यों को अपनाने को उत्प्रेरित करना है जिनके बल पर भारत विश्वगुरु बना था। पर्यावरण संरक्षण उनके इस अभियान की पहली पाठशाला है। भारत की सनातन दृष्टि सदा से प्रकृति पूजक रही है। बकौल बृजेंद्र जी; हमारा मूल सूत्र है –‘’हम प्रकृति से हैं, प्रकृति हम से नहीं।‘’ कोई भी भौतिक विकास तभी सार्थक होता है, जब तक उसमें पर्यावरण और पारिस्थितिकी संतुलन पर किसी स्तर पर कोई प्रहार नहीं हो।
विकास की नीतियां बनाते समय आज इस सूत्र को अमलीजामा पहनाने की बेहद जरूरी है वर्ना मानव जाति को कुदरत के कोप से कोई भी नहीं बचा सकेगा। इस कारण ‘लोकभारती’ लोगों को अपनी उन सनातन परम्पराओं को अपनाने को प्रेरित करती है जो आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर पूरी भी तरह खरी हैं। यह संगठन लोगों को समझाता है कि आधुनिक वैश्विक सभ्यता का रास्ता विध्वंस को ओर ले जाने वाला है क्यूंकि उनकी नीति ‘जीडीपी’ यानी अधिकतम उपभोग पर टिकी है जबकि हमारी संस्कृति सीमित उपयोग पर। विदेशी विश्व को बाजार बनाना चाहते हैं और हम विश्व को परिवार। अपने इस अभियान के तहत लोकभारती ने ‘मंगल वाटिका’, ‘मंगल परिवार’ व ‘मंगल परिसर’ जैसे कई अभियान चला रखे हैं जो व्यक्ति, परिवार व राष्ट्र निर्माण की दिशा में सहायक सिद्ध हो रहे हैं।
लोकभारती का ‘मंगल वाटिका’ अभियान : मंगल वाटिका अभियान के द्वारा लोगों को हरियाली रोपण व स्वच्छता संवर्धन के प्रति जागरूक किया जाता है। हम कर्ज में न जिएं। हम प्रकृति से ऑक्सीजन लेते हैं, यह प्रकृति का कर्ज है। बृजेन्द्र जी के अनुसार प्रकृति के इस कर्ज को उतारने के लिए उनका संगठन लोगों में पौधे लगाने और उन्हें सुरक्षित रखने के लिए जागरूक करता है। उनका संगठन लोगों को ‘हरिशंकरी’, ‘पंचपल्लव’, ‘पंचवटी’ व ‘आरोग्यत्रयी’ के रोपण की धार्मिक, पर्यावरणीय, औषधीय व आर्थिक उपयोगिता बताकर उन्हें उत्प्रेरित करता है। चूंकि पर्यावरण सरंक्षण हेतु सभी जगह हरियाली व्यवस्था सुनिश्चित करना आवश्यक है। इस हेतु लोकभारती ने एक कदम और आगे बढ़कर गृह वाटिका में शाकभाजी आदि लगाने के लिए भी लोगों को प्रोत्साहित किया है। इससे प्रेरित होकर लोग अपने टेरस, लॉन व छतों पर केमिकल फ्री साग-सब्जी उगा रहे हैं। इससे घर का तापमान भी घटता है और लोगों का रक्तचाप भी। यही नहीं, रसोई के गीले जैविक कचरे की रीसाईकलिंग द्वारा निर्मित खाद व कीटनाशक का उपयोग अपनी इस वाटिका में करके लोग गर्व से यह कह रहे हैं कि सड़क से आने वाली दुर्गंध में अब उनकी हिस्सेदारी नहीं है।
रसोई कचरा प्रबंधन संयंत्र
रसोई कचरा प्रबंधन संयंत्र स्थापित कराने के कार्य में जुटे लोकभारती के कार्यकर्त्ता कमला प्रसाद मिश्र बताते हैं कि सिर्फ 600 रुपये खर्च कर प्लास्टिक की बोरी लगा एक ढक्कनदार ड्रम जिसमें नीचे तली के पास एक पाइप लगी हो और प्लांट कल्चर (जीवामृत) की एक बोतल; इस सामग्री से घर में ही रसोई कचरे की रिसाइकलिंग अत्यंत सरलता से की जा सकती है। इसकी प्रविधि अत्यंत सरल है। इसके तहत हर दिन का रसोई का गीला जैविक कचरा जिसमें फल व सब्जियों के छिलके, चाय की उपयोग की हुई पत्ती व पूजा में चढ़ाये गये फूल-पत्ते आदि होते हैं, इस ड्रम में डाला जाता है तथा इस कचरे से दुर्गन्ध न आये, इसके लिए इस ड्रम में जीवामृत की बोतल से एक ढक्कन तरल निकाल उसको एक कप पानी में मिलाकर उस घोल को इस कचरे के ऊपर छिड़क कर तुरंत ठीक से ढक्कन बंद कर दिया जाता है। एक हफ्ते बाद इस घोल का छिड़काव एक-दो दिन छोड़ कर किया जाता है। 20-25 दिन में इस ड्रम में प्राकृतिक खाद बनने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है, जिसे नीचे लगी पाइप के द्वारा एक प्लास्टिक की बोतल एकत्रित किया जाने लगता है। इस आसान विधि से बनी यह खाद रसोई वाटिका में अत्यंत उपयोगी साबित हो रही है। इस ड्रम में नीम, कनेर व धतूरे की पत्तियों को डालने से इससे प्राप्त जैविक घोल बेहतरीन कीटनाशक का भी काम करता है।
देशी गाय आधारित प्राकृतिक कृषि को बढ़ावा
पर्यावरण सरंक्षण की दिशा में लोकभारती का एक अन्य महत्वपूर्ण उपक्रम है देशी गाय आधारित प्राकृतिक कृषि को बढ़ावा देना। बृजेंद्र जी कहते हैं कि गाय रहेगी तभी खेत व भूमि उर्वर रहेगी और हमको खाद्यान्न भी प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाला मिलेगा। इसे लेकर हमने देशभर में एक बड़ा अभियान चला रखा है। सरकार भी सहयोगी बनी है। हम शहर और गांव को जोड़ने का काम भी कर रहे हैं। उत्पादक गांव में और उपभोक्ता शहर में, दोनों जुड़ेंगे तभी यह काम आगे बढ़ेगा, गाय सुरक्षित रहेगी, खेत भी सुरक्षित रहेगा और किसान स्वयं द्वारा निर्धारित मूल्य पर अपना उत्पाद बेच सकेगा। हमारे अभियान से प्रेरित होकर उत्तर प्रदेश के हर जिले में किसान ऐसा कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश सरकार ने भी अपने दस प्रदर्शन केन्द्रों पर एक-दो एकड़ में जैविक उत्पादन शुरू कर दिया है।

















