असली जमींदार कौन? भारत की मिट्टी पर अधिकार: कब्रों से या कर्तव्यों से?
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असली जमींदार कौन? भारत की मिट्टी पर अधिकार: कब्रों से या कर्तव्यों से?

बशीर बद्र के चर्चित शेरों पर छिड़ी बहस के बीच राष्ट्रवाद, संस्कृति और राष्ट्रीय निष्ठा के प्रश्नों का विश्लेषण

Written byराजेश कुमरावत 'सार्थक'राजेश कुमरावत 'सार्थक'
Jun 4, 2026, 06:20 pm IST
inविश्लेषण
बशीर बद्र (फाइल फोटो)

बशीर बद्र (फाइल फोटो)

शब्द कभी-कभी इतिहास से भी लंबी यात्रा करते हैं। कवि की एक पंक्ति समय के गर्भ में वर्षों तक सोई रहती है और फिर किसी दिन समाज के सामने प्रश्न बनकर खड़ी हो जाती है। तब बहस केवल कविता की नहीं होती, बल्कि उस विचार की होती है जो उन शब्दों के पीछे छिपा होता है।

प्रसिद्ध उर्दू शायर और पद्मश्री सम्मानित साहित्यकार बशीर बद्र के निधन के बाद सोशल मीडिया पर उनके अनेक पुराने वीडियो और शेर पुनः चर्चा में आ गए हैं। विशेष रूप से पाकिस्तान में आयोजित एक कार्यक्रम में उनके द्वारा पढ़े गए दो शेर आज व्यापक बहस का विषय बने हुए हैं। उन शेरों में उन्होंने कहा था-

“हिंदुस्तान का सच्चा वफादार मैं ही हूँ,
कब्रों से पूछ असली जमींदार मैं ही हूँ।”

और आगे-

“दरिया के साथ वह तो समंदर में बह गया,
मिट्टी में मिलकर मिट्टी का हकदार मैं ही हूँ।”

इन पंक्तियों को सुनने के बाद स्वाभाविक रूप से अनेक प्रश्न खड़े होते हैं। आखिर शायर क्या कहना चाहता था? क्या यह केवल एक भावनात्मक साहित्यिक अभिव्यक्ति थी, या इसके भीतर कोई वैचारिक संदेश भी निहित था? यही कारण है कि वर्षों पुराना यह शेर आज भी चर्चा और विवाद का विषय बना हुआ है।

शेर का सीधा अर्थ निकालें तो बशीर बद्र यह तर्क प्रस्तुत करते दिखाई देते हैं कि मुसलमान मृत्यु के बाद कब्र में इसी भूमि का हिस्सा बन जाता है, इसलिए वह मिट्टी का वास्तविक हकदार है; जबकि हिंदू अग्नि संस्कार के बाद नदी के माध्यम से समुद्र में प्रवाहित हो जाता है। इसी आधार पर वे स्वयं को “सच्चा वफादार”, “असली जमींदार” और “मिट्टी का हकदार” बताते हैं। यहीं से बहस आरंभ होती है।

भारत की सांस्कृतिक चेतना में भूमि से संबंध का आधार कभी भी अंतिम संस्कार की पद्धति नहीं रहा। भारतीय दर्शन शरीर को पंचतत्वों का बना मानता है और मृत्यु के बाद उसे पुनः पंचतत्वों में विलीन कर देता है। चाहे दफनाया जाए, चाहे अग्नि को समर्पित किया जाए, अंततः शरीर प्रकृति में ही लौटता है। इसलिए भारतीय दृष्टि में मिट्टी से संबंध का प्रश्न धार्मिक विधि का नहीं, बल्कि सभ्यता, संस्कृति, इतिहास और राष्ट्रनिष्ठा का विषय है।

सोशल मीडिया पर इस शेर की आलोचना करने वाले लोग प्रश्न उठा रहे हैं कि यदि कब्र ही भूमि पर अधिकार का प्रमाण है, तो उन असंख्य ऋषियों, मुनियों, संतों, गुरुओं, क्रांतिकारियों और वीरों का इस भूमि पर क्या स्थान है, जिनकी अस्थियाँ नदियों में प्रवाहित हुईं, किंतु जिनके त्याग और तपस्या ने भारत की आत्मा को जीवित रखा? क्या उनके और इस मिट्टी के बीच का संबंध समाप्त हो गया?

भारत का इतिहास इस विचार को स्वीकार नहीं करता। यह वही भूमि है जहाँ वैदिक ऋषियों ने ज्ञान की ज्योति प्रज्वलित की, जहाँ भगवान राम और भगवान कृष्ण की परंपराएँ विकसित हुईं, जहाँ आदि शंकराचार्य से लेकर स्वामी विवेकानंद तक की चेतना ने राष्ट्र को दिशा दी, जहाँ महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी महाराज, रानी लक्ष्मीबाई, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और अनगिनत बलिदानियों ने अपना सर्वस्व अर्पित किया। क्या उनकी राष्ट्रभक्ति और इस मिट्टी पर उनका अधिकार किसी अंतिम संस्कार की विधि से कम या अधिक आँका जा सकता है?

वास्तव में विवाद का केंद्र “कब्र” या “चिता” नहीं है। विवाद का केंद्र “असली जमींदार” और “सच्चा वफादार” जैसे शब्द हैं। भारत जैसे बहुलतावादी राष्ट्र में जब कोई व्यक्ति किसी एक समुदाय को “असली” बताता हुआ प्रतीत होता है, तब स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि बाकी लोग कौन हैं? क्या वे कम वफादार हैं? क्या वे इस भूमि पर कम अधिकार रखते हैं? भारतीय राष्ट्रवाद का उत्तर स्पष्ट है…नहीं।

भारत किसी एक मजहब, जाति या समुदाय की जागीर नहीं है। यह उन सभी का राष्ट्र है जिन्होंने इसे अपनी मातृभूमि माना है, जिन्होंने इसकी संस्कृति का सम्मान किया है, जिन्होंने इसके लिए संघर्ष किया है और जिन्होंने इसके भविष्य को बेहतर बनाने में योगदान दिया है। यहाँ अधिकार का आधार धर्म नहीं, कर्तव्य है; पहचान नहीं, समर्पण है।

यह भी ध्यान देने योग्य तथ्य है कि ये पंक्तियाँ पाकिस्तान के एक मंच से कही गई थीं। इसलिए आज सोशल मीडिया पर अनेक लोग यह प्रश्न भी उठा रहे हैं कि जब भारत का एक प्रतिष्ठित और पद्मश्री सम्मानित साहित्यकार विदेश की धरती पर खड़े होकर “असली जमींदार” और “सच्चा वफादार” जैसी अभिव्यक्तियाँ प्रयोग करता है, तब उन शब्दों के व्यापक सामाजिक और राष्ट्रीय प्रभावों पर चर्चा होना स्वाभाविक है। यह प्रश्न किसी व्यक्ति विशेष से अधिक उस विचारधारा और दृष्टिकोण का है, जिसकी झलक इन पंक्तियों में दिखाई देती है।

निश्चित रूप से साहित्य को साहित्य की तरह पढ़ा जाना चाहिए, किंतु साहित्यकार के शब्द समाज में विचार भी उत्पन्न करते हैं। इसलिए ऐसे शेरों पर विमर्श होना लोकतांत्रिक समाज की स्वाभाविक प्रक्रिया है। आज सोशल मीडिया पर चल रही बहस भी इसी विमर्श का हिस्सा है।

भारत की राष्ट्रीय चेतना किसी कब्र और चिता के बीच भेद नहीं करती। वह केवल यह देखती है कि किसने इस राष्ट्र को अपना माना, किसने इसके लिए श्रम किया, किसने इसके लिए संघर्ष किया और किसने इसके सम्मान के लिए अपना योगदान दिया।

भारत की मिट्टी पर अधिकार मृत्यु के बाद प्राप्त नहीं होता; वह जीवन भर निभाए गए कर्तव्यों से अर्जित होता है। और शायद यही भारतीय राष्ट्रवाद का सबसे बड़ा संदेश है- “इस राष्ट्र में न कोई असली जमींदार है और न कोई किरायेदार। यहाँ केवल भारत माता की संताने हैं, जिनका सम्मान उनके धर्म से नहीं, बल्कि उनके कर्म, चरित्र और राष्ट्रनिष्ठा से निर्धारित होता है।

 

 

Topics: पाकिस्तान बशीर बद्रभारतीय संस्कृतिराष्ट्रवादबशीर बद्रबशीर बद्र के शेर
राजेश कुमरावत 'सार्थक'
राजेश कुमरावत 'सार्थक'
वरिष्ठ पत्रकार और समसामयिक लेखक [Read more]
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