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‘लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी भारत का हिस्सा हैं’, विदेश मंत्रालय ने नेपाल को चेताया

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह के भारत के साथ सीमा विवाद में चीन और ब्रिटेन को शामिल करने के बयान पर भारत का सख्त रुख। जानिए लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा विवाद पर पूरी अपडेट और भारत सरकार की प्रतिक्रिया।

Published by
जय प्रकाश गुप्ता

भारत और नेपाल के बीच लंबे समय से चला आ रहा सीमा विवाद एक बार फिर से चर्चा में है। इस बार विवाद की वजह नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह का वह बयान है जिसमें उन्होंने इस द्विपक्षीय मसले को सुलझाने के लिए चीन और ब्रिटेन जैसे तीसरे देशों को शामिल करने की वकालत की।

भारत सरकार ने नेपाल के इस प्रस्ताव पर बेहद सख्त और कड़ा रुख अपनाते हुए नई दिल्ली ने साफ तौर पर किसी भी तीसरे पक्ष की भूमिका को सिरे से खारिज कर दिया है। भारतीय विदेश मंत्रालय का साफ कहना है कि दोनों देशों के बीच सीमा से जुड़े तमाम मामलों को सुलझाने के लिए पहले से ही मजबूत द्विपक्षीय तंत्र मौजूद हैं और दोनों देश आपस में मिलकर इसे सुलझाने में सक्षम हैं।

पीएम बालेंद्र शाह ने क्या कहा था?

इस पूरे कूटनीतिक विवाद की शुरुआत तब हुई जब नेपाल के रैपर से नेता बने वर्तमान पीएम बालेंद्र शाह ने नेपाल की संसद (पार्लियामेंट) में देश को संबोधित करते हुए एक बड़ा बयान दिया। उन्होंने रविवार को संसद में कहा कि भारत के साथ चल रहे सीमा विवाद पर बातचीत करने के साथ-साथ काठमांडू इस विषय पर चीन और यूनाइटेड किंगडम (यूके) के भी संपर्क में है।

नेपाल के पीएम ने कहा था, ‘जैसा कि यह सबको पता है कि यह सीमा विवाद उस दौर का है जब ब्रिटिश भारत इस क्षेत्र को छोड़कर गया था, इसलिए हमारा यह मानना है कि इस पूरे मामले को हमेशा के लिए सुलझाने में इंग्लैंड को भी एक पक्ष के रूप में शामिल किया जाना चाहिए।’

केवल इतना ही नहीं नेपाल के प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन के दौरान यह भी स्वीकार किया कि कुछ क्षेत्रों में नेपाली नागरिकों या प्रशासन की तरफ से भारतीय क्षेत्रों पर ‘अतिक्रमण’ किया गया है। हालांकि, उनके इस बयान के बाद नेपाल के विदेश मंत्रालय को स्थिति स्पष्ट करने के लिए एक अलग से स्पष्टीकरण जारी करना पड़ा। इसमें उन्होंने कहा कि पीएम शाह का इशारा दोनों तरफ से होने वाले क्रॉस-बॉर्डर कब्जे को लेकर था।

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भारत ने दिया नेपाल को चेताया

नेपाल के प्रधानमंत्री के इस बयान पर प्रतिक्रिया देने में भारत ने जरा भी देर नहीं की। विदेश मंत्रालय की साप्ताहिक मीडिया ब्रीफिंग के दौरान मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल से जब नेपाल के प्रधानमंत्री की इस टिप्पणी के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा, ‘हमने भारत-नेपाल सीमा को लेकर नेपाल के प्रधानमंत्री की टिप्पणियों और उसके बाद नेपाली विदेश मंत्रालय द्वारा जारी किए गए बयान को देखा है। हम यह बिल्कुल साफ कर देना चाहते हैं कि भारत और नेपाल के बीच सीमा संबंधी सभी पहलुओं से निपटने के लिए पहले से ही स्थापित द्विपक्षीय तंत्र मौजूद हैं। सभी संबंधित पक्षों को यह बहुत अच्छी तरह से स्पष्ट होना चाहिए कि भारत और नेपाल के बीच के किसी भी द्विपक्षीय मामले में किसी तीसरे पक्ष (थर्ड पार्टी) की कोई भूमिका नहीं है और न ही इसकी आवश्यकता है।’

भारत और नेपाल के बीच क्यों है सीमा विवाद?

भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने दोनों देशों के बीच सीमा निर्धारण की वर्तमान स्थिति पर भी महत्वपूर्ण आंकड़े और तथ्य साझा किए। उन्होंने बताया कि भारत और नेपाल की कुल सीमा का लगभग 98 प्रतिशत हिस्सा पहले ही पूरी तरह से सीमांकित किया जा चुका है और दोनों देश इस पर सहमत हैं।

बचे हुए महज 2 प्रतिशत हिस्से में विवाद के मुख्य कारण हैं:

1. भौगोलिक परिस्थितियों के कारण ‘गंडक नदी’ समय-समय पर अपना रास्ता बदलती रहती है। नदी की धारा बदलने के कारण कुछ सीमावर्ती क्षेत्रों में जमीन की स्थिति बदल गई है, जिससे कुछ अनसुलझे हिस्से पैदा हो गए हैं।

2. सीमा के कुछ निर्धारित हिस्सों में दोनों ओर से ‘नो-मैन्स लैंड’ यानी उस संवेदनशील खाली पट्टी पर सीमा पार से अवैध कब्जे और अतिक्रमण के मामले सामने आए हैं। भारत और नेपाल की टीमें वर्तमान में संयुक्त रूप से इन क्षेत्रों का नक्शा तैयार कर रही हैं ताकि अतिक्रमण को हटाया जा सके।

क्या है लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी का पुराना विवाद?

भारत और नेपाल के बीच मुख्य रूप से तीन क्षेत्रों को लेकर पुराना विवाद है लिपुलेख (Lipulekh), लिम्पियाधुरा (Limpiyadhura) और कालापानी (Kalapani)। भारत का रुख इस मामले में हमेशा से बेहद स्पष्ट रहा है। भारत इन तीनों क्षेत्रों को ऐतिहासिक और प्रशासनिक साक्ष्यों के आधार पर  उत्तराखंड राज्य का अभिन्न हिस्सा मानता है।

कुछ साल पहले नेपाल ने एक नया राजनीतिक नक्शा जारी कर इन भारतीय क्षेत्रों को अपने नक्शे में दिखा दिया था, जिसका भारत ने कड़ा विरोध किया था। जानकारों का मानना है कि नेपाल के नए प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह घरेलू राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत करने और राष्ट्रवादी भावनाओं को भुनाने के लिए चीन और ब्रिटेन का नाम ले रहे हैं। लेकिन भारत ने साफ कर दिया है कि वह किसी भी अंतरराष्ट्रीय दबाव या तीसरे देश के हस्तक्षेप के आगे झुकने वाला नहीं है।

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