पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है। वो अपने देश के लोगों के विकास के लिए काम करने की जगह भारत में आग लगाने में ही अपना सारा वक्त लगाता है। इसी क्रम में उसकी बहुत ही खौफनाक साजिश का खुलासा हो गया है। पता चला है कि आईएसआई अपनी खौफनाक साजिश के तहत भारत में अपने पाले आतंकियों को राजनीति में घुसाने की कोशिशों में लगी हुई है।
केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों के अधिकारियों के मुताबिक, पाकिस्तान अपने ओवर ग्राउंड वर्कर्स (OGW) नेटवर्क को मुख्यधारा की राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टियों में घुसने के निर्देश दिए हैं। इसका मकसद सुरक्षा एजेंसियों की कार्रवाई और आतंकी घटनाओं की जांच से बचना है। यह जानकारी रविवार को अधिकारियों ने दी।
पुरानी रणनीति पर काम कर रही आईएसआई
अधिकारियों ने बताया कि ISI अपनी पुरानी रणनीति को दोबारा व्यवस्थित कर रही है। वह 1990 के दशक की शुरुआत में बने आतंकी संगठनों को फिर सक्रिय करने की कोशिश कर रही है। इससे आतंकवादी हिंसा को ‘स्थानीय स्वरूप’ दिया जा सके और पाकिस्तान की सीधी भूमिका छिपाई जा सके। यह कोशिश ऐसे समय हो रही है जब पाकिस्तान पर FATF की नजर है, जो धन शोधन और आतंकवाद फंडिंग की जांच करता है।
राजनीतिक दलों से जुड़े थे
श्रीनगर पुलिस ने कुछ आतंकी समर्थकों को गिरफ्तार किया। उनसे पूछताछ में पता चला कि इनमें से कुछ लोग मुख्यधारा की राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टियों से जुड़े हुए थे। ISI उन लोगों को, जो आतंकी संगठनों को रसद, भर्ती और पैसे की मदद देते हैं, राजनीतिक ढांचे में घुसाकर सुरक्षा बलों के अभियानों से बचाना चाहती है।
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क्या है वजह
अधिकारियों के अनुसार, यह रणनीति हताशा से निकली है। सुरक्षा बलों के लगातार दबाव की वजह से ISI का पुराना नेटवर्क कमजोर हो गया है। नए छद्म संगठनों को भी स्थानीय समर्थन कम मिल रहा है। इसलिए विकल्प कम हो रहे हैं। पुराने संगठनों को सक्रिय करके और उनके लोगों को मुख्यधारा की राजनीति में लाकर ISI युवाओं की नई पीढ़ी को लुभाने की कोशिश कर रही है। साथ ही, अपने नेटवर्क वाले लोगों को राजनीतिक संरक्षण देने की कोशिश भी है। घेराबंदी या तलाशी के दौरान कई बार ऐसे लोग राजनीतिक दल का सदस्यता कार्ड दिखाकर बचने की कोशिश करते हैं।
1990 का है तरीका
यह तरीका कई दशकों पुराना है। 1990 के दशक के आखिर में संदिग्ध लोग पुलिस से बचने के लिए वोटर आईडी का सहारा लेते थे। बाद में आधार कार्ड का इस्तेमाल करने लगे। अधिकारियों ने साफ किया कि किसी भी राजनीतिक दल के नेतृत्व ने ऐसे मामलों में हस्तक्षेप करके किसी को बचाने की कोशिश नहीं की। अब ऐसे तत्व उन आतंकी संगठनों को फिर सक्रिय करने में लगे हैं जो 1993 के बाद ज्यादातर निष्क्रिय हो गए थे। सुरक्षा एजेंसियां अल-उमर मुजाहिदीन, अल बदर और तहरीक-उल-मुजाहिदीन जैसे पुराने संगठनों पर नजर रख रही हैं। ये 1990 और 2000 के शुरुआती सालों में कश्मीर में सक्रिय थे।
ISI इन पुराने स्थानीय संगठनों को सक्रिय करके यह दिखाना चाहती है कि कश्मीर में हिंसा बाहर से चलाई जा रही छद्म लड़ाई नहीं, बल्कि स्थानीय मुद्दा है।














