स्याही से स्क्रीन तक: 200 वर्षों में कैसे बनी हिन्दी पत्रकारिता लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत
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स्याही से स्क्रीन तक: 200 वर्षों में कैसे बनी हिन्दी पत्रकारिता लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत

30 मई 2026 का सूर्योदय भारतीय इतिहास में एक साधारण तिथि का आगमन नहीं बल्कि वैश्विक चेतना के पटल पर हिन्दी पत्रकारिता की द्विशताब्दी (200 वर्ष) का ऐसा स्वर्णिम उत्सव है, जो इसके अदम्य साहस, अनवरत संघर्ष और सांस्कृतिक संचेतना को रेखांकित करता है।

Written byयोगेश कुमार गोयलयोगेश कुमार गोयल — edited by Mahak Singh
May 29, 2026, 02:55 pm IST
in भारत
(Ai Generated Image)

(Ai Generated Image)

30 मई 2026 का सूर्योदय भारतीय इतिहास में एक साधारण तिथि का आगमन नहीं बल्कि वैश्विक चेतना के पटल पर हिन्दी पत्रकारिता की द्विशताब्दी (200 वर्ष) का ऐसा स्वर्णिम उत्सव है, जो इसके अदम्य साहस, अनवरत संघर्ष और सांस्कृतिक संचेतना को रेखांकित करता है। आज से ठीक 200 वर्ष पूर्व 30 मई 1826 को पराधीन भारत की तत्कालीन राजधानी कलकत्ता के संकरे मोहाने से पंडित युगल किशोर शुक्ल ने जब हिन्दी के प्रथम साप्ताहिक पत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’ का प्राकट्य किया था, तब किसी ने यह कल्पना नहीं की होगी कि ब्रज और अवधी मिश्रित बोलियों की तुतली जुबान में रोपा गया वह छोटा सा पौधा आज सूचना प्रौद्योगिकी के युग में एक ऐसा विराट वटवृक्ष बन जाएगा, जिसकी शाखाएं सम्पूर्ण भूमंडल को आच्छादित कर लेंगी। यह केवल दो शताब्दियों की यात्रा नहीं है बल्कि यह यात्रा है गुलामी की कटीली बेड़ियों से स्वतंत्रता के उन्मुक्त गगन तक की, यह यात्रा है मसि (स्याही) और कागद के मर्यादित संघर्ष से लेकर ‘लाइक’, ‘शेयर’ और ‘रीट्वीट’ के असीमित डिजिटल साम्राज्य तक की। आज हिन्दी पत्रकारिता हर दिल की धड़कन, हर दौर की दस्तक और भारतीय लोकतंत्र की अघोषित संसद बन चुकी है।

‘उदन्त मार्तण्ड’ का उदय और भाषायी अस्मिता

19वीं शताब्दी के पूर्वार्ध का वह कालखंड घने तिमिर का था। भारत की अपनी भाषायी पहचान ब्रिटिश हुकूमत के साए में सिसक रही थी। अंग्रेजी का आधिपत्य था, फारसी दरबारी रसूख की भाषा बनी हुई थी और बांग्ला अपने नवजागरण के पथ पर अग्रसर थी। ऐसे विजातीय और चुनौतीपूर्ण परिवेश में कानपुर के मूल निवासी पंडित युगल किशोर शुक्ल ने मारवाड़ी पट्टी के बड़ाबाजार (कलकत्ता) से ‘उदन्त मार्तण्ड’ यानी ‘उगता हुआ सूर्य’ का संपादन-प्रकाशन आरंभ किया। प्रत्येक मंगलवार को आकार लेने वाला यह पत्र मात्र एक साप्ताहिक बुलेटिन नहीं था बल्कि भारतीय मानस की सुप्त चेतना को झकझोरने का एक पवित्र अनुष्ठान था। यद्यपि, इस ‘उगते सूर्य’ की नियति में बहुत लंबा जीवन नहीं लिखा था। तत्कालीन ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियां, डाक शुल्कों में रियायत न मिलना और हिन्दी भाषियों की सीमित साक्षरता के कारण जनित आर्थिक संकट ने इस पत्र का गला घोंट दिया। मात्र डेढ़ वर्ष के संक्षिप्त सफर के बाद दिसंबर 1827 में ‘उदन्त मार्तण्ड’ का प्रकाशन बंद हो गया परंतु अपने अंतिम अंक में शुक्ल जी ने जो मर्मभेदी पंक्तियां लिखी, वे आज भी हिन्दी की जिजीविषा को बयां करती हैं, ‘अस्त भयो उदन्त मार्तण्ड इह बार।’ भले ही वह मार्तण्ड अस्त हो गया लेकिन उसने हिन्दी पत्रकारिता के आकाश में जो लालिमा बिखेरी, उसने भविष्य के सैंकड़ों सूर्यों को उगने का मार्ग प्रशस्त कर दिया।

स्वतंत्रता संग्राम के महासमर में हिन्दी पत्रकारिता

‘उदन्त मार्तण्ड’ के बंद होने के बाद जो कारवां शुरू हुआ, उसने पत्रकारिता को विशुद्ध ‘मिशन’ और ‘राष्ट्रभक्ति का पर्याय’ बना दिया। भारतेंदु हरिश्चंद्र की ‘कविवचनसुधा’ और ‘हरिश्चंद्र मैगजीन’, बालकृष्ण भट्ट का ‘हिन्दी प्रदीप’, प्रताप नारायण मिश्र का ‘ब्राह्मण’ और बाद में बाल गंगाधर तिलक, मदन मोहन मालवीय तथा महात्मा गांधी के वैचारिक सान्निध्य ने हिन्दी पत्रकारिता को राष्ट्रीय आंदोलन की रीढ़ बना दिया। किशोरावस्था और युवावस्था के संक्रमण काल से गुजरती हिन्दी पत्रकारिता ने तब हुकूमत से सीधे लोहा लिया। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ‘सरस्वती’ के माध्यम से न केवल हिन्दी भाषा का परिष्कार किया बल्कि राष्ट्र को भाषायी अनुशासन भी सिखाया। वहीं, गणेश शंकर विद्यार्थी ने ‘प्रताप’ के माध्यम से जो निर्भीक पत्रकारिता की, वह आज के युग के लिए एक अनुकरणीय मानदंड है। विद्यार्थी जी की कलम से निकलने वाला एक-एक शब्द ब्रिटिश हुकूमत की चूलें हिला देता था। उस दौर में पत्रकारिता लाभ-हानि का व्यापार नहीं थी, वह सिर पर कफन बांधकर सत्य के पथ पर चलने का व्रत थी। पत्रकारों को जेल भेजा गया, छापेखानों को कुर्क किया गया, भारी अर्थदंड लगाए गए परंतु हिन्दी की ‘मसि’ कभी सूखी नहीं। उसने तिलक के ‘केसरी’ (हिन्दी संस्करण) और गांधी जी के ‘नवजीवन’ के माध्यम से देश के सुदूर गांवों तक आजादी की अलख जगाई।

उत्तर-स्वतंत्रता काल: ‘मिशन’ से ‘प्रोफेशन’ की ओर

15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ और इसके साथ ही हिन्दी पत्रकारिता के दायित्व और स्वरूप दोनों में युगांतरकारी परिवर्तन आया। अब चुनौती साम्राज्यवादी ताकतों से लड़ने की नहीं बल्कि मलबे से उठते राष्ट्र के निर्माण की थी, लोक-आकांक्षाओं को स्वर देने की थी। इस दौर में अज्ञेय, मनोहर श्याम जोशी, रघुवीर सहाय, धर्मवीर भारती और प्रभाष जोशी जैसे मनीषियों ने हिन्दी पत्रकारिता को नए आयाम दिए। दिनमान, धर्मयुग और साप्ताहिक हिन्दुस्तान जैसी पत्रिकाओं ने समाज के बौद्धिक स्तर को ऊंचा उठाया। धीरे-धीरे, वैश्वीकरण और आर्थिक उदारीकरण के दौर में पत्रकारिता ‘मिशन’ से रूपांतरित होकर ‘प्रोफेशन’ (व्यवसाय) के ढ़ांचे में ढलने लगी। बड़े पूंजीपति घरानों का प्रवेश हुआ, छपाई की तकनीक आधुनिक हुई और अखबार बहुपृष्ठीय रंगीन कलेवर में छपने लगे। इस व्यावसायिकता की आलोचकों ने तीखी निंदा की पर इसका एक सकारात्मक पहलू भी था कि इसने हिन्दी पत्रकारिता को वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर बनाया। अब हिन्दी पत्रकारिता अंग्रेजी मीडिया की बैसाखियों पर निर्भर नहीं थी। उसने अपनी भाषायी हीनभावना की ग्रंथि को तोड़ा और पाठकों की संख्या तथा प्रसार के मामले में अंग्रेजी के बड़े-बड़े स्थापित गढ़ों को ध्वस्त कर दिया।

अंग्रेजी की औपनिवेशिक मानसिकता को चुनौती

लंबे समय तक भारतीय बौद्धिक विमर्श पर अंग्रेजी पत्रकारिता का एकाधिकार रहा। अंग्रेजी मीडिया खुद को अधिक प्रामाणिक, गंभीर और ‘एलीट’ मानता था जबकि हिन्दी और अन्य प्रादेशिक भाषाओं की पत्रकारिता को कमतर आंका जाता था परंतु हिन्दी पत्रकारिता ने अपनी जीवंतता, मिट्टी से जुड़ाव और जनसरोकारों के बल पर इस मिथक को पूरी तरह तोड़ दिया। आज वैश्विक स्तर पर सर्वे बताते हैं कि भारत में पाठकों का सबसे बड़ा और विश्वसनीय वर्ग हिन्दी समाचार पत्रों के पास है। चाहे वह देश के सुदूर ग्रामीण अंचल की समस्या हो या देश की राजधानी में होने वाला कोई महाघोटाला, हिन्दी पत्रकारों ने अपनी खोजी पत्रकारिता के जरिए सत्ता के गलियारों में कंपन पैदा किया है। बोफोर्स से लेकर समकालीन घोटालों तक को उजागर करने में हिन्दी मीडिया की भूमिका किसी से पीछे नहीं रही है।

आधुनिक चुनौतियां

आज जब हम वर्ष 2026 में खड़े हैं तो हिन्दी पत्रकारिता का चेहरा पूरी तरह बदल चुका है। यह युग सूचना का अतिरेक का युग है। समाचार अब सुबह के अखबार या रात के नौ बजे के टीवी बुलेटिन का इंतजार नहीं करते, वे हर सैकेंड स्मार्टफोन की स्क्रीन पर ‘पुश नोटिफिकेशन’ बनकर टपकते हैं। वेब पोर्टल, यूट्यूब चैनल, पॉडकास्ट और सोशल मीडिया (एक्स, इंस्टाग्राम, फेसबुक) ने हर नागरिक को एक संभावित पत्रकार बना दिया है। परंतु इस असीमित विस्तार के साथ ही हिन्दी पत्रकारिता के समक्ष कुछ ऐसी भयावह चुनौतियां आ खड़ी हुई हैं, जो इसकी मूल आत्मा पर प्रहार कर रही हैं। वेब पोर्टल, यूट्यूब चैनल, पॉडकास्ट और सोशल मीडिया ने सूचना को लोकतांत्रिक तो बनाया है लेकिन इसी के साथ ‘फेक न्यूज’, आधी-अधूरी सूचनाओं और वैचारिक ध्रुवीकरण का खतरनाक दौर भी पैदा कर दिया है। टीआरपी और क्लिकबेट की अंधी दौड़ में सत्य अक्सर सबसे पीछे छूटता दिखाई देता है। कॉरपोरेट दबाव और राजनीतिक हितों ने ‘पेड न्यूज’ जैसी प्रवृत्तियों को भी बढ़ावा दिया है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हिन्दी पत्रकारिता फिर से अपने मूल धर्म (सत्य, संतुलन, जनहित और नैतिक साहस) की ओर लौटे क्योंकि सनसनी और वैचारिक नशे से ग्रस्त समाज लोकतंत्र की सबसे बड़ी कमजोरी बन सकता है।

पत्रकारिता के शाश्वत आदर्श

इस नैतिक संकट के दौर में हमें पत्रकारिता के उन शाश्वत आदर्शों की ओर लौटना होगा, जिन्हें हमारे मनीषियों ने स्थापित किया था। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने प्रेस के तीन बुनियादी उद्देश्य बताए थे, जनता की इच्छाओं, भावनाओं और विचारों को समझना और उन्हें पूरी ईमानदारी से व्यक्त करना, जनता के भीतर वांछनीय और रचनात्मक भावनाओं को जाग्रत करना तथा सार्वजनिक दोषों, भ्रष्टाचार और अन्याय को बिना किसी भय के निर्भीक होकर समाज के सामने प्रकट करना। इसी प्रकार, पूर्व राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा ने प्रेस को लोकतंत्र की रक्षा और सामाजिक समरसता बनाए रखने का सबसे बड़ा संवाहक माना था। वास्तव में पत्रकारिता को लोकतंत्र का ‘चौथा स्तंभ’ इसीलिए कहा गया है क्योंकि जब कार्यपालिका सुस्त हो, विधायिका मौन हो और न्यायपालिका पर मुकदमों का बोझ हो, तब यह ‘जनता की अदालत’ के रूप में चौबीसों घंटे सक्रिय रहती है। स्वतंत्र प्रेस, जागरूक मतदाता और निष्पक्ष न्यायपालिका ही किसी भी महान राष्ट्र की अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा के त्रिशूल हैं।

भविष्य का संकल्प और सार्थकता

हिन्दी पत्रकारिता के 200 वर्षों का यह सफर इस बात का जीवंत प्रमाण है कि माध्यम बदले हैं, तकनीक बदली है, स्याही से लेकर पिक्सल तक का रूपांतरण हुआ है परंतु जो नहीं बदला, वह है लोकहित का जज्बा। आज डिजिटल विज्ञापनों, एल्गोरिदम और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के इस संक्रमण काल में भी हिन्दी पत्रकारिता की आत्मा को सुरक्षित रखना सबसे बड़ी चुनौती है। 30 मई का यह ऐतिहासिक द्विशताब्दी दिवस केवल अतीत के गौरवगान का उत्सव नहीं है बल्कि यह भविष्य के आत्मनिरीक्षण की वेदी है। जब तक हिन्दी पत्रकारिता समाज की आंख बनी रहेगी, जब तक वह अन्याय के खिलाफ स्वतः उठने वाली उंगली बनी रहेगी, तब तक भारतीय लोकतंत्र अक्षुण्ण रहेगा। पंडित युगल किशोर शुक्ल के लगाए गए उस छोटे से बीज को नमन करते हुए आइए हम सब मिलकर इस जनवाणी को और अधिक पारदर्शी, नैतिक और सशक्त बनाने का संकल्प लें। यही हिन्दी पत्रकारिता दिवस की सच्ची सार्थकता और इसकी द्विशताब्दी की वास्तविक अंजलि होगी।

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